अज्ञान को पहचानना भी प्रभु चरण पर भक्ति के बिना नहीं होता

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अज्ञान को पहचानना भी प्रभु चरण पर भक्ति के बिना नहीं होता

यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादि देवासुरा
यत्सत्त्वादमृषेव भाति सकलं रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लव एक एव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥

पर रस्सी में साँप जैसा यह भ्रम जो है, यह इतना सरल नहीं है कि मनुष्य अपने ही सामर्थ्य से जान ले।
जदपि मृषा तिहूँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।
प्रभु चरण ही उपाय है इस भ्रम को हटाने का।
'यत्पादप्लव एक एव हि भवाम्बोधेः तितीर्षावतां' — इसके लिये प्रभु चरण का एकमात्र आश्रय लेना ही शरणागति है।

अनन्यसाध्ये स्वाभीष्टे महाविश्वासपूर्वकम्।
तदेकोपायतायाञ्चा प्रपत्तिः शरणागतिः।
मेरा अभीष्ट अन्य किसी भी उपाय से सिद्ध नहीं हो सकता।
आप ही मेरे एकमात्र उपाय हैं।
इस विश्वास के साथ याचना करना ही शरणागति है।

'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते' — गीता।

यह दैवी माया जो मेरी ही है, बहुत ही दुष्कर है।
मेरे शरण में आने से ही इसे पार किया जा सकता है।
यही एकमात्र उपाय है — 'यत्पादप्लव एक एव हि भवांबोधेः तितीर्षावतां'।
यही वह रस्सी है जिसे पकड़कर मेढ़क कुएँ से बाहर आता है।

'वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्' — वह ईश हरि, जिनका नाम है राम, वे सारे कारणों से परे हैं।
उनकी शरण में जाने का यही कारण है।
और वे शरण देते भी हैं।

'सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम।'

प्रभु इसके लिये वचनबद्ध हैं।
शरण देना उनका व्रत है।
एक बार में उनके पास जाकर जो कहता है — कि मैं आपका हूँ — उसे वे अपने संरक्षण में ले लेते हैं।

इस वचन का, इस व्रत का श्रीरामजी पालन कर सकते हैं क्योंकि वे सबसे परे हैं।
वे हैं — 'सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः'।
सबको वे अपने वश में रखते हैं, सब कुछ उनके ही नियंत्रण में है।
सबके स्वामी हैं वे।

प्रभु को ईश क्यों कहा है?

'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।'

ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में रहकर, अपनी माया से उनको एक यन्त्र के जैसे चलाते रहते हैं।
इसलिए वे ईश्वर हैं, ईश हैं।
इसलिए वे ही नियामक हैं, नियंत्रक हैं।
इसलिए उनमें शरण देने की शक्ति है।

'बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला।
माया जीव करम कुलि काला।
अहिप महिप जहाँ लगि प्रभुताई।
जोग सिद्धि निगमागम गाई॥
करि बिचार जियँ देखहु नीकें।
राम रजाइ सीस सबही कें।'

ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, सूर्य, चन्द्रमा – आदि हर कोई जिनका गुणगान वेदों ने किया है — अगर गहराई से देखा जाये तो श्रीरामजी की आज्ञा इन सबके सिर पर है, क्योंकि वे ही इन सबके भी ईश हैं, ईश्वर हैं।

प्रभु को हरि क्यों कहा है?

'हरिर्हरति पापानि' — हरि का अर्थ है पापों को हरने वाले, पापों के फलस्वरूप उत्पन्न दुःखों को हरने वाले।
रस्सी पर साँप जैसे भ्रम — जिस भ्रम से मनुष्य पाप करता है — अपनी शरणागति देकर उसी पाप को हरने वाले — हरि।

'हरि' — विष्णु, अग्नि, इन्द्र और सूर्य को भी कहा गया है।
इसलिए 'रामाख्यं ईशं हरिं' कहा गया है — जिसका नाम है राम, जो हरि भी हैं और ईश भी।

लेकिन राम — परशुराम भी हो सकते हैं, बलराम भी हो सकते हैं — इसलिए 'ईश' कहा गया।
'हरि', 'राम' और 'ईश' — ये तीनों एक साथ में श्रीरामजी के सिवा और कोई नहीं हो सकता।

