
महाभारत का पौष्य पर्व गुरु शिष्य संबंध के बारे में है। खास करके शिष्य में क्या क्या गुण चाहिए? गुरु को शिष्य की परीक्षा कैसे करनी चाहिए इसके बारे में। पहली बात गुरु जो भी कहते हैं चाहे वो कितनी भी महत्वहीन लगे असंगत लगे।
उसका पालन शिष्य को करना चाहिए क्योंकि अच्छा गुरु जो भी कहेगा उसके पीछे कुछ ना कुछ कारण रहेगा। गुरुजी धौम्य के दूसरे शिष्य थे उपमन्यु। कुछ लोगों में ढकोसला करने का कौशल रहता है। अब कुछ भी नियम लाओ वे रास्ता निकाल ही लेते हैं।
वे जो चाहते हैं उसे कर लेते हैं और पकड़े जाने पर ऐसा बहस निकालते हैं कि उनका अपराध बेबुनियाद भी साबित हो जाता है। इसलिए सरकार को हर दिन नया नया कानून बनाना पड़ता है कि ऐसे लोग कानून से भाग ना पाएं। उपमन्यु भी ऐसा एक शिष्य था।
उपमन्यु में दोष यह था कि वह गुरु जी का इरादा नहीं समझ पा रहा था। वेद और शास्त्र के पालन में शब्दार्थ के अनुसरण के साथ-साथ इरादों को समझना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।
जीवन भर पूजा घर में दीप जलाओ, पर दीप जलाना रोशनी के लिए है, ऐसे समझोगे तो दीप बंद करके ट्यूबलाइट जलाने लगोगे। पूजा घर में दीप प्रकाश के लिए नहीं है, वो अग्नि का प्रतीक है। अग्नि जो घर के स्वामी हैं, उसमें जो घी या तेल है, वो होम के द्रव्य के जैसा है।
यह तत्व नहीं जानोगे तो सारा परिश्रम विफल है ना। इसलिए वेद और शास्त्र के गूढ़ार्थ और इरादे बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। उपमन्यु को गुरुजी ने कहा गायों को चराने ले जाओ, उनकी रक्षा करो। पर गुरुजी ने भोजन की कोई व्यवस्था नहीं की।
सुबह उपमन्यु गायों को लेकर वन चला जाता था और शाम को आश्रम वापस आता था।
कुछ दिन बीत गए। गुरुजी बोले बेटा उपमन्यु तुम तो उतना ही मोटा दिखाई दे रहे हो जितना पहले थे। क्या दिन में कुछ खाते हो क्या? उपमन्यु ने कहा हां गुरुजी दोपहर को गांव में जाकर भिक्षा स्वीकार करता हूं और उसे खा लेता हूं। तुम्हें पता नहीं है भिक्षा के ऊपर गुरुजी का अधिकार है शिष्य का नहीं।
मुझे लाकर देना चाहिए। जी गुरुजी, कल से वैसे ही करूंगा। शाम को आश्रम लौटते वक्त साथ में भिक्षा भी लाने लगा और कुछ दिन बीत गए। उपमन्यु उतना ही मोटा। तुम तो फिर भी हृष्ट पुष्ट ही हो। करते क्या हो? गुरुजी, एक बार आपके लिए भिक्षा लेता हूं।
एक और बार मेरे लिए लेकर उसे खा लेता हूँ। तुम समझते नहीं हो इससे क्या होता है पता है? तुम अन्य किसी ब्रह्मचारी का हक छीन रहे हो। गृहस्थ लोग भी कितना दे पाएंगे? कोई अन्य ब्रह्मचारी जाएगा तो उसे मना करना पड़ेगा उन्हें। ठीक है गुरुजी आगे से ऐसा नहीं करूंगा। और कुछ दिन।
निकले। उपमन्यु फिर भी मोटा। कुछ खाते हो क्या?
गुरुजी, थोड़ा सा दूध पी लेता हूँ।
तुम्हें किसने अनुमति दी? यह तो चोरी है।
जी गुरुजी आगे नहीं करूंगा। और कुछ हफ्ते निकले फिर भी उपमन्यु उतना ही मोटा। इस बार उसने कहा बछड़े दूध पीते समय जो फेन उगल देते हैं उसे लेकर पीता हूं। बछड़े तुम्हें भूखा देकर ज्यादा उगल देते होंगे।
उनका पेट नहीं भरता होगा, तुम यह भी नहीं कर सकते। सारे रास्ते गुरुजी द्वारा बंद कर दिए गए। एक दिन भूख सहन नहीं हो पा रहा था। उससे उपमन्यु आसपास से कुछ पत्ते तोड़कर उसे चबाने लगा। वे आंख के पत्ते थे। उपमन्यु अंधा हो गया।
शाम को वो आश्रम नहीं लौटा तो गुरुजी उसे ढूंढ कर निकले। तब तक उपमन्यु एक कुएं में गिर चुका था। गुरुजी की आवाज सुनकर उसने कहा, गुरुजी मैं यहां हूं, मैं अंधा हो गया हूं। गुरुजी बोले, वहीं से अश्विनी देवों से प्रार्थना करो, वे वैद्य हैं, वे ही तुम्हें ठीक कर सकते हैं।
उपमन्यु कुए के अंदर रहकर अश्विनी देवों की स्तुति करने लगा। कुछ समय बाद वे प्रकट हुए। उन्होंने कहा, हम तुम्हारी स्तुति से प्रसन्न हो गए हैं। यह एक पुआ है, इसे खा लो, तुम ठीक हो जाओगे। उपमन्यु ने कहा, हे भगवान, गुरु जी की अनुमति लिए बगैर मैं इसे नहीं खा सकता। देवों ने कहा,
तुम्हारे गुरुजी ने भी पहले हमारी स्तुति की थी, हमने उन्हें भी पुआ दिया था। उन्होंने कभी अपने गुरुजी की अनुमति नहीं मांगी। तब तक उपमन्यु समझ गया था, क्षमा कीजिए मैं ऐसा नहीं कर सकता। अश्विनी देवी भी समझ गए कि उपमन्यु अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया है।
अब इसमें वेद और शास्त्र को समझने की योग्यता आ गई है। यह भूख जैसे शारीरिक विकारों का भी सहन कर पाएगा जो धर्म के पालन में बहुत ही जरूरी है। अश्विनी देवों ने उपमन्यु की आंखों में रोशनी भी वापस दे दी। उन्होंने कहा तुम्हारे दांत
सोने के हो जाएं, उसे देखकर सारे लोग समझेंगे कि तुम योग्य, समर्थ और देवों से अनुगृहीत हो।
उपमन्यु गुरुजी के पास वापस आया। उनको प्रणाम किया उसने। गुरुजी भी प्रसन्न हो गए। कहे, मैं तुम्हारे अंदर इसी क्षण सारे वेदों का शास्त्रों का ज्ञान स्थापित कर दे रहा हूं। अपने घर लौट जाओ और अपने कर्तव्यों को निभाओ। उपमन्यु इस प्रकार गुरुजी का आशीर्वाद को प्राप्त करके। घर लौट गया।
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