श्रवण के प्रकार

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श्रवण के प्रकार

भगवान श्री हरी ने मधु और कैटभ के साथ साढे पाँच हजार वर्षों तक युद्ध किया था।
यह सुनकर ऋषि मुनि लोग उत्सुक हो गये उस कथा को सुनने।
ये दानव क्यों उत्पन्न हुए?
कैसे उत्पन्न हुए और भगवान ने उनका वध कैसे किया?
ये सब विस्तार से जानना चाहा उन्होंने।
ऋषिगण बोले: जो मूर्खों के संपर्क में रहता है उसका हमेशा अनिष्ट ही होता है।
जब कि जो विद्वानों के संपर्क में रहता है उसके जीवन में प्रगति होती है।
जानवर और आदमी में क्या फरक है?
दोनों ही खाते हैं, दोनों ही पीते हैं दोनों ही सोते हैं दोनों ही प्रजनन भी करते हैं।
लेकिन क्या फरक है मनुष्य और जानवर में?
विवेक, यही एक फरक है ।
अच्छा क्या है बुरा क्या है जानवरों को यह नहीं पता।
भविष्य जैसा कुछ है, वह अच्छा हो इसके लिये प्रयास करना चाहिये, यह जानवरों को पता नही है।
ज्ञान क्या है उनको नही पता, ज्ञान से क्या लाभ है उनको नही पता।
इसलिये कहते हैं जो आदमी ज्ञान पाने की कोशिश नहीं करता है, उस में और जानवर में कोई फरक नहीं है।
जो आदमी मौका मिलने पर भी उत्तम बातों को सुनने पर श्रद्धा नहीं रखता, उसमें और जानवर में कोई फर्क नहीं है।
श्रवण भी तीन तरह के हैं: सात्विक, राजसिक और तामसिक।
वेद, शास्त्र, पुराण, भजन, कीर्तन- इनका श्रवण है सात्विक।
साहित्य, नाटक, काव्य, प्रबंध जिनका संबंध लौकिक व्यवहार से है, इनका श्रवण राजसिक।
युद्ध की बातें, इनको सुनना तामसिक श्रवण है।
सात्विक श्रवण तीन तरह के हैं।
उत्तम श्रवण वह है जिससे मोक्ष मिलता है।
मध्यम श्रवण वह है जिससे स्वर्ग मिलता है।
अधम श्रवण वह है जिससे से लौकिक सुख भोग मिलते हैं।
अधम का मतलब नीच नहीं है।
अधम का मतलब है, इन तीनो मे सबसे निम्न।
साहित्य, राजसिक श्रवण भी तीन तरह के हैं।
जिसमें अपनी ही पत्नी के गुणों का वर्णन है, वह उत्तम।
जिसमें वेश्या का वर्णन है, वह मध्यम।
और जिसमें परस्त्री का वर्णन है, वह अधम।
तामस श्रवण में अगर युद्ध किसी दुष्ट दुरात्मा के संहार के लिए हो और उसका वर्णन हो तो, उत्तम।
द्वेष के कारण लडाई जैसे पांडव और कौरव के बीच हुआ था, इसका श्रवण मध्यम।
कलह और विवाद के कारण युद्ध की कहानियों को सुनना, अधम तामसिक श्रवण।
इन सब में बहुत ही श्रेष्ठ है पुराणों का श्रवण, जिससे पुण्य भी मिलता है, पाप भी नष्ट हो जाते हैं और बुद्धि का भी विकास होता है।
सूतजी सुनाने लगे: प्रलय के बाद भगवान विष्णु शेष शैया पर लेटे थे।
उनके कान के मैल से दो दानव उत्पन्न हुए जिनके नाम थे मधु और कैटभ।
देखते देखते दोनों आकार में बढने लगे।
दोनों समंदर में इधर उधर घूमने लगे और खेलने लगे।
दानवों ने सोचा: इतना बड़ा समंदर, लेकिन इसका आधार क्या है ,कोई तो बर्तन होगा जिसके अंदर यह पानी भरा है।
कुछ तो शक्ति होगी जिसके प्रभाव से इतना सारा पानी यहां टिका हुआ है।
और हमारी स्थिति का कारण भी वही शक्ति होगी।
वही शक्ति होगी हमारा भी आश्रय।

