वृथा वृष्टिः समुद्रेषु

वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम् |
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च ||

 

समंदर में बारिश गिरने का कोई फल नहीं है | जिनका पेट भरा है उनको भोजन खिलाकर कोई फल नहीं है | जो धनवान हैं उनको दान देकर कोई फल नहीं है | दिन में दिया जलाकर भी कोई फल नहीं है |

 

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मृत्युञ्जय मंत्र का अर्थ

तीन नेत्रों वाले शंकर जी, जिनकी महिमा का सुगन्ध चारों ओर फैला हुआ है, जो सबके पोषक हैं, उनकी हम पूजा करते हैं। वे हमें परेशानियों और मृत्यु से इस प्रकार सहज रूप से मोचित करें जैसे खरबूजा पक जाने पर बेल से अपने आप टूट जाता है। किंतु वे हमें मोक्ष रूपी सद्गाति से न छुडावें।

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में कौन कौन सी नदियां मिलती हैं?

गंगा, यमुना और सरस्वती ।

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