कौन है अशिष्य ?

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कौन है अशिष्य ?

महाभारत के पौष्य पर्व से आदर्श गुरु शिष्य संबंध के बारे में हमें बहुत कुछ पता चलता है।

गुरुकुल संप्रदाय में गुरुजी शिष्य की पात्रता देखते हैं, योग्यता देखते हैं।

गणेश अथर्व शीर्ष में कहा है, अशिष्याय न देयम यो यदि मोहात् दास्यति स पापीयान भवति। इस विद्या का उपदेश कभी अशिष्य के लिए मत करो, नहीं तो पापी बन जाओगे। यह गुरु के लिए चेतावनी है, नहीं तो शिष्य के हाथों उसका दुरुपयोग हो जाएगा।

और शिष्य पापम गुरुरपि, उस पाप का फल गुरु को भी भुगतना पड़ेगा।

अशिष्य का अर्थ है जिसमें शिष्य होने की विनय, सत्य आदि योग्यताएं नहीं है। वेद विद्या को पाने के लिए इससे भी कई अधिक गुणों की आवश्यकता है।

आजकल वेदों का अध्ययन कोई अपनी जीविका के लिए करता है, पौरोहित्य करने। कोई कोई मैं विद्वान हूं ऐसे दिखाने के लिए, लेकिन शास्त्र में बोला है ब्राह्मणेन निष्कारणं षडंगो वेदोध्ययोज्ञेयश्च। कारण सोचे बिना वेद और वेदांगों का अध्ययन करना चाहिए। ऐसा नहीं कि वेद का अध्ययन करने से मुझे यह लाभ मिलेगा, दक्षिणा दान धन की प्राप्ति होगी, सम्मान की प्राप्ति होगी। ऐसे भी लोग हैं आपको।

मालूम भी नहीं होगा कि इन्होंने वेदों का अध्ययन किया है।

प्रदर्शन नहीं करते। उनके लिए वेदाध्ययन से कोई लौकिक प्रयोजन है ही नहीं। अगर लौकिक प्रयोजन नहीं है तो भी पाने योग्य विद्या है वेद।

तो गुरु का सबसे पहला कर्तव्य यह है कि शिष्य की योग्यता को जांचना। जांचते रहना। शिष्य में पात्रता को लाना अगर नहीं है तो। लेकिन पहले के जमाने में बच्चे 5-6 साल की उम्र में ही गुरुकुल जाते थे। उनमें अपात्रता की बात कहां से आती है?

ना फेसबुक था, ना व्हाट्सएप था, ना यूट्यूब था, ना न्यूज़ चैनल, ना पिक्चर। तो अपात्रता कहां से आ सकती है? अपात्रता आ सकती है पूर्व जन्म की वासनाओं से। इसका पता करके शिष्य में पात्रता लाना है गुरुजी का काम।

शिष्य में योग्यता आ गई तो क्षण भर में सारा ज्ञान शिष्य में सन्निवेश कर देते थे। इस पात्रता को लाने में ही सालों लग जाते थे। पहले अरुणी की कहानी में हमने देखा गुरुजी के द्वारा दिए हुए छोटे-छोटे आदेशों का भी पालन शिष्य को करना पड़ता है बिना सोचे ही।

यह एक बहुत बड़ा गुण है क्योंकि यज्ञ करते समय ऐसे बहुत सारे नियम रहते हैं। यज्ञ कुंड की दाहिनी ओर से आहुदि दो, खड़े होकर आहुदि दो, 15 लकड़ियों को अग्नि में एक-एक करके रखो। बाहर से देखोगे तो लगेगा दाहिनी ओर से या बाएं ओर से क्या फर्क पड़ता है? खड़े होकर डालो या बैठकर डालो क्या फर्क पड़ता है? एक-एक करके रखो या एक साथ में रखो क्या फर्क पड़ता है? फर्क पड़ता है। ब्राह्मण ग्रंथों को देखोगे तो पता चलेगा, हर एक का प्रभाव और परिणाम अलग होता है।

