दुष्टों को भी तुलसीदास जी प्रणाम क्यों करते हैं?

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दुष्टों को भी तुलसीदास जी प्रणाम क्यों करते हैं?

सरल चित्तवाले हैं ये संतजन। यही संतजन गोस्वामी तुलसीदास जी को श्रीरामचरितमानस लिखने के लिए प्रेरणा देते हैं। इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं कि संतजन मेरे लिए श्रीरामजी के ही स्वरूप हैं। मैं उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता हूं। वे मुझे श्रीरामकथा का ज्ञान देते हैं और मुझे श्रीरामचरितमानस जैसे ग्रंथों को लिखने योग्य भी बनाते हैं। ऐसे संत जनों को मेरा नमस्कार।

तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं एक बालक की तरह हूं। जैसे माता-पिता अपने बालक की इच्छा पूरी करते हैं, वैसे ही साधुजन मेरी इच्छा पूरी करते हैं। वे मेरी विनम्रता को देखकर मुझे ज्ञान प्रदान करते हैं।

यहाँ साधुजनों के वंदन का प्रसंग समाप्त होता है, और तुलसीदास जी अब खल जनों की वंदना की बात करते हैं।

मैं खलजन समाज, दुष्ट जन समाज की वंदना करता हूं। ये लोग अपने हितैषियों के भी विरोधी हो जाते हैं। दूसरों के हित में इनकी हानि होती है, और जब किसी का अहित होता है तो इन्हें हर्ष होता है। अगर किसी का भला हो जाए, तो ये स्वयं दुःखी हो जाते हैं। ऐसे लोगों को भी मैं प्रणाम करता हूं।

यह कोई व्यंग्यात्मक पंक्ति नहीं है। इस भावना को स्पष्ट करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं — सति भाएँ — अर्थात सच्चे भाव से मैं खलजनों को प्रणाम करता हूं।

संतों के विषय में तुलसीदास जी पहले कह चुके हैं — सब प्रेम सुबानी — कि मैं संतों को प्रेमपूर्वक वाणी से प्रणाम करता हूं। अब दुष्टों के विषय में वे कहते हैं — सति भाएँ — सच्चे भाव से प्रणाम करता हूं।

दुष्टों को भी सच्चे भाव से प्रणाम करने का क्या कारण है?

इसका कारण यही है कि तुलसीदास जी सम्पूर्ण चराचर जगत में भगवान का ही दर्शन करते हैं —

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवन्त।

इस पंक्ति से स्पष्ट होता है कि तुलसीदास जी चराचर जगत को स्वामी और स्वयं को उनका सेवक मानते हैं। वे अच्छाई में भी भगवान को देखते हैं और बुराई में भी। अगर सारा जगत भगवानस्वरूप है, तो सुख-दुःख, अच्छाई-बुराई — सब में वही भगवान हैं।

यही एकता का भाव उन्हें सज्जनों और दुर्जनों दोनों को समान रूप से प्रणाम करने के लिए प्रेरित करता है। भगवान दोनों शक्तियों में — दैवी शक्ति और आसुरी शक्ति में — उपस्थित हैं। इसलिए तुलसीदास जी कहते हैं — सज्जन और दुर्जन — दोनों को मेरा प्रणाम।

जगत में सुख-दुःख, अच्छाई-बुराई — ये दोनों पक्ष उपस्थित हैं। जैसे नेत्रों की एक जोड़ी होती है — एक से प्रकाश, दूसरे से छाया का अनुभव होता है — वैसे ही एक ओर सज्जन हैं जो अच्छाई को प्रेरित करते हैं, दूसरी ओर दुर्जन हैं जो बुराई को उकसाते हैं।

इन दोनों को भी तुलसीदास जी श्रद्धा से नमस्कार करते हैं।

 

  • संतजन को तुलसीदास जी ने भगवान का रूप क्यों माना?
    क्योंकि संतजन उन्हें ज्ञान देते हैं, प्रेरणा देते हैं, और उनके जीवन का मार्ग प्रशस्त करते हैं — ठीक उसी प्रकार जैसे भगवान अपने भक्तों का कल्याण करते हैं।

