सृष्टि तथा पालन और संहार करने वाली सीता माता है

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सृष्टि तथा पालन और संहार करने वाली सीता माता है

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम् ।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम् ।।

सृष्टि, पालन और संहार करने वाली, समस्त दुःखों का नाश करने वाली, सम्पूर्ण कल्याण और श्रेय देने वाली, श्रीरामजी की प्रिय श्री सीतामाता को मैं प्रणाम करता हूं।

सीताजी को तुलसीदासजी ने 'उद्भव-स्थिति-संहारकारिणी' कहा है। इसका आधार श्रीराम तापनीय उपनिषद है, जिसमें कहा गया है –
'श्रीराम सान्निध्यवशाज्जगदानन्ददायिनी, उत्पत्ति स्थिति संहारकारिणी सर्वदेहिनाम्'।

सीतामाता मूल प्रकृति हैं।
ब्रह्मा द्वारा जगत की उत्पत्ति में जो शक्ति कार्य करती है वह प्रकृति – अर्थात सीतामाता हैं।
विष्णु द्वारा पालन कराने वाली जो शक्ति है, वह भी मूल प्रकृति – सीतामाता हैं।
रुद्र द्वारा संहार कराने वाली शक्ति भी प्रकृति ही है – वह भी सीतामाता ही हैं।

सीतामाता श्रेय देने वाली हैं – वे साक्षात महालक्ष्मी हैं।
ऐश्वर्य और शुभफल देने वाली हैं।
उन्हीं से अनगिनत लक्ष्मी, उमा और ब्रह्माणी उत्पन्न हुई हैं।

वे समग्र माया का मूल कारण हैं –
'माया सब सिय माया माहू'।
वे रामवल्लभा हैं।
वे जनकसुता हैं, जगजननी हैं, करुणानिधान श्रीरामजी की परम प्रिय हैं।

श्लोक में सीताजी के छह विशेषण हैं –
उद्भवकारिणी, स्थितिकारिणी, संहारकारिणी, क्लेशहारिणी, सर्वश्रेयस्करी, रामवल्लभा।

ऐश्वर्य भी छह प्रकार के होते हैं – इन्हें षडैश्वर्य कहा जाता है।
माता का सबसे प्रमुख नाम है 'सीता'।

'सीता' शब्द का अर्थ है –
'सिनोत्यतिगुणैः कान्तं, सीयते तद्गुणैस्तु या' –
जो अपने श्रेष्ठ गुणों से अपने कान्त (प्रियतम) को बांध ले और स्वयं भी उन्हीं गुणों से बंध जाए – वह 'सीता' है।

'सीता' शब्द संस्कृत के 'षीञ्' धातु से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है – बांधना।
माता ने अपने वात्सल्य और मधुर गुणों से श्रीरामजी को बांध लिया है, और स्वयं भी उनके गुणों से बंधी हुई हैं।

सीतामाता का मूल मन्त्र है –
'श्रीं सीतायै नमः'।

'श्रीं' बीजमन्त्र के छह अर्थ हैं, जिन्हें तुलसीदासजी ने इस श्लोक में समाहित किया है –

  1. 'शॄ' – विस्तारे
    जगत का विस्तार अर्थात उत्पत्ति – सीता माता उद्भवकारिणी हैं।

  2. 'श्रण्' – दान या गति में ले जाना
    पालन करना – सीता माता स्थितिकारिणी हैं।

  3. 'श्रृ' – हिंसा या संहार
    विनाश करना – सीता माता संहारकारिणी हैं।

  4. 'श्रु' – श्रवण करना
    भक्तों के क्लेश पहले सुनती हैं – कुछ का समाधान स्वयं करती हैं, कुछ का समाधान रामजी से करवाती हैं – क्लेशहारिणी।

  5. 'श्रिय' – सेवा
    जो भी उनकी सेवा करता है, उसके लिए वे सर्वश्रेयस्करी बन जाती हैं।

  6. 'श्री' – शोभा
    उनकी शोभा देखकर ही श्रीरामजी ने उन्हें वल्लभा बनाया।

'प्रभु जब जात जानकी जानी, सुख सनेह सोभा गुन खानी।'
सीताजी की शोभा से मोहित होकर ही श्रीरामजी ने धनुष तोड़कर उन्हें वरण किया।

इस प्रकार, मन्त्र 'श्रीं सीतायै नमः' और यह श्लोक – 'उद्भव स्थिति संहारकारिणीं...' – दोनों में समान तत्व और प्रभाव हैं।
मन्त्र में 'सीतायै नमः', श्लोक में 'सीतां नतोऽहं' – भाव और आराधना दोनों में गूढ़ एकरूपता है।

यह श्लोक भी सीताजी के मूल मन्त्र के समकक्ष प्रभावशाली और पूज्य है।

सीता को सृष्टि, पालन और संहार की कारण शक्ति क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे मूल प्रकृति हैं – सृष्टि ब्रह्मा के द्वारा, पालन विष्णु के द्वारा और संहार रुद्र के द्वारा होता है, पर सभी के पीछे जो शक्ति है, वह सीता रूपिणी प्रकृति है। वे ही तीनों कार्यों की जड़ में स्थित हैं।