है। हर एक के पीछे जाकर छानबीन करोगे तो हजारों साल लगेंगे। ऋषियों ने सोच समझ कर ही पद्धतियां बनाई हैं। इसलिए जैसे बोला गया है वैसा करो। वेद विद्या को पाने के लिए यह एक बहुत ही आवश्यक गुण है। इसके बिना आगे चलकर आपत्तियां हो सकती हैं। अरुण्य के विषय में धौमी यही देख रहे थे, इसमें यह गुण आ गया है या नहीं।

जैसे उनको पता चला कि आ गया है, तो उन्होंने उसी क्षण आरुणी को संपूर्ण वेदों का और शास्त्रों का ज्ञान दे दिया और बोला कि अब तुम घर जा सकते हो, तुम्हारा अध्ययन हो गया है।


  • गुरु को विद्या प्रदान करने से पूर्व शिष्य की पात्रता का परीक्षण क्यों करना चाहिए और अपात्र को विद्या देने का क्या परिणाम होता है?
    गुरु को यह देखना होता है कि शिष्य में विनय और सत्य जैसे गुण हैं या नहीं। गणेश अथर्वशीर्ष के अनुसार यदि मोहवश किसी अपात्र को विद्या दी जाती है, तो वह उसका दुरुपयोग कर सकता है। शास्त्रों के अनुसार शिष्य द्वारा किए गए पाप का फल गुरु को भी भोगना पड़ता है, इसलिए अपात्र को विद्या देना गुरु को पाप का भागी बनाता है।
  • प्राचीन काल में पांच या छह वर्ष की आयु में ही बालक गुरुकुल चले जाते थे, उस समय आधुनिक विकर्षण न होने पर भी बालकों में अपात्रता का क्या कारण माना गया है?
    प्राचीन काल में आधुनिक विकर्षणों का अभाव था, परंतु फिर भी बालकों में पूर्व जन्म की वासनाओं और संस्कारों के कारण अपात्रता हो सकती थी। गुरु का मुख्य कार्य इन पूर्व जन्म की वासनाओं का ज्ञान प्राप्त करके शिष्य के अंतःकरण को शुद्ध करना और उसमें विद्या ग्रहण करने की पात्रता उत्पन्न करना था।
  • वर्तमान समय में वेदाध्ययन के लौकिक प्रयोजनों और शास्त्रों में वर्णित निष्काम वेदाध्ययन में क्या मूल अंतर है?
    वर्तमान में लोग जीविका, धन, सम्मान अथवा विद्वता के प्रदर्शन जैसे लौकिक प्रयोजनों के लिए वेदों का अध्ययन करते हैं। इसके विपरीत, शास्त्रों का निर्देश है कि ब्राह्मण को बिना किसी कारण या लौकिक स्वार्थ के छह अंगों सहित वेदों का अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि वेद विद्या स्वयं में ही प्राप्त करने योग्य परम धन है।
  • गुरुकुल परंपरा में शिष्य की पात्रता विकसित करने और उसे संपूर्ण ज्ञान प्रदान करने में लगने वाले समय का क्या रहस्य है?
    गुरुकुल व्यवस्था का यह एक अत्यंत रहस्यमयी पहलू है कि शिष्य के भीतर विनय, सत्य और आज्ञापालन जैसे गुण विकसित करके उसे पात्र बनाने में गुरु को अनेक वर्ष लग जाते थे। परंतु जैसे ही शिष्य में पूर्ण पात्रता आ जाती थी, गुरु क्षण भर में ही उसे संपूर्ण वेदों और शास्त्रों का ज्ञान हस्तांतरित कर देते थे। ज्ञान देने में समय नहीं लगता, अपितु पात्र बनने में समय लगता है।
  • आरुणि की कथा के माध्यम से शिष्य के किस अत्यंत आवश्यक और सूक्ष्म गुण को दर्शाया गया है?