  • क्या सच में कोई साधु हमें ग्रंथ लिखने जैसा काम सिखा सकता है?
    जब मन विनम्र होता है और साथ में सत्संग होता है, तो साधु की वाणी भीतर ज्ञान के बीज बोती है। ऐसे में रचनात्मक कार्य भी संभव हो जाते हैं।

  • अगर संत भी इंसान हैं, तो उन्हें भगवान कहना अतिशयोक्ति नहीं है क्या?
    जब कोई जीवन में ईश्वर की प्रेरणा बनता है, तो वह व्यक्ति नहीं, ईश्वर का माध्यम बन जाता है। तुलसीदास ने उसी भाव से उन्हें देखा है — यह भाव श्रद्धा का है, अतिशयोक्ति नहीं।


  • तुलसीदास जी खलजनों को सच्चे भाव से प्रणाम क्यों करते हैं?
    क्योंकि वे मानते हैं कि ईश्वर हर रूप में हैं — अच्छाई में भी और बुराई में भी। यदि सारा संसार भगवान का स्वरूप है, तो दुष्टों में भी वही चेतना कार्यरत है।

  • क्या दुष्टों को नमस्कार करना व्यवहारिक है?
    जब दृष्टि समदर्शी होती है, तो व्यवहार भी समता से भर जाता है। यह केवल विनम्रता नहीं, एक आध्यात्मिक दृष्टिकोण है जो सभी को एक परम सत्ता का अंश मानता है।

  • दुष्टों के प्रति आदर रखना क्या उनकी बुराई को बढ़ावा देना नहीं है?
    नहीं, तुलसीदास दुष्टता को नहीं, उस चेतना को प्रणाम करते हैं जो उनके भीतर भी मौजूद है। यह दृष्टि व्यक्ति और कर्म को अलग-अलग पहचानने की उच्च अवस्था है।


  • तुलसीदास जी सज्जनों और दुर्जनों दोनों को प्रणाम क्यों करते हैं?
    क्योंकि वे जगत में व्याप्त दैवी और आसुरी दोनों शक्तियों को एक ही ब्रह्म का रूप मानते हैं। यह समत्व उनकी भक्ति का मूल है।

  • क्या बुराई को भी स्वीकार करना अधर्म नहीं है?
    तुलसीदास बुराई को स्वीकार नहीं कर रहे, बल्कि यह कह रहे हैं कि बुराई भी ईश्वर की लीला का हिस्सा है, जिससे मनुष्य सीखता है और विवेक जागृत करता है।

  • यदि दोनों को प्रणाम किया जाए तो फिर भले-बुरे का भेद ही क्यों?
    भेद व्यवहार में आवश्यक है, परंतु दृष्टि में समता आवश्यक है। तुलसीदास व्यवहार में धर्म का पालन करते हैं, पर दृष्टि से सबको ईश्वर का अंश मानते हैं।


  • तुलसीदास जी सुख-दुख, अच्छाई-बुराई को समान रूप से क्यों देखते हैं?
    वे मानते हैं कि ये सब एक ही परम सत्ता की अभिव्यक्तियाँ हैं। संसार का संतुलन इन्हीं से बनता है।

  • क्या ऐसा विचार जीवन में निरपेक्षता नहीं ला देता?
    नहीं, यह विचार गहराई देता है। जब मन समझता है कि दोनों ही स्थितियाँ आत्मविकास के साधन हैं, तब वह कर्म में संलग्न रहता है, लेकिन भीतर संतुलित होता है।

  • अगर सब कुछ भगवान है, तो फिर साधना का प्रयोजन क्या?
    साधना उसी चेतना से जुड़ने का उपाय है। सज्जनता को अपनाना और दुर्जनता से सीखना — यही साधना का मार्ग है, जो भगवान की लीला को समझने की क्षमता देता है।

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