अंग्रेजी मे जिसे कल्चर कहते हैं और भारतीय भाषाओं मे जिसे संस्कृति कहते हैं, इनमे भेद है।
कल्चर क्या है? किसी भी समूह के मौलिक रीतिरिवाज, सामाजिक व्यवहार, कलाएं, इसी को कहते हैं कल्चर।
पर संस्कृति क्या है, इसे समझने के लिए संस्कृत भाषा मे इस शब्द की व्युत्पत्ति को देखना पड़ेगा।
संस्कृति।
सं - स् - कृति।
इसमे सं और कृति मुख्य हैं। मुख्यतया इसमें सम उपसर्ग और कृति हैं।
व्याकरण के अनुसार सम के आगे कृति या कार होने से स बीच मे आ जाता है।
सं के आगे कृति होने से सं स कृति।
सं के आगे कार होने से सं स कार।
तो दो ही शब्दों को हमें देखना है: सं और कृति।
पहले कृति को देखते हैं। क्या है कृति?
रचना, सृष्टि, निर्माण, सर्ग।
यह संपूर्ण जगत ईश्वर की रचना है, कृति।
छोटे छोटे समूह भी कृति हैं।
जैसे परिवार, परिवार बनाया जाता है।
गांव बसाया जाता है।
स्कूल मे वर्ग बनाये जाते हैं।
ये सारी कृतियां हैं।
पर कृति से पहले सम उपसर्ग लगाने से क्या होगा?
कृति के अवयवों मे एकता आ जाती है।
गीता मे देखिए।
समस्त प्राणियों मे, समस्त पदार्थों मे जो परमेश्वर को देखता है समान भाव से, वही सही देखता है।
समं - समान भाव से।
उसी को सद्गति की प्राप्ति होती है।
वही सही मार्ग पर चलता है।
सम का अर्थ है समान भाव, एकता।
हम भारतवासी ही हर प्राणि मे, हर वस्तु मे समान भाव से ईश्वर को देख पाते हैं।
हर कृति, हर समूह के हर अंग मे, हर सदस्य मे समानता का भाव रख पाते हैं।
समानता से व्यवहार कर पाते हैं।
यही संस्कृति का आशय है।
यही हमारी संस्कृति का आधार है।
संसमिद्युवसे।
ऐक्यमत्य सूक्त।
यही शब्द सं उसमें बार बार आता है।
यह समानता वेद का आशय है।
समाजवाद ने नहीं लाया इस आशय को।
यही है हमारी संस्कृति, भारत वर्ष की संस्कृति।
जो भी तत्व, जो भी कार्य, जो भी आयोजन भारतीय समाज मे और विश्व भर मे एकता लाने की सहायता करेंगे, वे सब हमारी संस्कृति हैं।
संस्कृति को ऐसा मत समझिये कि कला, त्योहार ये ही संस्कृति हैं।
ये भी हमारी संस्कृति हैं, क्योंकि इनके द्वारा समाज मे एकता उत्पन्न होती है, बढ़ती है।
एकता लाने मे सहायक हर व्यवस्था, हर सोच, हर विचार, हर कानून, हर कदम भारत की संस्कृति है।
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