    आरुणि की कथा यह दर्शाती है कि शिष्य को गुरु द्वारा दिए गए छोटे-छोटे और सामान्य प्रतीत होने वाले आदेशों का भी बिना किसी तर्क-वितर्क या संशय के पालन करना चाहिए। गुरु के वचनों में पूर्ण श्रद्धा और बिना सोचे आदेश का पालन करना ही वेद विद्या प्राप्त करने का सबसे महत्वपूर्ण गुण है।
  • यज्ञ की विधियों में बताए गए छोटे-छोटे नियमों का क्या महत्व है और उन पर तर्क करना क्यों अनुचित माना गया है?
    यज्ञ के नियमों का निर्माण ऋषियों ने अत्यंत गहन शोध और समझ के पश्चात किया है। ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार आहुति देने की दिशा, खड़े होने या बैठने की स्थिति, और समिधा रखने की विधि जैसे प्रत्येक छोटे कार्य का भिन्न प्रभाव और परिणाम होता है। यदि कोई इन पर तर्क करके स्वयं छानबीन करने लगे, तो उसे हजारों वर्ष लग जाएंगे, इसलिए ऋषियों की पद्धतियों का यथावत पालन ही उचित है।
  • समाज में ऐसे कौन से गुप्त विद्वान होते हैं और उनकी मानसिकता प्रदर्शन करने वाले विद्वानों से किस प्रकार भिन्न होती है?
    समाज में ऐसे अनेक उच्च कोटि के विद्वान होते हैं जिन्होंने वेदों का गहन अध्ययन किया होता है, परंतु सामान्य लोगों को इसका तनिक भी भान नहीं होता। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी विद्या का प्रदर्शन नहीं करते। उनकी मानसिकता पूर्णतः निष्काम होती है और वे वेदाध्ययन को किसी लौकिक प्रयोजन, धन या ख्याति प्राप्ति का साधन नहीं मानते।
  • महर्षि धौम्य ने आरुणि की शिक्षा पूर्ण होने का निर्णय किस आधार पर लिया और उसके पश्चात क्या किया?
    महर्षि धौम्य निरंतर आरुणि का परीक्षण कर रहे थे कि उसमें गुरु की आज्ञा का बिना तर्क किए पालन करने का गुण और पूर्ण समर्पण उत्पन्न हुआ है या नहीं। जैसे ही उन्हें यह ज्ञात हुआ कि आरुणि में यह पात्रता आ गई है, उन्होंने उसी क्षण उसे संपूर्ण वेदों और शास्त्रों का ज्ञान प्रदान कर दिया और अध्ययन पूर्ण मानकर उसे आश्रम से प्रस्थान करने की अनुमति दे दी।
  • अपात्र अथवा अशिष्य शब्द के निहित और गूढ़ अर्थ क्या हैं, जो उसे वेद विद्या के अयोग्य बनाते हैं?
    अपात्र का गूढ़ अर्थ मात्र अज्ञानी होना नहीं है, अपितु इसका अर्थ है वह व्यक्ति जिसके अंतःकरण में शिष्य बनने योग्य मूलभूत गुणों का अभाव हो। जिसमें विनय, नम्रता, सत्यनिष्ठा, गुरु के प्रति समर्पण और निष्काम भाव नहीं होता, वह विद्या का अधिकारी नहीं कहलाता। वेद विद्या अत्यंत पवित्र है, अतः इन गुणों के अभाव में व्यक्ति इसे धारण करने का अधिकारी नहीं होता।
  • विद्या दान की प्रक्रिया में गुरु का सबसे प्रथम और निरंतर चलने वाला कर्तव्य क्या बताया गया है?
    विद्या दान की प्रक्रिया में गुरु का सबसे प्रथम कर्तव्य शिष्य की योग्यता और पात्रता का परीक्षण करना है। यह मात्र एक दिन की प्रक्रिया नहीं है, अपितु गुरु को निरंतर शिष्य की परीक्षा लेते रहना होता है और यदि शिष्य में पात्रता का अभाव हो, तो उसे अपने तपोबल और अनुशासन से शिष्य के भीतर उस पात्रता को विकसित करना होता है।
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