अन्य व्यासों के नाम

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अन्य व्यासों के नाम

पुराणों की रचना करने के बाद व्यास जी ने उन विषयों को ही महाभारत में विस्तार किया।
इसमें एक आश्चर्य वाली बात है।
हमें पता है कि युगांत प्रलय में सब कुछ महत तत्व में लीन हो जाता है।
उसके बाद सत्य युग और त्रेता युग समाप्त होकर जब द्वापर युग आता है तो व्यास जी पुराणों की रचना करते हैं।
जब जब द्वापर युग आता है तो पुराणों की रचना होती है, बार बार।
एक मन्वन्तर के अन्दर इकहत्तर महायुग होते हैं और एक कल्प में १४ मन्वन्तर,अर्थात एक कल्प में १४X७१=९९४ बार पुराणों की रचना होती है।
व्यास एक व्यक्ति नहीं है, व्यास एक पद है।
हर चतुर्युग में अलग अलग व्यास होते हैं।
हम जो सत्यवती पुत्र व्यास को अभी मान रहे हैं, वे केवल वर्तमान चतुर्युग के व्यास हैं।
इनका निज नाम है कृष्णद्वैपायन।
वर्तमान मन्वन्तर का नाम है वैवस्वत मन्वन्तर।
इसमें २७ महायुग हो चुके हैं।
इस मन्वन्तर के पहले द्वापर में व्यास थे स्वयं ब्रह्मा।
दूसरे में प्रजापति।
तीसरे में शुक्राचार्य।
ऐसे आगे: बृहस्पति, सूर्य, यमराज, इन्द्र, वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, त्रिवृष, भरद्वाज मुनि, अन्तरिक्ष, धर्मराज, त्रय्यारुणि, धनंजय, मेधातिथि, व्रती, अत्रि, गौतम, हर्यात्मा, वाजश्रवा वेन, सोम, तृणबिंदु, भार्गव और शक्ति व्यास बने।
अबसे पहले के द्वापर में सत्ताइसवां द्वापर के व्यास थे जातुकर्ण।
और उनतीसवें द्वापर के व्यास होंगे द्रौणी।
सूत जी के गुरु थे कृष्णद्वैपायन जो वर्तमान व्यास हैं।
सूत जी कहते हैं: व्यास जी के पुत्र थे शुकदेव और उनका जन्म अरणी के गर्भ से हुआ था, उनकी जैविक माता नहीं थी।
बडे विद्वान महात्मा और वैरागी थे शुकदेव।
सूत जी और शुकदेव एक साथ सुने थे श्रीमद देवी भागवत व्यास जी के मुख से।
शुकदेव द्वारा प्रश्न किये जाने पर व्यास जी ने उन्हें श्रीमद् देवी भागवत सुनाया था ।
उस समय सूत जी भी साथ में बैठे थे और उन्होंने पूरी कहानी कंठस्थ कर ली।
श्रीमद् देवी भागवत को भक्ति श्रद्धा पूर्वक सुनने के बाद कलिकाल के संकटों से मुक्त नहीं हुआ हो ऐसा कोई हो सकता है क्या? पूछते हैं सूत जी।
किसी भी बहाने, ट्रेन से जा रहे हो, बगल में बैठा हुआ आदमी अपने मोबाइल से देवी भागवत का प्रवचन सुन रहा है, पाखंडी भी, नास्तिक भी, अधमों में अधम भी, किसी भी बहाने श्रीमद् देवी भागवत सुन लेता है तो उसे समस्त सुख प्राप्त होते हैं और वह परम पद को भी प्राप्त कर लेगा।
तो जो भक्ति श्रद्धा से सुनता है, उसका क्या कहना ?
जो हर दिन दिल से, मन से, प्रेम से सुनेगा उसके हृदय में देवी भगवती निवास करने लगेगी।
सूत जी कहते हैं: संसार सागर को पार करने श्रीमद् देवी भागवत एक नाव की तरह है।
इसे सुनने का मौका मिलने पर भी जो नहीं सुनता उस से बडा मूर्ख कौन हो सकता है ?
ऐसा मनुष्य तो दैविक शक्ति द्वारा वंचित और उपेक्षित ही हो सकता है।
दो दो कान होने पर भी जिसका मन श्रीमद् देवी भागवत सुनने पर नहीं बल्कि दूसरों की बुराई सुनने में है उसे भला कौन बचा सकता है ?
ऋषिगण ने शुकदेव के बारे में और जानने की इच्छा प्रकट की।
एक बार व्यास जी ने अपने आश्रम में चिड़ियों के एक जोड़े को देखा।
उस जोडे का उसी समय एक शिशु भी पैदा हुआ था।
अपने नवजात बच्चे के प्रति उनकी ममता और प्यार देखकर व्यास जी विस्मित हो गये।
दोनों ही दूर दूर जाकर उसके लिए चारा लाते हैं, उसके चोंच में डालते हैं उसके शरीर को अपने शरीर से रगड़ते हैं, और उसके सुंदर लाल मुख को चूमते हैं।
व्यास जी चिन्ता मे पड गये।
क्या यह चिड़िया अपने बच्चे का विवाह देखने वाले हैं?
अपनी बहु का सुन्दर चेहरा देख पाएंगे ये चिडिया?
तब भी उनका प्यार देखो अपने बच्चे के प्रति।
यह बच्चा तो बुढ़ापे में अपने माता-पिता की सेवा भी नही करने वाला है, इन चिडियों की यह भी आशा नहीं है।
तब भी उनका प्यार देखो।
मनुष्य स्वार्थी है, अपना लाभ देखकर ही सब कुछ करता है।
माता-पिता विश्वास रखते हैं कि बेटा बड़ा होकर हमारी सेवा करेगा और उसके द्वारा पुण्य कमाएगा।
मरण के बाद पुत्र हमारा क्रिया कर्म करेगा और उत्तम गति प्राप्त कराएगा।
यदि चिडियों में इतना प्यार है बच्चे के प्रति तो मनुष्य में कितना होना चाहिए?
किसकी इच्छा नहीं है अपने बच्चे का लालन–पालन के लिये?
संसार के सबसे बड़े सुखों में से एक है वह।
परलोक में भी सुख पाने के लिये अपने संतान के अलावा और कोई उपाय नहीं है।
संतानहीन व्यक्ति मृत्यु शय्या में पडा सोचता है, मेरे पास जो कुछ भी है मेरे बाद इन सबका स्वामी कौन बनेगा?
जब मन ऐसे भ्रान्त हो जाएगा तो उसे सद्गति कैसे प्रप्त होगी?
ये सब सोचकर व्यास जी बहुत दुखी हो गये कि उनका संतान नहीं है।
वे मेरुपर्वत की ओर निकल पडे तपश्चर्या के लिये।

