दुष्ट जनों से लॊग राजा कार्तवीर्यार्जुन के समान डरते हैं

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दुष्ट जनों से लॊग राजा कार्तवीर्यार्जुन के समान डरते हैं

कार्तवीर्य अर्जुन, सहस्रभाहु का वृत्तांत कुछ ऐसा है। वे माहिष्मती के राजा कृत्तवीर्य के पुत्र थे। वे माहिष्मती में राज्य करते थे। तब दत्तात्रेय जी ने उन्हें एक शक्ति दी। वे बैठे-बैठे सबके मन की बात जान सकते थे। उनके राज्य में यदि कोई किसी की हानि सोचता, तो वे धनुष-बाण लेकर उस हानि सोचने वाले को मारने निकल पड़ते थे। वैसे ही दुर्जन भी जब किसी के हित की बात सुनते हैं, तो वहाँ जाकर विघ्न डालने निकल पड़ते हैं।

कार्तवीर्य अर्जुन से उनकी ही प्रजा डरने लगी थी — कहीं हम किसी की हानि चाहेंगे तो राजा हमें मार न दें। उसी प्रकार दुर्जन से भी सब डरते हैं कि ये कहीं आकर विघ्न न डाल दें। यदि कोई वस्तु खो जाए या कहीं रह जाए, तो लोग कार्तवीर्य अर्जुन मंत्र का जप करते हैं —

'कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान्।
यस्स्य संस्मरणादेव हृतं नष्टं च लभ्यते॥'

यह राजा अदृश्य वस्तु को भी ढूंढ निकाल सकता है। अपने हजार हाथों के समान तेज से वह वस्तु को शीघ्रता से खोजकर बाहर लाता है — ऐसा विश्वास है। इसी तरह दुर्जन भी अपने हजार हाथों के समान बुद्धि और परिश्रम से हर अच्छे कार्य में बाधा डालते हैं। जहाँ कहीं भी अच्छाई या हित की बात हो रही होती है, वहाँ जाकर विघ्न डालने के लिए उन्हें मन में प्रेरणा मिलती है। उन्हें मेरा प्रणाम।

जो दोष प्रकट नहीं होते, उन्हें भी ये दुर्जन जान लेते हैं। उनकी दृष्टि इतनी सूक्ष्म होती है कि मानो हजार आँखों से देख रहे हों। वे इतनी बारीकी से देखते हैं कि कोई छोटा-सा भी दोष छिप नहीं पाता। गुप्त दोष को देखने के चक्कर में ये प्रकट दोष को भी छोड़ते नहीं। वे प्रकट और गुप्त दोनों दोषों को पहचान लेते हैं।

वे घी में चिपकने वाली मक्खी के समान परहित करने वालों में जाकर चिपकते हैं। घी आयुवर्धक और बलवर्धक होता है; लेकिन जब उसमें मक्खी गिर जाती है, तो वह कुछ समय तक उपयोग योग्य नहीं रहता। लोग उस मक्खी को घी से निकालकर बाहर फेंक देते हैं। वैसे ही दुष्टजन परहित करने वाले सज्जनों से चिपककर उनके मन को हानि पहुँचाते हैं। अंत में कोई भी उनकी बात पर विश्वास नहीं करता। तब वे भी मक्खी की तरह बाहर फेंक दिए जाते हैं।

 

मन की बात जानने की शक्ति से शासन में क्या बदलाव आता है?
शासक अपराध या अन्याय के पहले संकेत को पहचान सकता है और समय रहते रोकथाम कर सकता है, जिससे भय बना रहता है और अनुशासन बढ़ता है।

क्या अगर किसी नेता को ऐसी शक्ति मिल जाए, तो वह आदर्श नेता कहलाएगा?
अगर वह विवेक और करुणा से इसका उपयोग करे, तो हाँ। लेकिन अगर वह दमन के लिए इस्तेमाल करे, तो यह शक्ति डर का कारण बन जाती है।

क्या किसी के विचार पढ़ना नैतिक रूप से स्वीकार्य है?
निजता के अधिकार की दृष्टि से यह अनुचित है। भले उद्देश्य हो, पर बिना सहमति मनोविचार जानना नैतिक रूप से असंतुलित होता है।

