खल जनों की शेषजी और राजा पृथु से व्यंग्यात्मक उपमा

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खल जनों की शेषजी और राजा पृथु से व्यंग्यात्मक उपमा

 

वंदवु खलजन सेश सरोषा। सहस बदन बरनहि परदोषा।
पुनि प्रनवउ पृथुराज समाना। पर अघ सुनहि सहस दसकाना॥
बहुरि सक्र सम विनवउ तेही। संतन सुरानिहि कहइ जेही।
बचन बज्र जेहि सदा पियारा। सहस नयन परदोष निहारा॥

मैं खलजनों को शेषजी के समान मानकर प्रणाम करता हूं। शेषजी स्वयं विष्णु भगवान के शय्या हैं। तुलसीदासजी दुष्टजनों को शेषजी के समान मानते हैं। प्रलयकाल में जब शेषजी क्रोधित होते हैं, तब समस्त भुवनों का विनाश होता है। उसी प्रकार जब खलजन क्रोधित होते हैं, तब सत्कर्मों का विनाश हो जाता है।

शेषजी के सहस्र मुख हैं, उनसे वे भगवान विष्णु के यश का वर्णन करते रहते हैं। वैसे ही खलजन दूसरों के दोष का वर्णन करते हैं—एक मुख होते हुए भी हजार मुखों के समान बोलते हैं।

शेषजी भगवान विष्णु की भक्ति में सदा लीन रहते हैं; इस कारण वे अपने गुणों का कभी बखान नहीं करते, देखते तक नहीं। उसी प्रकार खलजन दूसरों के दोषों का वर्णन करते हुए अपने दोषों को देखना नहीं चाहते।

वे हजार मुखों से बोलते हैं और दस हजार कानों से सुनते हैं, राजा पृथु की तरह। राजा पृथु का पिता, राजा वेन, बड़ा दुष्ट था। उसने बहुत अत्याचार किए, इसलिए मुनियों ने मंत्रबल से उसे मार डाला। उसकी मृत्यु के बाद, जब उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं था, तब मुनियों ने वेन के शरीर का मंथन कर राजा पृथु को उत्पन्न किया।

राजा पृथु ने अनेक यज्ञ किए। इससे इंद्र को भय हुआ। उसने उनका यज्ञोपयोगी घोड़ा चुरा लिया। तब क्रोधित होकर राजा पृथु ने कुश को बाण बनाकर अभिमंत्रित किया ताकि इंद्र को भस्म कर दें। उसी समय ब्रह्माजी ने उन्हें समझाया—'इंद्र का पद भी अनित्य है; कुछ समय के लिए ही वह इंद्र बना है। यदि कोई नित्य स्थान है, तो वह विष्णु चरणों में है।'

ब्रह्मा जी के उपदेश से राजा पृथु ने विष्णु भक्ति का अमृत पान किया। उन्होंने विष्णु भगवान से वरदान मांगा—'मेरे दस हजार कान हों, ताकि मैं आपकी महिमा सदा सुनता रहूं।'

दस हजार कानों से भगवान विष्णु की महिमा सुनते हुए भी राजा पृथु तृप्त नहीं हुए। उसी प्रकार खलजन दूसरों के दोषों को दस हजार कानों से सुनते हुए भी कभी तृप्त नहीं होते।

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जय श्रीराम

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