 

  • पुराणों की रचना को बार-बार होने वाली प्रक्रिया क्यों बताया गया है?
    यहां यह स्पष्ट किया गया है कि पुराण किसी एक समय की रचना नहीं हैं। हर द्वापर युग में उनका पुनः संकलन होता है। सृष्टि के चक्र के साथ ज्ञान का पुनर्गठन भी चलता रहता है। इससे यह समझ आता है कि धर्मज्ञान स्थिर नहीं, बल्कि युगानुसार व्यवस्थित किया जाता है। यही कारण है कि पुराण सदा प्रासंगिक बने रहते हैं।

  • हर द्वापर में पुराण लिखने की आवश्यकता क्यों पडती है?
    क्योंकि हर युग में मानव की समझ, जीवनशैली और समस्याएं बदल जाती हैं। वही तत्त्व नए ढंग से समझाने की आवश्यकता होती है। पुराण उस युग की मानसिकता के अनुसार धर्म को सरल बनाते हैं। इसलिए पुनरावृत्ति नहीं, पुनरूपांकन होता है।

  • क्या इससे यह नहीं लगता कि पुराण ऐतिहासिक रूप से अविश्वसनीय हैं?
    नहीं, क्योंकि यहां इतिहास से अधिक उद्देश्य ज्ञान का है। जैसे पाठ्यपुस्तकें हर पीढी के लिए फिर से लिखी जाती हैं, वैसे ही पुराण भी। विषय वही रहता है, प्रस्तुति बदलती है। इसलिए यह व्यवस्था तार्किक है।


  • व्यास को व्यक्ति नहीं, पद क्यों कहा गया है?
    क्योंकि व्यास एक जिम्मेदारी का नाम है, जन्म का नहीं। हर चतुर्युग में कोई न कोई इस कार्य को संभालता है। वर्तमान चतुर्युग में यह कार्य कृष्णद्वैपायन ने किया। इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान परंपरा व्यक्ति से ऊपर होती है।

  • इस सोच से क्या लाभ होता है?
    इससे व्यक्ति पूजा की बजाय परंपरा की समझ विकसित होती है। ध्यान ज्ञान के प्रवाह पर जाता है, नाम पर नहीं। यह दृष्टि अहंकार को भी सीमित करती है। कार्य को महत्व मिलता है, कर्ता को नहीं।

  • क्या इससे ऐतिहासिक भ्रम नहीं बढता?
    नहीं, यदि पद और व्यक्ति का भेद समझा जाए। भ्रम तब होता है जब दोनों को एक मान लिया जाता है। यहां स्पष्ट किया गया है कि नाम एक जैसा हो सकता है, भूमिका वही रहती है। यह भेद ही स्पष्टता लाता है।


  • वर्तमान मन्वन्तर और महायुगों का उल्लेख क्यों किया गया है?
    ताकि समय की विशालता समझाई जा सके। इससे यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक ग्रंथ छोटे कालखंड की रचना नहीं हैं। वे दीर्घ समय की स्मृति हैं। यह दृष्टि मानव जीवन को व्यापक संदर्भ देती है।