राजा के मन-पठनीय गुण ने प्रजा में कैसी मानसिकता पैदा की?
लोग सिर्फ अपने कर्म ही नहीं, अपने विचारों को भी नियंत्रित करने लगे। शासन का डर उनके सोचने की आज़ादी पर भी प्रभाव डालने लगा।

क्या यह डर प्रजा को अधिक संयमी और सतर्क बनाता है?
कुछ हद तक हाँ, लेकिन यह स्वाभाविक सदाचार नहीं, बल्कि दबाव में पैदा हुआ अनुशासन होता है जो भीतर विद्रोह भी जगा सकता है।

क्या ऐसा शासन टिकाऊ और न्यायसंगत कहा जा सकता है?
नहीं। दीर्घकाल में भय पर टिका शासन विश्वास खो देता है और समाज में तनाव, दोहरापन और असंतुलन पैदा करता है।

नामस्मरण से खोई वस्तु कैसे मिल सकती है?
यह स्मरण व्यक्ति के चित्त को स्थिर करता है, जिससे वह अधिक एकाग्रता से ढूँढ़ने लगता है और वस्तु मिलने की संभावना बढ़ती है।

क्या यह केवल मानसिक विश्वास का असर है या कुछ चमत्कारी प्रभाव भी है?
मुख्यतः यह विश्वास और ध्यान का प्रभाव है, लेकिन श्रद्धा से जुड़ी मानसिक शक्ति भी परिणाम को दिशा देती है।

क्या यह मान्यता अंधविश्वास के दायरे में आती है?
अगर इसे केवल जप से वस्तु प्रकट होने की आशा के रूप में लिया जाए तो हाँ, पर यदि इसे ध्यान-संयम की तकनीक समझा जाए तो यह व्यवहारिक है।

दुर्जन परहित होते कार्यों से चिढ़ क्यों जाते हैं?
क्योंकि उन्हें दूसरों की सफलता या भलाई में स्वयं की हीनता महसूस होती है। उनकी कुंठा उन्हें बाधा डालने को प्रेरित करती है।

क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति सिर्फ दूसरों को परेशान करने के लिए ही सक्रिय हो?
हाँ, जब किसी का मन द्वेष से भर जाए तो उसे दूसरों की खुशी असहनीय लगने लगती है, और वह उन्हें गिराने की कोशिश करता है।

क्या ऐसा सोचना अतिशयोक्ति नहीं है?
नहीं। व्यवहार में हम कई बार ऐसे व्यक्तियों को देखते हैं जो सकारात्मक प्रयासों में विघ्न डालते हैं — न किसी लाभ के लिए, सिर्फ विरोध की मानसिकता से।

किसी की सूक्ष्म त्रुटियाँ देख लेना क्या तीव्र बुद्धि का संकेत है?
हां, लेकिन जब यह दृष्टि सुधार के लिए न होकर आलोचना और नीचा दिखाने के लिए हो, तो यह दुर्जनता बन जाती है।

क्या हर दोष को उजागर करना जरूरी होता है?
नहीं, सज्जनता यह है कि सही समय पर सही दृष्टिकोण से सुधार किया जाए, न कि त्रुटि ढूंढ़कर अपमान किया जाए।

क्या दोष खोजने की प्रवृत्ति अस्वाभाविक है?
यदि वह सतत और नकारात्मक हो, तो यह मानसिक संतुलन के अभाव और दुष्ट वृत्ति का संकेत होती है।

यह उपमा क्या संकेत देती है?
दुष्ट व्यक्ति न केवल स्वयं हानिकारक होते हैं, बल्कि उनके संपर्क से सज्जन भी बदनाम या अशांत हो जाते हैं।

क्या सज्जनों को ऐसे व्यक्तियों से दूरी बनानी चाहिए?
अवश्य। सज्जनों को विवेकपूर्वक संगति चुननी चाहिए, जिससे उनकी साधना और सेवा निष्कलुष बनी रहे।

क्या एक दुष्ट की उपस्थिति पूरे वातावरण को दूषित कर सकती है?
हाँ। जैसे एक बूँद ज़हर पूरा पात्र विषैला बना देती है, वैसे ही एक दुर्जन समूह की ऊर्जा को नष्ट कर सकता है।

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जय श्रीराम

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