 

  • भगवान और दानवों के युद्ध की अवधि सुनकर ऋषि क्यों उत्सुक हुए?
    ऋषियों को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि युद्ध इतना लंबा चला। वे समझना चाहते थे कि साधारण दानव इतने सामर्थ्यवान कैसे हुए। उनके मन में कारण और परिणाम की जिज्ञासा जगी। यह उत्सुकता केवल कथा के लिए नहीं, तत्व समझने के लिए थी। इसलिए उन्होंने पूरी उत्पत्ति और वध की कथा जाननी चाही।

  • ऋषियों की यह जिज्ञासा क्या दर्शाती है?
    यह दर्शाती है कि विद्वान केवल घटना नहीं, उसके पीछे का सिद्धान्त जानना चाहते हैं। वे परिणाम से अधिक कारण में रुचि रखते हैं। यही शास्त्रीय जिज्ञासा है। इससे ज्ञान की परंपरा आगे बढ़ती है। केवल मनोरंजन उनका उद्देश्य नहीं होता।

  • क्या यह केवल कथा सुनने की इच्छा है?
    नहीं, यह तत्व-बोध की इच्छा है। कथा उनके लिए माध्यम है, लक्ष्य नहीं। वे यह समझना चाहते हैं कि अधर्म कैसे उत्पन्न होता है और कैसे नष्ट होता है। यही ज्ञान का उद्देश्य है। इसलिए उनकी उत्सुकता गहरी है।


  • मूर्ख और विद्वान के संपर्क पर इतना जोर क्यों दिया गया है?
    क्योंकि संगति का प्रभाव जीवन को दिशा देता है। मूर्ख संगति व्यक्ति को नीचे गिराती है। विद्वान संगति व्यक्ति को ऊपर उठाती है। यह प्रत्यक्ष अनुभव का सत्य है। इसलिए इसे स्पष्ट रूप से कहा गया है।

  • संगति का प्रभाव इतना निर्णायक कैसे हो जाता है?
    क्योंकि विचार धीरे-धीरे आचरण बनते हैं। आचरण से स्वभाव बनता है। स्वभाव से भविष्य तय होता है। इसलिए संगति मूल कारण बन जाती है। यही कारण है कि शास्त्र संगति पर बल देते हैं।

  • क्या केवल संगति से ही व्यक्ति बदल जाता है?
    संगति बीज डालती है। व्यक्ति की इच्छा उस बीज को बढ़ाती या रोकती है। इसलिए संगति निर्णायक तो है, पर अकेली नहीं। विवेक साथ हो तो संगति का सही प्रभाव होता है। यही संतुलन है।


  • मनुष्य और जानवर में मुख्य अंतर क्या बताया गया है?
    मुख्य अंतर विवेक का है। खाना, पीना, सोना, प्रजनन दोनों में समान है। लेकिन अच्छा-बुरा समझने की क्षमता केवल मनुष्य में है। भविष्य के लिए प्रयास करना भी विवेक से ही आता है। यही मनुष्य को मनुष्य बनाता है।

  • विवेक को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है?
    क्योंकि विवेक ही दिशा देता है। बिना विवेक के जीवन केवल प्रतिक्रिया बन जाता है। विवेक से ही लक्ष्य तय होता है। यही कारण है कि विवेक को प्रधान माना गया है। इसके बिना उन्नति संभव नहीं।

  • क्या विवेक न होने पर मनुष्य जानवर समान हो जाता है?
    व्यवहार के स्तर पर हां। यदि व्यक्ति ज्ञान और विवेक का प्रयास नहीं करता, तो अंतर मिट जाता है। शारीरिक अंतर बना रहता है, मानसिक नहीं। यही शास्त्रीय चेतावनी है। इसलिए ज्ञान की खोज आवश्यक बताई गई है।


