यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादि देवासुरा
यत्सत्त्वादमृषेव भाति सकलं रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लव एक एव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥
इस प्रपंच की वस्तुओं को भिन्न-भिन्न देखने को ही अज्ञान कहते हैं, अविद्या कहते हैं। अज्ञान यानी गलत ज्ञान।
'मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किंचन। मृत्यु्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति' — यह कठोपनिषद कहता है।
यहाँ नानात्व नहीं है – भिन्न-भिन्न कुछ नहीं है। इस सच्चाई को मन से जान लेना चाहिए। जिसे यहाँ सब कुछ भिन्न-भिन्न दिखाई देता है, वह मृत्यु से मृत्यु जाता है, उसे बार-बार जन्म लेना पड़ता है।
जगत के ऊपर आसक्ति कोई नई बात नहीं है। ऐसा नहीं है कि कलियुग में आकर लोग अचानक स्वार्थी और भावुक बन गए।
'हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपातृणु सत्यधर्माय दृष्टये' — वेद में कहा गया है।
जैसे स्वर्ण में प्रीति सहज है, वैसे ही इस जगत में भी प्रीति स्वाभाविक है। इस स्वर्णमय पात्र से सत्य आच्छादित है, जिसके कारण परं सत्य पता नहीं चल पा रहा है।
और यह सुवर्ण पात्र क्या है? सुत – वित्त – देह – गेह – स्नेह। जब यह ढक्कन ईश्वरी कृपा से हट जाता है, तब सत्य दिखाई पड़ता है।
'सत्रु, मित्र, मध्यस्थ, तीनि ये, मन कीन्हे बरिआई। त्यागन, गहन, उपेच्छनीय, अहि हाटक तृणकी नाई।'
शत्रु-मित्र — यह जो भाव है, इसी से हानि है, यही वह मिथ्या है। मंत्र में ईश्वर को 'पूषा' कहा गया है — तत्त्वं पूषन्नपातृणु। पूषा यानी पोषण करने वाले।
यह जगत ईश्वर का ही शरीर है। यह जगत उनका ही उपकार है। इसमें कुछ ही लोगों से ममता रखना, कुछ ही चीजों में आसक्ति रखना — यह कृत्रिम है। यही है अविद्या, अज्ञान।
ईश्वर के किस अंग से हम अवज्ञा या घृणा कर सकते हैं? उसी ईश्वर से प्रार्थना है — इस ढक्कन द्वारा आपने ही सत्य को आच्छादित किया है, उसे कृपया खोल दीजिए।
भगवान के शरीर में नानात्व सिर्फ एक भ्रम है — कल्पना मात्र है। संपूर्ण जगत को उनका एकमात्र शरीर जान लेना चाहिए।
'शक्तित्वान्नानृतं वेद्यं' — शक्तित्वात न अनृतं वेद्यं — शाण्डिल्य भक्ति सूत्र।
कहा जाता है कि जगत माया है — लेकिन उसे असत्य कैसे कह सकते हैं? माया भी तो ईश्वर की ही शक्ति है। कोई बाहरी शक्ति नहीं है। माया को बनाया किसने? माया का प्रभाव है किसका प्रभाव? फिर उसे असत्य कैसे कह सकते हैं?
संसार रूपी माया को भी ईश्वर ही जानना — यही ज्ञान है। इस माया को भी — सुत, वित्त, देह, गेह, स्नेह रूपी इस माया को भी — श्रीरामचन्द्रजी का ही शरीर या उनकी शक्ति, उनका प्रभाव जान लेने पर कोई दोष नहीं है। नहीं तो वह सिर्फ एक भ्रम है — जैसे रस्सी पर साँप का भ्रम।
इसी को तुलसीदासजी ने कहा है —
'एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥'
यही है भेद — विद्या और अविद्या में।
अज्ञान क्या है और यह जीवन को कैसे प्रभावित करता है?
अज्ञान यह है कि व्यक्ति जगत के रूपों को ही अंतिम सत्य मान लेता है और एकत्व के तत्त्व से दूर हो जाता है। इससे वह स्वयं को बाहरी वस्तुओं में पहचानने लगता है। यही दृष्टि उसे जन्म-मरण के बंधन में बाँध देती है।
क्या यह एकत्व की बात केवल सिद्धांत है या व्यवहार में भी लागू होती है?