स्पष्टता देखिए — ऐसा नहीं है कि स्तुति पाठ करते-करते कुछ भी कह दिया जाता है।
हर शब्द के पीछे कितना गहरा अर्थ और कितना भार है — यह देखिए।

 

शरणागति क्या है और क्यों आवश्यक है?
जब व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि किसी भी उपाय से वह मुक्ति नहीं पा सकता और केवल एक ही तत्त्व उसका आश्रय है, तब वह सच्ची शरणागति में प्रवेश करता है। यह आत्मसमर्पण का भाव है जिसमें कोई विकल्प नहीं बचता — केवल पूर्ण समर्पण। यही एकमात्र मार्ग है भ्रम और माया से पार होने का।

क्या कोई भी व्यक्ति शरण ले सकता है?
हाँ, जो भी तत्त्व की ओर मन से समर्पित होता है, उसे शरण मिलती है। इसमें कोई पात्रता या जटिल योग्यता की शर्त नहीं है — बस दृढ़ विश्वास और पूर्ण समर्पण चाहिए।

क्या यह केवल भावना है या इसका वास्तविक प्रभाव भी होता है?
यह केवल भावनात्मक नहीं, व्यवहारिक और प्रभावशाली भी है। शरणागति के साथ मन की दिशा, दृष्टि और जीवन की गति — तीनों बदल जाते हैं। भ्रम हटने लगता है, माया का प्रभाव ढीला होता है।


माया को पार करना इतना कठिन क्यों है?
क्योंकि माया स्वयं उस तत्त्व की शक्ति है और गुणों से युक्त है — सत्त्व, रजस, तमस इसके आधार हैं। यह व्यक्ति को उसके कर्म, वासना और अहंकार के माध्यम से बाँधे रखती है। जब तक वह तत्त्व की शरण में नहीं आता, यह बन्धन नहीं टूटता।

यदि माया भी उसी तत्त्व की शक्ति है, तो क्या उससे डरना चाहिए?
नहीं, माया से डरने की आवश्यकता नहीं, उसे समझने की आवश्यकता है। जब उसे सही दृष्टि से देखा जाए, तो वही माया आत्मगम्य बनने लगती है।

क्या ज्ञान प्राप्त करके भी माया को पार किया जा सकता है?
ज्ञान सहायक है, पर अकेला पर्याप्त नहीं। जब ज्ञान, भक्ति और शरण — ये तीनों मिलते हैं, तब माया पार होती है।


ईश कौन है और वह कैसे नियंता है?
ईश वह है जो सबके हृदय में स्थित है और अपनी माया द्वारा सबको उनके कर्मों के अनुसार चला रहा है। वह सबका आन्तरिक चालक है। उसके बिना कोई गति नहीं होती।

अगर वह सबको चला रहा है, तो क्या हमारी स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती है?
नहीं, ईश नियंत्रण देता है, पर विवेक की क्षमता भी देता है। हम अपने चुनावों के माध्यम से अपने मार्ग तय करते हैं — ईश उनमें आधार बनता है, बाधा नहीं।

क्या किसी अन्य तत्त्व को भी ईश कहा जा सकता है?
नहीं, क्योंकि ईश वह है जो सबका नियामक है — ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, चन्द्र — सब उसी की मर्यादा में कार्य करते हैं। अतः वही एक मात्र ईश है।


'हरि' का अर्थ क्या है और वह क्यों विशेष है?
हरि का अर्थ है — 'हरने वाला'। जो पाप, दुःख और माया के भ्रम को हर ले, वही हरि है। यह केवल नाम नहीं, एक कार्य का स्वरूप है।

हरि को अन्य देवों के साथ भी जोड़ा जाता है, तो यहाँ किसकी बात है?
यहाँ हरि, राम और ईश — तीनों शब्द मिलाकर स्पष्ट किया गया है कि सन्दर्भ श्रीराम का है। अन्य हरि जैसे परशुराम या बलराम नहीं, अपितु वही जो ईश्वर, हरि और राम — तीनों में एक है।

क्या यह केवल भावुक स्तुति है या इसमें तर्क भी है?
यह विशुद्ध तात्त्विक दृष्टि से कहा गया है। प्रत्येक शब्द के पीछे अर्थ और प्रमाण है — यह भाव नहीं, दर्शन है। यही स्तुति को सार्थक बनाता है।

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जय श्रीराम

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