वृक्षाः सत्पुरुषा इव

वृक्षाः सत्पुरुषा इव

छायामन्यस्य कुर्वन्ति स्वयं तिष्ठन्ति चातपे |
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव ||

 

वृक्ष खुद धूप में स्थित होकर दूसरों को छाव देते हैं | अपने फल से दूसरों का भूख भी मिटाते हैं | वृक्ष सज्जन के जैसे होते हैं जो खुद कष्ट सहकर दूसरों का भला करते हैं |

 

हिन्दी

हिन्दी

सुभाषित

Click on any topic to open

0

Copyright © 2026 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |
Vedahdara - Personalize

We use cookies