यह व्यवहार में पूरी तरह लागू होती है। जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि सब कुछ एक ही तत्त्व का रूप है, तब उसका राग-द्वेष और अहंकार स्वतः ही मिटने लगते हैं।
क्या विभिन्न वस्तुओं का अनुभव होना एकत्व के विरोध में है?
नहीं। अनुभव रूपों का होता है, लेकिन यदि उन रूपों के पीछे एक ही आधार को देखा जाए, तो वह अनुभव भी एकत्व का ही रूप होता है।
वेद क्यों कहते हैं कि सत्य सुवर्णमय पात्र से ढका हुआ है?
क्योंकि संसार की प्रिय वस्तुएं जैसे धन, स्नेह, शरीर आदि अपनी चमक से मूल तत्त्व को ढक देती हैं। जैसे सोने की चमक आँखों को भटका देती है, वैसे ही ये विषय सत्य को ओझल कर देते हैं।
क्या संसार का सुख भी सत्य से भटकाने वाला है?
यदि सुख को ही अंतिम लक्ष्य मान लिया जाए तो हाँ। लेकिन यदि उसे एक माध्यम समझा जाए सत्य तक पहुँचने का, तो वह बाधा नहीं बनता।
क्या हर आसक्ति और मोह सत्य से दूर ले जाते हैं?
नहीं, जब तक वे ईश्वर या तत्त्व की ओर मोड़ें, तब तक वे साधन बन सकते हैं। जब वे केवल विषयों तक सीमित रह जाएँ, तभी वे आवरण बनते हैं।
मित्र-शत्रु जैसे भेद क्यों अज्ञान कहलाते हैं?
क्योंकि सब कुछ एक ही तत्त्व से उत्पन्न है। भेदभाव हमारी मन की रचना है, जो ममता और मोह से उत्पन्न होती है। जहाँ दृष्टि में एकता हो, वहाँ विरोध नहीं टिकता।
यदि सब एक हैं तो व्यवहार में भेद क्यों दिखाई देता है?
व्यवहारिक स्तर पर भिन्नता स्वाभाविक है, लेकिन तात्त्विक स्तर पर सब एक हैं। जैसे अनेक लहरें समुद्र से अलग दिखती हैं, पर उनका आधार एक ही होता है।
क्या भेदभाव को पूरी तरह मिटाना ही ज्ञान है?
दृष्टिकोण से हाँ। जब मन भीतर से भेद छोड़ देता है, तब ही ज्ञान प्रकट होता है, भले ही व्यवहार में भिन्नता बनी रहे।
माया को सत्य का विरोधी क्यों नहीं माना जा सकता?
क्योंकि माया उसी तत्त्व की शक्ति है। जो तत्त्व सत्य है, उसकी शक्ति भी सत्य से ही उपजी है। अतः माया को असत्य कहना तर्क के विरुद्ध है।
तो क्या माया से मुक्ति संभव है?
हाँ, जब माया को भी उसी तत्त्व का रूप समझा जाए। तब उसका बंधन समाप्त हो जाता है और वह उपकारक बन जाती है।
यदि माया सत्य को ढक लेती है तो उसे पार कैसे करें?
कृपा, विवेक और भक्ति के माध्यम से। जब अंतर दृष्टि जागती है, तब माया का आवरण स्वयं हट जाता है।
विद्या और अविद्या में अंतर क्या है?
अविद्या यह है कि जगत को स्वतंत्र और भिन्न माना जाए। विद्या यह है कि जगत को भी उसी परम तत्त्व का स्वरूप समझा जाए। जब दृष्टि एकता में टिके, वही विद्या है।
क्या जगत को झूठा कहना गलत है?
हाँ, क्योंकि यह भी उसी सत्य का विस्तार है। जब तक इसे तत्त्व से जोड़ा जाए, यह सत्य है — जब उससे काटा जाए, तभी यह भ्रम बनता है।
यदि सब कुछ तत्त्व का ही रूप है तो भ्रम उत्पन्न कैसे हुआ?
भ्रम दृष्टि की गलती है, वस्तु की नहीं। जब देखने वाला ही भूल करता है, तब सत्य में असत्य प्रतीत होता है। जब दृष्टि सुधरती है, भ्रम स्वयं मिट जाता है।
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