  • इतनी गणना देने का उद्देश्य क्या है?
    उद्देश्य संख्या याद कराना नहीं, परिप्रेक्ष्य देना है। जब समय को विशाल रूप में देखा जाता है, तो व्यक्तिगत चिंता छोटी लगने लगती है। यह मानसिक विस्तार की प्रक्रिया है। यही धर्मग्रंथों का गुप्त उद्देश्य भी है।

  • क्या यह सब केवल कल्पना नहीं है?
    इसे गणित की तरह नहीं, दृष्टिकोण की तरह समझना चाहिए। यह समय को रेखीय नहीं, चक्रीय मानने की सोच है। आधुनिक विज्ञान भी समय को सीधी रेखा नहीं मानता। इसलिए यह विचार असंगत नहीं है।


  • शुकदेव के जन्म का विशेष उल्लेख क्यों किया गया है?
    क्योंकि उनका जन्म सामान्य सामाजिक ढांचे से अलग बताया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि ज्ञान और वैराग्य जन्म से जुडे हो सकते हैं, परंपरागत परिवार से नहीं। शुकदेव का महत्व उनके आचरण से है, उत्पत्ति से नहीं।

  • इससे साधक को क्या शिक्षा मिलती है?
    शिक्षा यह कि आध्यात्मिक श्रेष्ठता सामाजिक ढांचे पर निर्भर नहीं करती। व्यक्ति का मूल्य उसके गुण और साधना से तय होता है। जन्म केवल एक परिस्थिति है, पहचान नहीं।

  • क्या यह सामाजिक व्यवस्था को कमजोर नहीं करता?
    नहीं, यह केवल यह बताता है कि व्यवस्था अंतिम मापदंड नहीं है। समाज सहायक है, निर्णायक नहीं। इससे व्यक्ति की आंतरिक क्षमता को महत्व मिलता है। यह दृष्टि संतुलित है।


  • श्रीमद् देवी भागवत को नाव की उपमा क्यों दी गई है?
    क्योंकि उसे जीवन की कठिनाइयों से पार ले जाने वाला साधन बताया गया है। जैसे नाव बिना भेदभाव के सभी को पार ले जाती है, वैसे ही यह ग्रंथ भी सुनने वाले को सहारा देता है। इसमें पात्रता से अधिक संपर्क पर बल है।

  • बिना श्रद्धा सुने जाने पर भी फल क्यों बताया गया है?
    क्योंकि श्रवण स्वयं में परिवर्तन की शक्ति रखता है। चेतन मन भले न माने, अवचेतन पर प्रभाव पडता है। इसलिए संपर्क को ही महत्वपूर्ण माना गया है। यह मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित है।

  • क्या यह अतिशयोक्ति नहीं है?
    इसे शाब्दिक लाभ की सूची की तरह नहीं देखना चाहिए। यह संकेत है कि अच्छा विचार देर-सवेर असर करता है। जैसे धूप में बैठा व्यक्ति गर्मी से बच नहीं सकता। प्रभाव स्वाभाविक है।


  • चिडियों के उदाहरण से क्या समझाया गया है?
    यह उदाहरण निस्वार्थ प्रेम को दिखाने के लिए है। चिडियां भविष्य की अपेक्षा नहीं रखतीं, फिर भी अपने बच्चे की पूरी सेवा करती हैं। इससे मानव स्वार्थ की तुलना सहज प्रेम से की गई है।

  • इस तुलना का मुख्य संदेश क्या है?
    संदेश यह है कि मनुष्य का प्रेम अक्सर शर्तों से जुडा होता है। सेवा के बदले भविष्य की अपेक्षा रहती है। जबकि सच्चा प्रेम परिणाम नहीं देखता। यह आत्मपरीक्षण का अवसर देता है।

  • क्या संतान के प्रति अपेक्षा रखना गलत बताया गया है?
    अपेक्षा को स्वाभाविक माना गया है, पर अंतिम सत्य नहीं। समस्या तब है जब वही मोक्ष का आधार बन जाए। यह बताया गया है कि मन की आसक्ति मृत्यु के समय बाधा बन सकती है। इसलिए विवेक आवश्यक है।


  • व्यास जी का दुख अंत में क्यों गहराया?
    क्योंकि उन्होंने अपने भीतर की तुलना को पहचाना। चिडियों का निस्वार्थ प्रेम देखकर उनका अपना अभाव तीव्र हुआ। यह दुख बाहरी नहीं, आंतरिक था। इसी से तप की प्रेरणा जन्मी।

  • इस दुख को नकारात्मक क्यों नहीं माना गया?
    क्योंकि यह परिवर्तन की भूमिका बना। ऐसा दुख जडता नहीं, गति देता है। जब दुख सोच को आगे बढाता है, तब वह साधन बन जाता है। यही यहां दिखाया गया है।

  • क्या यह संदेश नहीं कि संतान के बिना मुक्ति असंभव है?
    नहीं, यह मन की स्थिति की बात है, नियम की नहीं। चिंता और आसक्ति बाधक बताई गई है, संतान का अभाव नहीं। यदि मन शांत है तो मार्ग खुला रहता है। यही संतुलित निष्कर्ष है।

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देवी भागवत

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