कृष्ण की पत्नियों का अनसुना रहस्य

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कृष्ण की पत्नियों का अनसुना रहस्य

व्यास जी ने जन्मेजय को विष्णु के अवतार की कथाएं बताया और देवी मां क्यों जगत जननी है, यह भी बताया। अब जन्मेजय प्रश्न पूछते हैं। आपने नर नारायण के आश्रम में आई हुई अप्सराओं की चर्चा की। वे अप्सराएं काम से पीड़ित होकर नारायण मुनि पर आसक्त हो गई। नारायण मुनि उनको शाप देने के लिए उद्यत हो गए थे। फिर उनके सहोदर नर ने उन्हें शाप देने से रोक दिया। इंद्र के द्वारा प्रेषित की गई अप्सराओं ने बार-बार मुनि नारायण से विवाह करने की प्रार्थना की। वे सब मन ही मन नारायण मुनि को अपना पति संकल्प कर चुकी थी। ऐसे संकट के उपस्थित होने पर नारायण ने क्या किया? यह मुझे बताइए। ऐसे मोक्षदायक चरित्र को मैं सुनना चाहता हूं। अब जन्मेजय के प्रश्नों का उत्तर देते हैं व्यास जी। सुनिए। मैं उन धर्मपुत्र मुनि नारायण के बारे में बता रहा हूं। नारायण मुनि को शाप देने के लिए उद्यत होते हुए देखकर नर ने उनको वैसे करने से रोक लिया। नारायण मुनि भी क्रोध से शांत होकर मंद मंद मुस्कुराते हुए अप्सराओं को देखकर कहे, देवियों, हम दोनों ने संकल्प किया है कि इस जन्म में किसी भी परिस्थिति में हम विवाह नहीं करेंगे। इस कारण से आप लोगों का पाणिग्रहण हम नहीं कर सकते। आप लोग हमें माफ़ करें और हम पर कृपा करके वापस स्वर्ग लोक चले जाएं। जो धर्मज्ञ होते हैं, वे दूसरों के व्रत का भंग नहीं करते। आप लोग धर्म को जानने वाली हैं। इसलिए स्वर्ग जैसे पवित्र स्थान में रह रही हैं। कृपया हमें छोड़कर आप वापस स्वर्ग लोक चले जाएं। श्रृंगारेस्मिन् रसेनूनं स्थायीभावो रतिस्मृतः कथं करोमि सम्बन्धं तदभावे सुलोचनाः कारणेन विना कार्यं न भवेदिति निश्चयः कविभिः कथितं शास्त्रे स्थायीभावो रसः किल वैवाहिक जीवन में श्रृंगार रस मुख्यः और कवियों ने रति को श्रृंगार रस का स्थाई भाव माना है। रति ही कारण है संबंध रूप कार्य का। पर हम दोनों आजीवन ब्रह्मचारी रहना चाहते हैं। इसलिए आप लोगों के साथ संबंध बनाना अनुचित होगा और वह हमारे व्रत भंग का कारण बन जाएगा। धन्य सुचारु सर्वांग सभाग्योयम धरातले प्रीति पात्रम यतो जातो भवती नाम कृत्रिमम भवतीभिः कृपाम कृत्वा रक्षणीयम। व्रतम मम भविष्यामि महाभागाः पतिरप्यन्य जन्मनि। नारायण कहे, मैं बहुत धन्य हूँ। इस भूमि में जन्म को प्राप्त करके भी आप जैसे पुण्यवतीयों का प्रीति पात्र बना, यह मेरा भाग्य है। आप लोग कृपा करके इस जन्म में मेरे इस व्रत की रक्षा कीजिए। मैं अवश्य ही अन्य जन्म में आप लोगों का पति बनूंगा। हम लोग यहां पर यह भी एक बार याद कर लें कि नर और नारायण भगवान विष्णु के ही अंशावतार हैं और भगवान विष्णु के सारे अवतार नर नारायण के पुनर्जन्म के बराबर हैं। नारायण मुनि कहे, अष्टाविंशे विशालाक्ष्यो द्वापरेस्मिन् धरातले देवानां कार्य सिद्ध्यर्थं प्रभविष्यामि सर्वथा तदा भवत्यो मद्दारा प्राप्य जन्म पृथक पृथक भूपती नाम सुता भूत्वा पत्नी भावम गमिष्यथ। 28वीं द्वापर युग में मैं देवों के कार्य को सिद्ध करने के लिए भूमि में अवतार लूंगा। अभी जो चल रहा है, वह वैवस्वत मन्वंतर का 71 में से 28वां कलियुग है। 28वां द्वापर युग मतलब पिछला युग, श्री कृष्णावतार का समय। नारायण कहे, उस समय आप लोग राजा की पुत्रियां बनकर जन्म लेंगी और मैं आप सबके साथ पाणिग्रहण करूंगा। नारायण तो साक्षात विष्णु के अंश पुरुष थे। उनकी बात को मानकर अप्सराएं वापस स्वर्ग चली गई और उनके वचनों से आश्वासन कैसा प्राप्त हुआ, यह अप्सराओं ने इंद्र को बताया। इसको सुनकर इंद्र बोले, अहो धैर्यं मुनेह कामं तथैवच तपो बलम्। उन मुनियों का धैर्य और तपो बल तो आश्चर्यजनक है। अपने तपोबल से तो उन्होंने अप्सराओं जैसे रूप वाली उर्वश आदियों को भी उत्पन्न कर दिया। मुनियों पर प्रसन्न हो गए थे इंद्र। फिर वे दोनों मुनि वापस सालों साल तक तपस्या करने लग गए। द्वापर युग में यही नर और नारायण, कृष्ण और अर्जुन के रूप में भूमि में अवतरित हुए और इस अवतार का एक और कारण था भृगु जी का शाप। जिसकी कथा हम पहले सुन चुके हैं।


