सेतु का निर्माण चल रहा था। नल पत्थर उठाकर फेंकता था तो वह समुद्र पर तैर जाता था। इन्हीं तैरते हुए पत्थरों से सेतु बन रहा था। जब यह समाचार भगवान श्रीराम जी तक पहुँचा, तो वे भी आगे बढ़े इस अद्भुत दृश्य को देखने।
भगवान ने नल से पूछा, 'नल, तुम्हें यह सिद्धि कैसे प्राप्त हुई?'
नल ने विनम्रता से उत्तर दिया, 'प्रभो, मैं कोई सिद्ध पुरुष नहीं हूँ। मैं तो बस आपका नाम लेकर पत्थर फेंकता हूँ, और आपके नामोच्चार का ही प्रभाव है कि पत्थर तैर जाता है। यह किसी साधना की सिद्धि नहीं, केवल आपके नाम की महिमा है।'
यह सुनकर भगवान मुस्कराए। उन्होंने भी एक पत्थर उठाया और समुद्र में फेंक दिया। परंतु वह पत्थर डूब गया। भगवान ने कहा, 'नल, यह कैसी बात है? तुम कहते हो कि मेरे नाम का प्रभाव है, तो फिर जब मैं स्वयं पत्थर फेंकता हूँ, वह क्यों डूब गया?'
नल ने folded हाथों से उत्तर दिया, 'प्रभो, आपके हाथ से जो वस्तु छूटेगी, वह डूबेगी नहीं तो क्या! पत्थर ही क्या, देवराज इंद्र भी डूब जाएगा यदि आपके हाथ से निकल गया। जब तक कोई आपके आश्रय में रहता है, तब तक सब कुछ ठीक चलता है। पर जैसे ही आपके संरक्षण से बाहर आता है, उसका पतन निश्चित है।'
'श्रीराम जी, हम सब आपके बच्चों की तरह हैं। आप हमारा हाथ पकड़े हुए हैं। अगर हमने कभी आपका हाथ छोड़ दिया, तो डूबना निश्चित है। पर यदि हमने ऐसा कुछ किया जिससे आपने ही हमारा हाथ छोड़ दिया, तब भी वही परिणाम होगा। जो आपके नाम और आपकी भक्ति से दूर जाता है, वह संसार-सागर में डूबता ही है।'
'इसलिए, अपने हृदय में एक सिंहासन बनाइए और उस पर श्रीराम जी को विराजमान कीजिए। वे आपके सारे कलेश, भय, समस्याएँ और पीड़ाएँ दूर करेंगे।'
'आराम चाहिए तो भगवान को पुकारिए — "आराम! आराम!" यानी राम को बार-बार स्मरण कीजिए। "जयराम, जयराम" करते रहेंगे तो जीवन में शांति रहेगी। पर जैसे ही भगवान से दूरी आई, आराम चला जाएगा। सुख, शांति और आनंद से भरा जीवन वही पा सकता है, जिसने श्रीराम जी को अपने हृदय में स्थिर बिठा लिया।'
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