
वन्दवु संत समानचित हीत अनहित नही कोऊ।
अंजरी गतसुम सुमनजिमी समसुगंध करदोऊ।
संत सरलचित जगत् हित जानी सुभाव सुनेह।
बालविनय सुनी करिकरपा रामचरण रति देह।
मतलब, सब को समान दृष्टि से देखने वाले, सब के साथ समान भाव रखने वाले। संतों का कोई भी मित्र या शत्रु नहीं होता। उनके लिए सब एक समान ही होते हैं। उनको मेरा नमस्कार।
अंजली मुद्रा में जब पुष्पों को रखा जाता है, तो वे पुष्प दोनों हाथों को सुगंधित कर देते हैं। वैसे ही संतजन किसी में भेद नहीं करते। वे सब के अज्ञान का विनाश करते हैं और सबको ज्ञान प्रदान करते हैं। उनको मेरा नमस्कार।
संतों का मन सरल होता है। वे संसार के हित को जानने और चाहने वाले होते हैं। उनसे बालक के समान होकर मैं विनयपूर्वक निवेदन करता हूं कि वे कृपा करके मुझे रामजी के चरणों में प्रेम प्रदान करें।
समान चित्त और समान भाव — यह साधुओं का एक प्रमुख लक्षण है।
'आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः' — जो सब प्राणियों में आत्मवत् दृष्टि रखता है, वही सच्चा पण्डित है।
'सर्वेषु भूतेषु समं पश्यति यो माम् भजते भक्त्या, स मम परां भक्तिं लभते' — भगवद्गीता का यह वचन कहता है कि जो सब प्राणियों में मुझे समभाव से देखता है और भक्ति से भजता है, वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है।
'तत्त्वमसि' के अनुसार, हमारे जीवात्मा में जो चेतना है, वह स्वयं परमात्मा रामजी ही हैं। उस राम में लीन होने के लिए सब के प्रति समभाव आवश्यक है।
संत उत्तम पुष्प के समान होते हैं। उदाहरण लीजिए — जब पुष्प तोड़ा जाता है, तो एक हाथ उसे तोड़ता है और दूसरा हाथ उसे गिरने से संभालता है। एक दृष्टि से, तोड़ने वाला हाथ शत्रु हुआ और संभालने वाला मित्र। लेकिन पुष्प दोनों को ही समान रूप से सुगंधित करता है — शत्रु और मित्र में कोई भेद नहीं करता।
वैसे ही साधुजन भी समान भाव रखते हैं। चाहे कोई उनकी प्रशंसा करे या निंदा, वे सबका ही भला सोचते हैं। ऐसे साधुजनों को मेरा सादर नमस्कार।
संत किस दृष्टिकोण से सभी को देखते हैं?
वे सबमें आत्मभाव देखते हैं — कोई भी उनके लिए भिन्न नहीं होता, न प्रिय, न अप्रिय।
क्या साधु किसी को शत्रु नहीं मानते?
नहीं, वे सबके प्रति समभाव रखते हैं, चाहे सामने वाला उन्हें सम्मान दे या अपमान।
अगर कोई संत का अपकार करे तो भी क्या वे समान भाव रख सकते हैं?
हां, जैसे फूल तोड़ने वाले हाथ को भी सुगंध देता है, संत भी सबके प्रति एक-सा भाव रखते हैं।
संत का स्वभाव कैसा होता है?
वे सरलचित्त, निष्कलंक और करुणामय होते हैं — अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर लोकहित में लगे रहते हैं।
क्यों कहा जाता है कि संत बालक जैसे होते हैं?
क्योंकि वे छल, कपट और अहंकार से रहित होते हैं — जैसे बच्चे निस्पृह भाव से व्यवहार करते हैं।
क्या साधु की सरलता उन्हें कमजोर बनाती है?
नहीं, यह सरलता ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है, क्योंकि इससे वे बिना विरोध के हृदयों को जीतते हैं।
समभाव का क्या महत्व है साधु जीवन में?
समभाव साधुता का मूल है — यह दृष्टि उन्हें सभी में परमात्मा को देखने की शक्ति देती है।
गीता में समभाव को कैसे समझाया गया है?
गीता कहती है कि जो सबमें समभाव रखता है, वही मेरी सच्ची भक्ति को प्राप्त करता है।
क्या यह संभव है कि कोई वास्तव में सबमें एकता देखे?
हां, आत्मज्ञानी व्यक्ति जानता है कि सब जीवों में वही चेतना है — भेद तो केवल देह और व्यवहार का है।
फूल के उदाहरण से संत का व्यवहार कैसे समझाया गया है?
जैसे फूल तोड़े जाने पर भी दोनों हाथों को समान रूप से सुगंधित करता है, वैसे ही संत सभी के साथ करुणा रखते हैं।
क्या यह व्यवहार व्यावहारिक है या सिर्फ आदर्श?
यह व्यवहार कठिन अवश्य है, पर जो भी साधना करता है, उसमें यह संभव होता है — यही साधुता है।
क्यों संत निंदा और प्रशंसा में भेद नहीं करते?
क्योंकि वे स्वयं को केंद्र में नहीं रखते — उनका ध्यान केवल परम कल्याण और भक्ति में होता है।
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