दुसह दोष - गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा विरचित देवी स्तुति

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दुसह दोष - गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा विरचित देवी स्तुति

दुसह दोष-दुख दलनि,  करु देवि दाया ।

विश्वमूलाऽसि जनसानुकूलाऽसि, कर सूलधारिणि महामूलमाया ।।

 

तड़ित गर्भांग सर्वांग सुंदर लसत, दिव्य पट भव्य भूषण विराजै ।

बालमृग-मंजु खंजन-विलोचनि चंद्रवदनि लखि कोटि रतिमार लाजै ।।

 

रूप सुख-सील-सीमाऽसि भीमाऽसि रामाऽसि वामाऽसि वर वुद्धिवानी ।

छ्मुख-हेरम्ब-अम्वासि जगदम्बिके शंभु-जायासि जय जय भवानी ।।

 

चंड-भुजदण्ड-खंडनि बिहंडनि महिष, मुंड-मद-भंगकर अंग तोरे ।

सुंभ निःसुंभ कुम्भीस रन केसरिनि, क्रोध-वारीस अरि-वृंद वोरे ।।

 

निगम-आगम अगम गुर्वितवगुन कथन, उर्विधर करत जेहि सहस जीहा ।

देहि माँ, मोहि पन प्रेम यह नेम निज, राम घनश्याम तुलसी पपीहा ।।

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