क्या ये तीनों कार्य एक ही शक्ति से कैसे हो सकते हैं?
प्रकृति एक ही है – जैसे एक ही धागे से अलग-अलग डिज़ाइन की कढ़ाई हो सकती है, वैसे ही एक ही शक्ति सृजन, पालन और संहार के रूप में कार्य करती है।

क्या ये विचार विरोधाभासी नहीं है – एक ही शक्ति तीनों विपरीत काम कैसे करेगी?
नहीं। विरोध नहीं, यह समग्रता है। जैसे एक ही अग्नि खाना भी पका सकती है और जला भी सकती है – परिणाम उपयोग पर निर्भर होता है। ठीक वैसे ही एक ही शक्ति अलग-अलग रूपों में कार्य कर सकती है।


'सर्वश्रेयस्करी' का क्या मतलब है?
जो हर प्रकार का कल्याण करे – भौतिक, मानसिक, आध्यात्मिक – वही 'सर्वश्रेयस्करी' होती है। सीता माता ऐसा संपूर्ण कल्याण देने वाली देवी हैं।

क्या कोई भी व्यक्ति उनसे यह 'श्रेय' प्राप्त कर सकता है?
हाँ, जो श्रद्धा, सेवा और समर्पण से उनसे जुड़ता है, चाहे देवता हो या मानव, उन्हें उनका संपूर्ण कल्याणकारी प्रभाव प्राप्त होता है।

क्या ये दावा नहीं है कि सबका कल्याण वे ही कर सकती हैं?
यह दावा अनुभव से आया है। जितने भी भक्तों ने उन्हें शरण में लिया, उन्हें जीवन में संतुलन, सुरक्षा और सच्चा सुख प्राप्त हुआ – ये तथ्य कथा और अनुभूतियों में बार-बार मिलते हैं।


'श्रीं' बीज में छह अर्थ क्यों कहे गए हैं?
संस्कृत में 'श्रीं' से जुड़ी छह धातुएं हैं – जिनका अर्थ है सृजन, पालन, विनाश, श्रवण, सेवा और शोभा। ये सभी अर्थ सीता माता के गुणों में स्पष्ट दिखते हैं।

क्या ये छह अर्थ वास्तविक हैं या मनगढ़ंत जोड़ हैं?
ये सभी पारंपरिक व्याकरण और धातु अध्ययन पर आधारित हैं। तुलसीदास जैसे विद्वान कवि ने इन्हें व्यवस्थित रूप से एक श्लोक में पिरोया है, जो उनकी प्रमाणिकता दिखाता है।

क्या किसी एक बीज में इतने अर्थ जोड़ना भ्रम पैदा नहीं करता?
नहीं, उल्टा यह समग्र दृष्टि देता है। बीजमंत्र में जितना गहराई से अर्थ होगा, उतना ही वह साधक के जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित कर सकता है।


सीता शब्द का मूल क्या है?
'सीता' शब्द 'षीञ' धातु से बना है, जिसका अर्थ है बांधना। माता ने अपने उच्चतम गुणों से श्रीरामजी को बांध रखा है, और स्वयं भी उनके गुणों से बंधी हुई हैं।

इस नाम में बंधन का विचार क्यों है?
क्योंकि यह बंधन सांसारिक नहीं, प्रेम और गुणों का दिव्य बंधन है – जहां दोनों एक-दूसरे के प्रति समर्पित हैं। यही उच्च भक्ति का स्वरूप है।

क्या 'बंधन' जैसा शब्द देवी के नाम के साथ उचित है?
जब वह बंधन प्रेम, वात्सल्य और गुणों का हो – तब वह बंधन नहीं, माधुर्य होता है। यही नाम की गरिमा है।


'श्लोक' और 'मंत्र' को एक जैसा क्यों कहा गया है?
क्योंकि दोनों में 'सीता' का स्वरूप, कार्य और महत्व समान रूप से समाहित है। दोनों 'श्रीं' के भाव को एक ही समर्पण से प्रकट करते हैं।

क्या मंत्र और श्लोक के प्रभाव में कोई अंतर नहीं होता?
उच्चारण विधि और प्रयोग भिन्न हो सकते हैं, लेकिन भाव और तत्त्व एक ही होने पर उनका प्रभाव भी समरूप होता है – विशेषकर जब श्लोक को श्रद्धा से जपा जाए।

क्या हर श्लोक को मंत्र का दर्जा दिया जा सकता है?
नहीं, पर जब कोई श्लोक बीजमंत्र के समान सभी अर्थों को समेटता हो, और उसी भाव से बोला जाए – तब वह भी मन्त्रवत् प्रभावी होता है। यही इस श्लोक की विशेषता है।

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