  • नर और नारायण मुनि ने अप्सराओं के विवाह प्रस्ताव को स्वीकार क्यों नहीं किया?
    नर और नारायण मुनि ने इस जन्म में पूर्ण ब्रह्मचर्य का संकल्प लिया था। धर्मज्ञ होने के नाते वे अपने व्रत का भंग नहीं करना चाहते थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैवाहिक संबंध के लिए रति भाव आवश्यक है, जो उनके भीतर विद्यमान नहीं था, अतः बिना कारण के कार्य संभव नहीं था।
  • नारायण मुनि ने अप्सराओं को अपनी धर्मज्ञता सिद्ध करने के लिए क्या तर्क दिया?
    नारायण मुनि ने कहा कि जो वास्तव में धर्म को जानने वाले होते हैं, वे कभी किसी दूसरे के व्रत को भंग करने का प्रयास नहीं करते। चूंकि अप्सराएं स्वर्ग जैसे पवित्र स्थान में रहती हैं, इसलिए उन्हें मुनियों के तप और व्रत की मर्यादा का सम्मान करते हुए वापस लौट जाना चाहिए।
  • मुनि नारायण ने अप्सराओं की इच्छा पूर्ति के लिए क्या वचन दिया?
    मुनि ने अप्सराओं को सांत्वना देते हुए कहा कि यद्यपि वे इस जन्म में विवाह नहीं कर सकते, परंतु आगामी २८वें द्वापर युग में जब वे पुनः अवतार लेंगे, तब वे उन सभी अप्सराओं के पति बनेंगे।
  • नारायण मुनि के अनुसार श्रृंगार रस और विवाह का पारस्परिक संबंध क्या है?
    मुनि ने शास्त्रीय दृष्टिकोण रखते हुए बताया कि श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति है। रति ही वह कारण है जिससे विवाह जैसा संबंध रूपी कार्य सिद्ध होता है। मुनियों के हृदय में वैराग्य होने के कारण उस स्थायी भाव का अभाव था, इसलिए संबंध बनाना अनुचित होता।
  • २८वें द्वापर युग में अवतार लेने का मुख्य प्रयोजन क्या बताया गया है?
    नारायण मुनि ने बताया कि वे २८वें द्वापर युग में देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए और अधर्म के विनाश हेतु पृथ्वी पर अवतार लेंगे।
  • अप्सराएं अगले जन्म में किस रूप में अवतरित होने वाली थीं?
    नारायण मुनि के वरदान के अनुसार, वे अप्सराएं विभिन्न राजाओं की पुत्रियों के रूप में जन्म लेने वाली थीं, ताकि समय आने पर भगवान के साथ उनका विवाह संपन्न हो सके।
  • मुनियों की धैर्यशीलता को देखकर देवराज इंद्र की क्या प्रतिक्रिया थी?
    इंद्र मुनियों के अटूट धैर्य और तपोबल को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें इस बात का बोध हुआ कि जिन मुनियों ने अपने तपोबल से उर्वशी जैसी सुंदर अप्सराएं उत्पन्न कर दी हों, उन्हें सांसारिक काम विचलित नहीं कर सकता।
  • द्वापर युग में नर और नारायण ने किन महापुरुषों के रूप में अवतार लिया?
    नर और नारायण मुनि ने द्वापर युग में क्रमशः अर्जुन और श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। श्रीकृष्ण साक्षात विष्णु के पूर्ण स्वरूप थे और अर्जुन उनके नित्य सखा नर के अंश थे।
  • मुनियों के पृथ्वी पर पुनः अवतार लेने के पीछे दैवीय विधान के अतिरिक्त और क्या कारण था?
    देवताओं के कार्य की सिद्धि के अतिरिक्त, भृगु ऋषि द्वारा दिया गया शाप भी भगवान के इस धरातल पर अवतरण का एक महत्वपूर्ण कारण था।
  • इस कथा से हमें व्रत और संकल्प की शक्ति के विषय में क्या रहस्य पता चलता है?
    यह कथा सिखाती है कि महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए लिया गया संकल्प अटल होना चाहिए। भगवान स्वयं अपने द्वारा निर्धारित मर्यादाओं और व्रतों का पालन करते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना ही वास्तविक तपोबल है।
हिन्दी

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देवी भागवत

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