  • ज्ञान पाने का प्रयास न करने पर इतनी कठोर बात क्यों कही गई है?
    क्योंकि अवसर मिलने पर भी प्रयास न करना सबसे बड़ी हानि है। मनुष्य को यह अवसर केवल एक बार मिलता है। यदि वह इसे गंवाता है, तो उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। इसलिए कठोर शब्दों में चेतावनी दी गई है। यह झकझोरने के लिए है।

  • उत्तम बातों को सुनने में श्रद्धा क्यों आवश्यक है?
    क्योंकि बिना श्रद्धा के सुनना केवल ध्वनि रह जाता है। श्रद्धा से ही बात भीतर उतरती है। तभी वह जीवन को बदलती है। बिना श्रद्धा के ज्ञान निष्फल रहता है।

  • क्या हर व्यक्ति को विद्वान बनना जरूरी है?
    नहीं, पर ज्ञान के प्रति आदर होना जरूरी है। प्रयास करना जरूरी है। सुनने और समझने की तैयारी जरूरी है। यही मनुष्यत्व की पहचान है। विद्वान होना लक्ष्य नहीं, विवेकी होना लक्ष्य है।


  • श्रवण को तीन गुणों में क्यों बांटा गया है?
    क्योंकि हर सुनने का प्रभाव समान नहीं होता। कुछ सुनना मन को शुद्ध करता है। कुछ सुनना मन को चंचल करता है। कुछ सुनना मन को भारी और क्रूर बनाता है। गुणों के अनुसार यह वर्गीकरण किया गया है।

  • सात्विक श्रवण क्या करता है?
    यह मन को ऊपर उठाता है। इसमें वेद, शास्त्र, पुराण और भक्ति विषय आते हैं। इससे बुद्धि शुद्ध होती है। जीवन को सही दिशा मिलती है। यही श्रेष्ठ श्रवण माना गया है।

  • क्या राजसिक और तामसिक श्रवण पूरी तरह त्याज्य हैं?
    नहीं, पर उनकी सीमा समझनी चाहिए। हर श्रवण का अपना प्रभाव है। अज्ञान में किया गया श्रवण हानि करता है। विवेक से किया गया चयन ही उचित है। यही शिक्षा दी गई है।


  • सात्विक श्रवण के तीन स्तर क्यों बताए गए हैं?
    क्योंकि साधकों की पात्रता अलग-अलग होती है। सभी का लक्ष्य एक जैसा नहीं होता। कोई मोक्ष चाहता है, कोई स्वर्ग, कोई सांसारिक सुख। श्रवण उसी अनुसार फल देता है। यह न्यायपूर्ण व्यवस्था है।

  • अधम श्रवण को नीच क्यों नहीं कहा गया?
    क्योंकि यहां तुलना स्तर की है, मूल्य की नहीं। तीन में जो सबसे नीचे है, उसे अधम कहा गया है। इसका अर्थ अपमान नहीं है। यह केवल वर्गीकरण है। शास्त्र भाषा में यह स्पष्ट किया गया है।

  • क्या सांसारिक सुख देने वाला श्रवण व्यर्थ है?
    नहीं, पर वह अंतिम लक्ष्य नहीं है। वह भी जीवन के एक चरण में उपयोगी हो सकता है। पर वहीं रुक जाना उन्नति नहीं है। यही संकेत दिया गया है।


  • राजसिक श्रवण को भी तीन भागों में क्यों बांटा गया है?
    क्योंकि विषय के अनुसार उसका प्रभाव बदलता है। मर्यादा के भीतर वर्णन श्रेष्ठ माना गया है। मर्यादा से बाहर जाने पर प्रभाव गिरता जाता है। यही नैतिक दृष्टि यहां लागू की गई है।

  • परस्त्री विषय को अधम क्यों कहा गया है?
    क्योंकि वह सामाजिक और मानसिक पतन का कारण बनता है। ऐसा श्रवण विवेक को नष्ट करता है। इसलिए उसे सबसे नीचे रखा गया है। यह चेतावनी स्वरूप कहा गया है।

