
ब्राह्मण ग्रन्थों में कुबेर-विषयक प्रचुर सामग्री उपलब्ध होती है। महाकाव्य तथा पुराण भी इसके अपवाद नहीं हैं। महाकाव्यों तथा पुराणों में कुबेर विषयक सूचनाएँ बौद्ध एवं जैन साहित्य से कहीं अधिक प्राप्त होती हैं। यक्ष पुलस्त्य ऋषि की सन्तानें तथा विश्रवा के पुत्र कुबेर को यक्षाधिपति के पद पर अभिषिक्त किया गया था। वनपर्व में कुबेर के अनुचर के रूप में यक्षों की अनेकशः विशेषताएँ प्राप्त होती हैं। वनपर्व में ही यक्षिणी तीर्थ का उल्लेख आया है जिसमें स्नान करने से मनुष्य की सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ण होती है। इसे कुरुक्षेत्र के विख्यात द्वार की संज्ञा दी गयी
यक्षाधिपति कुबेर का निवास स्थान हिमालय के मध्य भाग में स्थित कैलास पर्वत है, जहाँ वह गुह्यकों के साथ निवास करते हैं तथा तुम्बुरु आदि गन्धर्व उनकी सेवा करते हैं। वहाँ नर वाहन कुबेर अप्सराओं से घिरा हुआ अत्यन्त वैभव का सुख प्राप्त करता है। पर्वत का वह शिखर देवताओं, दानवों, सिद्धों तथा कुबेर की क्रीड़ा-स्थली है। इनका निवास स्थान सुवर्ण तथा स्फटिक मणि के भवनों से सुशोभित होता है जिसके चारों ओर सुवर्ण की चाहर-दीवरी बनी हुई है तथा इसके चतुर्दिक सुन्दर उपवन विद्यमान हैं।
धन के देवता कुबेर को यक्षों का अधिपति स्वीकार किया गया है। वैदिक ग्रन्थों में उनके लिए यक्षराज, यक्षेन्द्र, यक्षेश, धनपति, धनद, निधिपति, वैश्रवण, गुह्यकपति तथा जम्भल इत्यादि विशेषताओं का प्रयोग किया गया है। रामायण में कुबेर को ब्रह्मा के मानसपुत्र और पुलस्त्य का पुत्र कहा गया है। जबकि महाभारत में कुबेर को विश्रवा तथा इडविडा का पुत्र तथा पुलस्त्य का पौत्र कहा गया है। वराह पुराण में उल्लेख मिलता है कि जिस समय ब्रह्मा ने सृष्टि रचना का कार्य प्रारम्भ किया उस समय उनके मुख से प्रस्तरों की वर्षा होने लगी। वातावरण के शान्त हो जाने पर उन प्रस्तर खण्डों में से एक अलौकिक पुरुष की रचना हुई जिसे ब्रह्मा ने धन का संरक्षक नियुक्त किया। कुबेर का अर्थ – कुत्सितं बेरं शरीरं यस्य सः कुबेरः - अर्थात् कुत्सित तथा ग्रन्थों में इनके तीन पैर का उल्लेख मिलता है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कुबेर की प्रतिमा को प्रासाद में स्थापित करने का उल्लेख प्राप्त होता है। पतञ्जलि के महाभाष्य में भी कई स्थानों पर कुबेर का वर्णन आया है।विष्णु पुराण में कुबेर को नृपति कहा गया है, जबकि अन्य पुराणों में वे यक्षराज हैं । कालिदास ने राजाओं के राजा के रूप में कुबेर का उल्लेख किया है।
यक्षराज को शिव का भाई तथा कैलास पर्वत को कुबेरशाला, कुबेराद्रि या कुबेर पर्वत भी कहा गया है। अलकापुरी का उल्लेख उनकी राजधानी के रूप में हुआ है। वायुपुराण में पिशाचक पर्वत पर स्थित कुबेर भवन का उल्लेख मिलता है।
कुबेर यक्षों के अधिपति देवता के रूप में पूजे जाते हैं। धनाध्यक्ष कुबेर का वाहन विश्वकर्मा द्वारा निर्मित पुष्पक विमान है जो अद्भुत निर्माण कौशल की पराकाष्ठा है। विष्णुपुराण में यह उल्लेख प्राप्त होता है कि ब्रह्मा के तेज से विश्वकर्मा ने भगवान् विष्णु का चक्र, शिव जी का त्रिशूल तथा कार्तिकेय की शक्ति का निर्माण किया। कुबेर का पुष्पक विमान भी उसी तेज का परिणाम था। महाभारत के अनुसार ब्रह्मा ने वैश्रवण को धनाधिपत्व, अमृतत्व तथा लोकपालत्व इन तीन वरदानों को प्रदान किया था । कुबेर के अमरत्व का कारण वह अमृत था, जो उनके घर में सुरक्षित था। महाभारत के अनुसार यह एक प्रकार का पीला मधु है जिसे मक्खियाँ नहीं बनाती थीं। वह घड़े में बन्द रहता है तथा सर्प उसकी रक्षा करते हैं। कुबेर को वह अत्यन्त प्रिय है तथा उसका पान करने से मर्त्य-पुरुष अमर हो जाता है। वृद्ध व्यक्ति युवावस्था को प्राप्त हो जात है तथा अन्धे को नेत्र प्राप्त हो जाते हैं। उस मधु-कोष की स्थिति गन्धमादन पर्वत पर बताई गई है।
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