न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः

रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्।
सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः।

 

देवों ने अमृत को पाने के लिए समुद्र का मंथन करना शुरू किया| पहले जब उनको कीमती रत्न मिलें तो वो उस से संतुष्ट होकर नहीं रुके| जब जानलेवा विष समुद्र से बाहर निकला तब भी वो डरकर रुके नहीं| उनका लक्ष्य था अमृत को पाना और अमृत के मिलने पर ही वे उस काम से विराम लिए| धैर्यवान लोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक विराम नहीं लेते|

 

88.3K

Comments

bbrsy
वेदधारा की वजह से हमारी संस्कृति फल-फूल रही है 🌸 -हंसिका

गुरुजी का शास्त्रों की समझ गहरी और अधिकारिक है 🙏 -चितविलास

वेदधारा का कार्य सराहनीय है, धन्यवाद 🙏 -दिव्यांशी शर्मा

आपकी मेहनत से सनातन धर्म आगे बढ़ रहा है -प्रसून चौरसिया

वेदधारा समाज के लिए एक महान सेवा है -शिवांग दत्ता

Read more comments

शक्ति के पांच स्वरूप क्या क्या हैं?

१. सत्त्वगुणप्रधान ज्ञानशक्ति २. रजोगुणप्रधान क्रियाशक्ति ३. तमोगुणप्रधान मायाशक्ति ४. विभागों में विभक्त प्रकृतिशक्ति ५. अविभक्त शाम्भवीशक्ति (मूलप्रकृति)।

सालासर बालाजी में दर्शन करने में कितना समय लगता है?

साधारण दिनों में सालासर बालाजी का दर्शन एक घंटे में हो जाता है। शनिवान, रविवार और मंगलवार को ३ से ४ घंटे लग सकते हैं।

Quiz

यज्ञ में ब्रह्मा की भूमिका क्या है ?
Copyright © 2024 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |