
तुलसीदास जी के रामचरितमानस के भाषा का तेरहवां मंगलाचरण।
सुजसु रामचरित मनि मानिक। गुपद प्रगट जह जोगजनि जानिक।।
श्रीराम जी का चरित्र मणि और माणिक्य के समान है। इनमें कुछ चरित्र प्रकट होते हैं तो कुछ गुप्त। जब देव की कृपा होती है तो वे दिखाई पड़ने लगते हैं, मिलने लगते हैं। कुछ मनियां गुप्त होती हैं, जैसे नागमणि।
हम चाहे कितना भी परिश्रम कर लें, वे हमें नहीं मिलतीं। परंतु जब देव संयोग होता है, तब वे प्रकट होकर मिल जाती हैं। वैसे ही श्रीराम जी के कुछ चरित्र कहीं भी पुस्तकों में उपलब्ध नहीं होते। लेकिन जब देव संयोग होता है, तब वे संतों की वाणी से सुनाई देते हैं, और हमें प्राप्त होते हैं। ये हैं गुप्त रामचरित मणिमाणिक, जो केवल देव संयोग से ही मिलते हैं।
कुछ चरित्र वेद और पुराणों में प्रकट हैं। वे वेद और पुराणों के भीतर विद्यमान हैं। जैसे यदि कहीं पर कुआं खोदना हो तो उसके विशेषज्ञ बताते हैं कि कहां खुदाई करने से अच्छा पानी मिलेगा, वैसे ही सुवर्ण या रत्नों की खान खोजने के भी विशेषज्ञ होते हैं जो जानते हैं कि खदान कहां है।
रामचरितमानस भी उसी मणिमाणिक्य-खान की तरह है। इसके भी कुछ विशेषज्ञ होते हैं — जैसे तुलसीदास जी के गुरु अनंत श्री नरहरिदास जी। परंतु यह श्रीराम जी का चरित्र उसी को मिलता है जिसमें भक्ति हो, जिस पर श्रीराम जी की कृपा हो। जिस पर श्रीराम जी की कृपा होती है, उसी को यह पावन चरित्र प्राप्त होता है। यदि आज आपको श्रीराम जी का चरित्र सुनने का सौभाग्य मिला है, तो जान लीजिए — आप पर श्रीराम जी की कृपा अवश्य है।
मणिमाणिक्य रत्न अत्यंत विरल होते हैं। कुछ रत्न तो करोड़ों में एक व्यक्ति के पास ही होते हैं। श्रीराम जी का चरित्र भी मणि-माणिक्य जैसा विशेष रत्न है, जो केवल करोड़ों में एक व्यक्ति के भाग्य में होता है। करोड़ों में एक ही इस रामचरित को जान पाता है। इसलिए हमें प्रयासपूर्वक इस रामचरित को अवश्य जानना चाहिए।
जो व्यक्ति गुप्त और प्रकट — दोनों प्रकार के रामचरित को जान पाता है, वह रामभक्तों में श्रेष्ठतम होता है। रत्नों के अनेक रंग होते हैं — श्वेत, रक्त, श्याम, हरित आदि। वैसे ही इस रामचरित में भी अनेक रस हैं — जैसे श्रृंगार रस का श्याम वर्ण।
मनोहर, मनमोहन, कान्हा का रंग श्याम है — श्रृंगार के लिए सबसे उपयुक्त रंग। श्रृंगार के लिए इससे सुंदर रंग और क्या हो सकता है — कान्हा का रंग ही। वीर रस के लिए रक्त वर्ण — वीरता को दर्शाने के लिए दैत्यों के रक्त से लाल होती हुई भूमि। शांत रस का श्वेत रंग — सत्त्व का, प्रकाश का रंग। हरा रंग वृक्षों का, प्रकृति का, वात्सल्य का प्रतीक है।
ऐसे ही नाना वर्णों के रत्नों के समान, नाना प्रकार के रसों से युक्त है श्रीरामचरितमानस। इसे पढ़ने और सुनने से श्रीराम जी की भक्ति और कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
रामचरित मणि और माणिक्य जैसा क्यों कहा गया है?
क्योंकि यह दिव्य रत्नों की तरह बहुमूल्य और दुर्लभ है। इसमें गहराई, चमक और रहस्य दोनों हैं। जैसे रत्न की कीमत जानने के लिए प्रकाश चाहिए, वैसे ही रामचरित के अर्थ जानने के लिए कृपा और श्रद्धा चाहिए। यह साधारण पुस्तक नहीं, आत्मज्ञान का भंडार है।
अगर यह इतना दुर्लभ है तो इसे कैसे पाया जा सकता है?
श्रद्धा, भक्ति और सत्संग से। जब मन निर्मल होता है, तब गुप्त चरित्र खुलते हैं। जैसे गुरु की छत्रछाया में विद्यार्थी ज्ञान को सहज रूप से ग्रहण करता है, वैसे ही संतों की वाणी से रामचरित की गहराई अनुभव में आती है।
क्या यह सिर्फ ईश्वर की कृपा पर निर्भर नहीं हो गया? परिश्रम का क्या अर्थ हुआ?
