
सीताराम – गुणग्राम – पुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे – विशुद्धविज्ञानौ – कवीश्वरकपीश्वरौ।
श्री सीतारामजी के गुणसमूह रूपी पवित्र वन में विहार करने वाले, विशुद्ध और विज्ञान से भरपूर श्री वाल्मीकीजी और श्री हनुमानजी को मैं प्रणाम करता हूं।
कवीश्वर वाल्मीकीजी और कपीश्वर हनुमानजी दोनों ही वन को पवित्र मानते हैं। यही कारण है कि महर्षिगण तपस्या हेतु वन में जाते हैं और वानप्रस्थ आश्रम का यापन भी वहीं होता है।
गंगा, यमुना जैसे तीर्थों की भांति वन भी पवित्र हैं। जैसे सप्त पुण्य नदियां प्रसिद्ध हैं, वैसे ही नौ पवित्र कानन (वन) भी प्रसिद्ध हैं – दण्डक, सैन्धव, जाम्बूमार्ग, पुष्कल, उत्पलावर्त, नैमिष, कुरुजांगल, हिमवान, अर्बुद। ये सभी मुक्ति प्रदान करने वाले माने गए हैं।
अरण्य तापसों और वानरों दोनों का निवासस्थल रहा है। इसलिए वाल्मीकीजी और हनुमानजी दोनों का संबंध वन से है।
श्रीरामजी का चरित्र अत्यंत पावन है – जो इसे मन लगाकर सुनता है, उसके मन, वचन और कर्म से उत्पन्न समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
वाल्मीकीजी कवीश्वर हैं – जिन्होंने 'रामायण' जैसी काव्य रचना की।
'सखर' – यानी राक्षसी कठोरता से युक्त, फिर भी उनका काव्य 'सुकोमल', 'मंजु', 'दूषण सहित' होते हुए भी 'दोषरहित' है।
यह उनके काव्य कौशल का प्रमाण है कि उन्होंने रावण-कुम्भकर्ण जैसे पात्रों के वर्णन को भी सौंदर्य और संतुलन से प्रस्तुत किया।
वाल्मीकीजी को 'कविता शाखा' पर बैठे 'कोकिल' कहा गया है जो 'राम राम' का मधुर उच्चारण करते हैं।
वे महानाट्य में पारंगत, कोटि कवियों में तिलक, और गीतों की गुणवत्ता से गंधर्वों को भी हराने वाले माने जाते हैं।
अब श्रोता कौन हैं?
जो 'रामायण श्रवण' से रोमांचित हो जाएं, जिनकी आंखों में अश्रु भर आएं, वाणी शिथिल हो जाए — वे हैं हनुमानजी, कपीश्वर।
हनुमानजी 'पवन तनय' हैं, 'बुद्धि, विवेक, विज्ञान' के भंडार हैं। वे 'अतुल बलधाम', 'ज्ञानियों में अग्रणी', 'सकल गुणों के निधान', और 'वानरों के अधीश्वर' हैं।
उनके लिए अनेक स्तुतियां हैं जिनमें उन्हें 'जानकी शोक विनाशक', 'अक्षहन्ता', 'लंका का भय' कहा गया है।
रामकथा में वर्णन है कि 'कपिराय' हनुमानजी नव तुलसीकावन को देखकर हर्षित होते हैं।
'विशुद्धविज्ञानौ' शब्द में दो तत्व हैं – विशुद्धता और विज्ञान।
केवल विज्ञान पर्याप्त नहीं होता क्योंकि काम, क्रोध और लोभ जैसे तीन दुर्जन मन को क्षुब्ध कर सकते हैं।
केवल विज्ञान वाला ऋषि निर्गुण उपासक हो सकता है, लेकिन राम प्रेम के बिना वह ज्ञान भी शोभा नहीं देता।
इसीलिए वाल्मीकीजी और हनुमानजी – दोनों ही विज्ञान से युक्त हैं, लेकिन साथ ही रामभक्ति से विशुद्ध भी हैं।
विशुद्ध विज्ञान का क्या अर्थ है?
यह संयोजन है गहरे ज्ञान (विज्ञान) और निर्मलता (विशुद्धि) का। केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं, जब तक वह अहंकार और विकारों से रहित न हो। यही संतुलन साधक को स्थिर, करुणामय और सच्चा बनाता है।
क्या ज्ञान और निर्मलता को अलग-अलग साधा जा सकता है?
संभव तो है, लेकिन दोनों का मेल ही पूर्णता देता है। ज्ञान दिशा देता है, और विशुद्धता उसे ईश्वरमुखी बनाती है। दोनों साथ हों तो साधना सफल होती है।
अगर कोई केवल ज्ञानी है लेकिन शुद्ध नहीं, तो क्या वह श्रेष्ठ माना जा सकता है?
नहीं, क्योंकि वह अहंकार या तर्क में फंस सकता है। ज्ञान तब तक फलदायी नहीं जब तक वह मन और जीवन को पवित्र न बनाए।
वाल्मीकीजी को दोषरहित कवि क्यों कहा गया है?
क्योंकि उन्होंने कठोर पात्रों और घटनाओं को भी कोमलता और संतुलन के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने राक्षसी क्रूरता को भी सौंदर्य और मर्यादा में बाँधा, जिससे रामायण श्रेष्ठ बना।
क्या एक कवि ऐसा कर सकता है कि गलत चरित्र भी पवित्र लगे?
हाँ, अगर दृष्टिकोण निर्मल और उद्देश्य उन्नत हो। जब भावनाएं संयमित हों और सत्य को रूपांतरित करने की क्षमता हो, तब ऐसा सम्भव है।
क्या यह सौंदर्यीकरण सच्चाई से भटकना नहीं है?
नहीं, यह सत्य को नकारना नहीं, बल्कि उसे ग्रहणयोग्य बनाना है। सत्य जब करुणा और विवेक से जुड़ता है, तब ही वह शिक्षादायक बनता है।
हनुमानजी को रामकथा का आदर्श श्रोता क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे कथा सुनते ही रोमांचित हो जाते हैं, उनकी आंखें सजल हो जाती हैं, और वाणी शिथिल हो जाती है। यह दर्शाता है कि उन्होंने कथा को सिर्फ सुना नहीं, भीतर उतारा है।
क्या हर भक्त को ऐसी भावदशा अनुभव करनी चाहिए?
अगर श्रद्धा सच्ची हो और मन निर्मल हो, तो यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है। भावनाओं का यह विस्फोट साधना की गहराई का प्रमाण है।
क्या बिना रोए या रोमांच के कथा सुनना व्यर्थ है?
नहीं, लेकिन अगर कथा केवल बुद्धि तक सीमित रहे और हृदय तक न पहुंचे, तो उसका प्रभाव अधूरा रहता है।
हनुमानजी को कपीश्वर क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे वानरों के प्रमुख हैं — ज्ञान, बल, भक्ति और नेतृत्व में सर्वोच्च। वे वानर समुदाय के लिए दिशा और प्रेरणा हैं।
क्या वानरों में ऐसा उच्च विवेक हो सकता है?
हनुमानजी जैसे पात्र उस युग के विशेष, दिव्य स्वरूप हैं। उनके माध्यम से यह बताया गया है कि किसी भी जाति या रूप में भक्ति और ज्ञान का चरम सम्भव है।
क्या यह सिर्फ प्रतीकात्मक है?
नहीं, यह प्रतीक भी है और उदाहरण भी। यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा जहाँ होती है, वहाँ साधारण भी असाधारण बन जाता है।
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