तेजो यस्य विराजते स बलवान्

हस्ती स्थूलतनुः स चाङ्कुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः

वज्रेणाभिहताः पतन्ति गिरयः किं शैलमात्रः पविः।

दीपे प्रज्वलिते विनश्यति तमः किं दीपमात्रं तमः

तेजो यस्य विराजते स बलवान् स्थूलेषु कः प्रत्ययः।।

इसे थोड़ा गहराई से, एक-एक पंक्ति को खोलते हुए समझते हैं।

यह श्लोक एक ही प्रश्न बार-बार पूछता है — क्या शक्ति का माप आकार से होता है?

और हर बार उत्तर देता है — नहीं।

1. हाथी और अंकुश

हाथी स्थूल है, विशाल है, अपार बल रखता है। फिर भी वह एक छोटे से अंकुश के नियंत्रण में चलता है।

अंकुश हाथी से न तो भारी है, न बड़ा है, न शक्तिशाली दिखता है।

लेकिन उसमें नियंत्रण है। वह सही स्थान पर, सही ढंग से लगाया जाता है।

संदेश साफ है जिसके पास नियंत्रण है, वह बलवान को भी चला सकता है।

2. पर्वत और वज्र

पर्वत अचल लगते हैं। हजारों वर्षों से खड़े रहते हैं।

लेकिन एक वज्र का प्रहार उन्हें तोड़ देता है।

वज्र पहाड़ जितना बड़ा नहीं है। वह स्थूल नहीं, तीक्ष्ण और केंद्रित है।

यहां बल नहीं, तीक्ष्णता काम करती है।

फैलाव नहीं, एकाग्र शक्ति निर्णायक होती है।

3. अंधकार और दीपक

अंधकार बहुत फैल सकता है। कमरे, भवन, वन, आकाश — सब ढक लेता है।

पर एक छोटा सा दीपक जलते ही अंधकार मिट जाता है।

दीपक अंधकार से लड़ता नहीं। वह बस प्रकट होता है

अंधकार का नाश संघर्ष से नहीं, प्रकाश के उदय से होता है।

अंतिम प्रश्न — असली बल क्या है?

श्लोक का अंतिम वाक्य सबसे तीखा है —

जिसका तेज प्रकट होता है, वही बलवान है। स्थूलता में भरोसा करना मूर्खता है।

यहां ‘तेज’ का अर्थ केवल प्रकाश नहीं है।

तेज का अर्थ है — स्पष्टता, बुद्धि, धर्म, संकल्प, आत्मबल।

गहरा जीवन-संदेश

यह श्लोक मनुष्य की सबसे बड़ी भूल पर प्रहार करता है — बाहरी प्रभाव से भ्रमित होना।

  • ऊंची आवाज शक्ति नहीं है

  • बड़ा शरीर बल नहीं है

  • ज्यादा संख्या सत्य नहीं है

  • फैलाव प्रभाव नहीं है

जो भीतर से स्थिर, स्पष्ट और तेजस्वी है, वही परिस्थिति को मोड़ देता है।

आज के जीवन में अर्थ

  • शांत बुद्धि वाला व्यक्ति उग्र भीड़ को दिशा दे दे सकता है

  • स्पष्ट विचार वाला एक व्यक्ति भ्रमित संगठन को बदल सकता है

  • सत्य का एक शब्द झूठ के पहाड़ को गिरा सकता है

यही कारण है कि शास्त्र बार-बार कहते हैं — सूक्ष्म को हल्का मत समझो।

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