कृपा परिश्रम को व्यर्थ नहीं बनाती, बल्कि उसे फल देती है। जैसे बीज बोने के बाद वर्षा आवश्यक है, वैसे ही प्रयास के बाद कृपा उसे फलित करती है। जिसने जीवन में साधना की है, उसी पर कृपा उतरती है।
गुप्त और प्रकट चरित्रों का क्या अर्थ है?
प्रकट चरित्र वे हैं जो सभी को दिखाई देते हैं — जैसे ग्रंथों में लिखे प्रसंग। गुप्त चरित्र वे हैं जो अनुभव या अंतर्दृष्टि से ही जाने जा सकते हैं। ये सत्य भक्त के हृदय में प्रकट होते हैं जब उसका मन पवित्र और एकाग्र होता है।
क्या इसका मतलब है कि हर कोई इन गुप्त बातों को नहीं जान सकता?
हाँ, क्योंकि ये ज्ञान मानसिक तीक्ष्णता से नहीं, आंतरिक शुद्धि से प्राप्त होता है। यह किसी गूढ़ विज्ञान की तरह है, जो योग्य शिष्य को ही प्रकट होता है। भक्ति इसके द्वार खोलती है।
क्या यह किसी संप्रदाय की विशेषता है?
नहीं, यह सार्वभौमिक सिद्धांत है। किसी भी ज्ञान में गहराई तब ही मिलती है जब साधक समर्पण और एकाग्रता से जुड़ता है। गुप्त सत्य का अनुभव हमेशा भीतर से आता है, बाहरी अभ्यास से नहीं।
रामचरित को खदान के समान क्यों कहा गया है?
क्योंकि इसमें अनगिनत रत्न समान ज्ञान छिपा है, जिसे खोजने के लिए विवेक और साधना चाहिए। साधारण दृष्टि से यह एक ग्रंथ है, पर गहराई में जाओ तो यह चेतना का खजाना है।
क्या हर कोई इन रत्नों तक पहुंच सकता है?
हर कोई प्रयास कर सकता है, पर जो श्रद्धा, धैर्य और मार्गदर्शन के साथ चलता है, वही पा सकता है। जैसे खनिक अंधेरे में दीप लेकर उतरता है, वैसे ही साधक गुरु के प्रकाश में उतरता है।
अगर इतना प्रयास चाहिए तो क्या यह जीवन में संभव है?
हाँ, क्योंकि यह प्रयत्न अंततः आत्मिक शांति देता है। यह कोई दूर का लक्ष्य नहीं — हर शुद्ध मन इसका अंश पा सकता है। अनुभव धीरे-धीरे खुलता है, जैसे रत्न पर से धूल हटती है।
रामचरित में अनेक रसों की बात क्यों की गई है?
क्योंकि यह केवल कथा नहीं, भावों का सागर है। इसमें श्रृंगार, वीर, शांति, वात्सल्य जैसे सभी रस हैं जो मनुष्य के जीवन के हर पक्ष को छूते हैं। हर रस जीवन की किसी अनुभूति को दिव्यता से जोड़ता है।
इन रसों का मनुष्य के जीवन पर क्या प्रभाव होता है?
ये भाव मन को परिष्कृत करते हैं। श्रृंगार प्रेम सिखाता है, वीरता साहस जगाती है, शांति आत्मनियंत्रण देती है और वात्सल्य करुणा भरता है। यही समग्रता मानवता की पूर्णता है।
क्या ये रस केवल धार्मिक अर्थ में ही लागू होते हैं?
नहीं, ये जीवन के हर क्षेत्र में लागू हैं। एक कलाकार, एक योद्धा, एक माता — सब इन रसों से जुड़ते हैं। रामचरित इन भावों को संतुलित रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे मनुष्य का स्वभाव ऊँचा उठता है।
रामचरित का अध्ययन क्यों आवश्यक बताया गया है?
क्योंकि यह आत्मा को भक्ति और ज्ञान दोनों में स्थिर करता है। यह केवल कथा नहीं, आत्म-संस्कार का साधन है। इसके श्रवण से मन में पवित्रता और श्रद्धा उत्पन्न होती है।
क्या केवल पढ़ने से ही लाभ होता है या समझना भी जरूरी है?
समझना ही असली साधना है। पढ़ना आरंभ है, पर मनन और चिंतन से ही यह जीवन में उतरता है। जैसे औषधि सेवन करने पर ही असर करती है, वैसे ही यह ज्ञान अनुभव करने पर ही परिवर्तन लाता है।
अगर कोई इसे केवल कथा समझे तो क्या वह कुछ खो देता है?
हाँ, क्योंकि तब यह केवल मनोरंजन रह जाएगा। जो व्यक्ति इसके गूढ़ अर्थों को आत्मसात करता है, वही भक्ति और ज्ञान दोनों को पा लेता है। यही रामचरितमानस का चमत्कार है।
Astrology
Bhagavad Gita
Bhagavatam
Bharat Matha
Devi
Devi Mahatmyam
Ganapathy
Garuda Puranam
Glory of Venkatesha
Hanuman
Kathopanishad
Mahabharatam
Mantra Shastra
Mystique
Practical Wisdom
Purana Stories
Radhe Radhe
Ramayana
Rare Topics
Rigveda Explained
Rituals
Sages and Saints
Shiva
Spiritual books
Sri Suktam
Story of Sri Yantra
Temples
Vedas
Vishnu Sahasranama
Yoga Vasishta