  • क्या यह केवल नैतिक उपदेश है?
    नहीं, यह मनोवैज्ञानिक सत्य भी है। जो मन में जाता है, वही व्यवहार बनता है। इसलिए विषय का चयन महत्वपूर्ण है। यही व्यावहारिक कारण है।


  • तामसिक श्रवण में भी स्तर क्यों बताए गए हैं?
    क्योंकि उद्देश्य के अनुसार प्रभाव बदलता है। दुष्ट के नाश का वर्णन सुधारक हो सकता है। द्वेष से लड़ा गया युद्ध भ्रम पैदा करता है। केवल कलह का वर्णन मन को गिराता है।

  • महाभारत युद्ध को मध्यम क्यों कहा गया?
    क्योंकि उसमें द्वेष और कर्तव्य दोनों थे। न वह पूरी तरह शुद्ध था, न पूरी तरह अधम। इसलिए उसे मध्य स्तर पर रखा गया है। यह संतुलित दृष्टि है।

  • कलह प्रधान कथाएं सबसे अधम क्यों हैं?
    क्योंकि उनमें न आदर्श होता है, न शिक्षा। वे केवल उत्तेजना पैदा करती हैं। इससे मन और बुद्धि दोनों दूषित होते हैं। इसलिए उन्हें सबसे नीचे रखा गया है।


  • पुराण श्रवण को सबसे श्रेष्ठ क्यों कहा गया है?
    क्योंकि वह अनेक स्तरों पर कार्य करता है। उससे पुण्य मिलता है। पाप का क्षय होता है। बुद्धि का विकास होता है। यही समग्र लाभ है।

  • पुराण श्रवण का प्रभाव इतना व्यापक कैसे है?
    क्योंकि उसमें कथा, तत्व और नीति तीनों होते हैं। वह सरल भी है और गहरा भी। सभी स्तर के लोगों के लिए उपयोगी है। इसलिए उसे सर्वोत्तम कहा गया है।

  • क्या केवल सुनने से ही इतना लाभ होता है?
    यदि श्रद्धा और ध्यान के साथ सुना जाए, तो हां। सुनना भी साधना का एक रूप है। सही श्रवण जीवन को बदल देता है। यही शास्त्रों का निष्कर्ष है।


  • मधु और कैटभ की उत्पत्ति का वर्णन क्यों किया गया?
    क्योंकि इससे अधर्म की जड़ समझ में आती है। प्रलय के बाद भी अव्यवस्था कैसे उत्पन्न होती है, यह दिखाया गया है। यह चेतावनी भी है। सृष्टि में सजगता हमेशा आवश्यक है।

  • दानवों का समुद्र में खेलना क्या दर्शाता है?
    यह उनके उच्छृंखल स्वभाव को दिखाता है। बिना उद्देश्य के शक्ति का उपयोग यही रूप लेता है। खेल धीरे-धीरे उत्पात में बदलता है। यही आगे की कथा का आधार है।

  • क्या यह केवल पौराणिक कल्पना है?
    नहीं, यह प्रतीकात्मक शिक्षा है। शक्ति बिना विवेक के कैसे भटकती है, यही दिखाया गया है। यह जीवन के हर स्तर पर लागू होता है। इसलिए कथा सार्थक है।


  • दानवों के मन में आधार खोजने का विचार क्यों आया?
    क्योंकि अस्तित्व का प्रश्न स्वाभाविक है। वे भी जानना चाहते थे कि वे टिके कैसे हैं। यह प्रश्न सही दिशा में था। पर उसका उपयोग गलत दिशा में हुआ।

  • आश्रय की खोज उन्हें कहां ले गई?
    यह खोज आगे उन्हें शक्ति साधना की ओर ले जाती है। सही प्रश्न होने पर भी गलत उद्देश्य समस्या बन जाता है। यही इस प्रसंग की शिक्षा है।

  • क्या प्रश्न करना गलत था?
    नहीं, प्रश्न सही था। समस्या उद्देश्य में थी। ज्ञान का उपयोग किसलिए किया जाए, यही निर्णायक होता है। यही अंतर यहां स्पष्ट होता है।

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देवी भागवत

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