मंगल भवन अमंगल हारी भजन

 

 

मंगल भवन अमंगल हारी
द्रबहु सुदसरथ अचर बिहारी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
हो होइहै वही जो राम रचि राखा
को करे तरफ़ बढ़ाए साखा
हो धीरज धरम मित्र अरु नारी
आपद काल परखिये चारी
हो जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू
सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू
हो जाकी रही भावना जैसी
रघु मूरति देखी तिन तैसी
रघुकुल रीत सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाई
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
हो हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
मंगल भवन अमंगल हारी
द्रबहु सुदसरथ अचर बिहारी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम

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वेदधारा के माध्यम से मिले सकारात्मकता और विकास के लिए आभारी हूँ। -Varsha Choudhry

गुरुजी की शिक्षाओं में सरलता हैं 🌸 -Ratan Kumar

वेदधारा की धर्मार्थ गतिविधियों में शामिल होने पर सम्मानित महसूस कर रहा हूं - समीर

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