रामराज्य क्या और कैसा था?

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वेङ्कटेश सुप्रभातम् के रचयिता कौन है?

श्रीवेङ्कटेश सुप्रभातम् के रचयिता हैं प्रतिवादि भयंकरं अण्णन्।

आज के समय में संतों का क्या महत्व है?

संतों को ज्ञान, मार्गदर्शन और आशा के स्रोत के रूप में देखा जाता है। आज के समय भी संत हमें नैतिकता, करुणा और विश्वास के साथ जीवन जीने का उदाहरण देते हैं। उनकी शिक्षाएं उत्तरोत्तर प्रासंगिक होते जा रहे हैं। वे कठिन समय में भी लचीलापन और विश्वास के साथ जीना सिखाते हैं।

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भारतवर्ष में नहुष, हरिश्चन्द्र, दशरथ जैसे कई धर्मपरायण प्रतापशाली सम्राट और राजा शासन किये हैं। इन सबका हम सम्मान करते हैं। पर नहुष के राज्य को हम नहुषराज्य क्यों नहीं कहते? हरिश्चन्द्र के राज्य को हरिश्चन्द्रराज्य क्यो....

भारतवर्ष में नहुष, हरिश्चन्द्र, दशरथ जैसे कई धर्मपरायण प्रतापशाली सम्राट और राजा शासन किये हैं।
इन सबका हम सम्मान करते हैं।
पर नहुष के राज्य को हम नहुषराज्य क्यों नहीं कहते?
हरिश्चन्द्र के राज्य को हरिश्चन्द्रराज्य क्यों नहीं कहते?
दशरथ के राज्य को दशरथ राज्य क्यों नहीं कहते?
सिर्फ श्रीराम जी के राज्य को ही हम रामराज्य कहते हैं।
इसके कई कारण हैं।

श्रीराम जी ने ही जगत में सर्वोत्तम, सर्वोच्च मर्यादाएं स्थापित की थी।
लंका युद्ध के बाद ही श्रीराम जी सम्राट बने थे।
पर इससे पहले ही उन्होंने अपने ही जीवन में इन मर्यादाओं का पालन करके दिखाया।
व्यक्ति को परिवार और समाज के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए?
इहलोक और परलोक में श्रेय, अभ्युदय और परब्रह्म की प्राप्ति के लिए किन किन गुणों का आश्रय लेना चाहिए?
इन सन का अपनी लीलाओं द्वारा भगवान ने साक्षात्कार करके दिखाया।

राज्याभिषेक के बाद उन्होंने अपने राज्य में धर्मनीति, अर्थनीति, समाजनीति और राजनीति की मर्यादाओं को स्थापित किया।

क्या और कैसा था रामराज्य?
रामराज्य के सभी पुरुष और नारी जन सच्चरित्र और सद्गुणों से संपन्न थे।
अपने अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार कर्तव्य में निरत रहते थे।
कर्तव्य अपनी इच्छानुसार नहीं, शास्त्रों के अनुसार।
उनके मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सरबुद्धि नहीं होते थे।
उन्हें भय या शोक नहीं होता था।
वे बीमार नही होते थे।
एक दूसरे से वे द्वेष नहीं करते थे।
एक दूसरे से प्रेम और मैत्री से व्यवहार करते थे।
परस्त्री से रिश्ता या परधन को हडपना उनकी सोच में भी नहीं रहता था।
न केवल मानव, वनों में वृक्ष सदा फूलते और फलते थे।
हाथी और सिंह (वैर भूलकर) एक साथ रहते थे।
पक्षि आनंद से कूजते थे।
पशु बिना किसी डर के विचरते थे।
सब जान गये कि परमेश्वर परमात्मा ही अब हमारे राजा हैं।
प्रकृति भी -
पर्वतों ने अमूल्य मणियों के खान अपने आप प्रगट करके दे दीं।
नदियां शीतल और निर्मल जल बहाती थी।
सागर अपनी मर्यादा में रहकर अपने किनारों पर रत्न डाल देते थे।
सूर्य जितनी आवश्यकता थी उतना ही तपते थे।
बारिश जितनी आवश्यकता थी उतनी ही बरसती थी।
चांदनी रातों को अमृतमय रखती थी।
दैहिक, भौतिक और दैविक समस्याएं बिलकुल नहीं होती थी।
सभी जन धर्म के नियम और दिनचर्या का पालन करके स्वस्थ रहते थे।
उन्हें दैहिक पीडायें नहीं होती थीं।
जिसभी राज्य का शासक धर्मपरायण होता है वहां बाढ़, अकाल या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं नहीं होती हैं।
आस्तिक जनों के समाज के ऊपर देवता भी आशीर्वाद बरसाते रहते हैं।

रामराज्य में आन्तरिक, बाह्य और आर्थिक विषमताएं नहीं थीं।
परमार्थ की प्राप्ति पर केन्द्रित होने के कारण उनके अन्तःकरण शुद्ध थे।
बाह्य व्यवहारों में भी उन्हें गर्व, स्पर्धा, छोटे-बडे का भाव या छल कपट नहीं होता था।
रामराज्य में आर्थिक संतुलन, स्थिरता और वितरण रहता था।

इस प्रकार रामराज्य का हर व्यक्ति ने इहलोक और परलोक में सफलता पाई।
इन कारणों से ही हम युगों बाद आज भी रामराज्य का स्मरण करते हैं और चाहते हैं कि रामराज्य वापस आ जाएं।

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