अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रम्

अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रम्

अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रं न्यायेन राज्यं लवणेन भोज्यम्।
धर्मेण हीनं खलु जीवितं च न राजते चन्द्रमसा विना निशा॥

अंग के बिना शरीर, आंखों के बिना मुख, न्याय के बिना राज्य, नमक के बिना भोजन और धर्म कार्य के बिना जीवन शोभा नहीं देते । ये उस रात्रि के समान है जिस में चंद्रमा गगन पर नहीं चमकता ।

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