१०५ छात्र, १ सफल...

गुरु द्रोणाचार्य एक महान शिक्षक थे। उन्होंने कुरु वंश के राजकुमारों को शिक्षा दी। उन्होंने पांडवों को सिखाया और कौरवों को भी सिखाया। उन्होंने दूसरे राज्यों के राजकुमारों को भी शिक्षा दी। राजकुमारों ने कई कौशल सीखे। उन्होंने युद्ध करना सीखा। उन्होंने हथियार चलाना सीखा। उन्होंने तलवार और भाले के बारे में भी सीखा। द्रोणाचार्य उनकी परीक्षा लेना चाहते थे। वे देखना चाहते थे कि सबसे अच्छा धनुर्धर कौन है। उन्होंने एक कठिन परीक्षा की योजना बनाई।

द्रोणाचार्य ने एक कारीगर को बुलाया। कारीगर ने लकड़ी की एक चिड़िया बनाई। वह एक बनावटी चिड़िया थी, लेकिन बिल्कुल असली जैसी दिखती थी। द्रोणाचार्य उस चिड़िया को अभ्यास के मैदान में ले गए। वहां एक बड़ा पेड़ था। उन्होंने चिड़िया को पेड़ की सबसे ऊपर वाली डाल पर रख दिया। चिड़िया ही निशाना थी। राजकुमारों को नहीं पता था कि यह नकली है। उन्हें लगा कि वह असली पक्षी है।

द्रोणाचार्य ने अपने सभी शिष्यों को बुलाया। उन्होंने उनसे अपने धनुष और बाण लाने को कहा। सभी छात्र कतार में खड़े हो गए। द्रोणाचार्य ने उनसे जोर से बात की। उन्होंने पेड़ की चोटी की ओर इशारा किया और उन्हें चिड़िया दिखाई। उन्होंने साफ़ निर्देश दिए। उन्होंने कहा, 'उस पक्षी को देखो। तुम्हें उसके सिर पर निशाना लगाना है। अभी बाण मत छोड़ना। मेरे आदेश का इंतज़ार करना। मैं बताऊंगा कि कब चलाना है।'

द्रोणाचार्य ने सबसे पहले युधिष्ठिर को बुलाया। युधिष्ठिर सबसे बड़े पांडव थे। वे बहुत ईमानदार थे। वे आगे आए और अपना धनुष उठाया। उन्होंने डोरी पर तीर चढ़ाया और उसे पीछे खींचा। उन्होंने पेड़ पर बैठी चिड़िया पर निशाना साधा। वे स्थिर खड़े थे। द्रोणाचार्य ने उनसे पूछा, 'हे राजकुमार, पेड़ की चोटी को देखो। क्या तुम्हें चिड़िया दिखाई दे रही है?' युधिष्ठिर ने जवाब दिया, 'जी गुरुजी, मुझे चिड़िया दिख रही है।' द्रोणाचार्य ने फिर पूछा, 'क्या तुम्हें पेड़ दिखाई दे रहा है?' युधिष्ठिर ने सच कहा, 'हाँ, मुझे पेड़ दिख रहा है।' द्रोणाचार्य ने फिर पूछा, 'क्या तुम्हें मैं दिखाई दे रहा हूँ?' युधिष्ठिर ने कहा, 'हाँ, मैं आपको देख रहा हूँ।' द्रोणाचार्य ने एक बार और पूछा, 'क्या तुम्हें अपने भाई दिख रहे हैं?' युधिष्ठिर बोले, 'हाँ, वे भी दिख रहे हैं।' द्रोणाचार्य खुश नहीं थे। उन्होंने युधिष्ठिर को रुकने के लिए कहा। उन्होंने कहा, 'अपना धनुष नीचे रख दो। एक तरफ हट जाओ। तुम निशाना नहीं लगा सकते।' युधिष्ठिर ने अपने गुरु की बात मानी और उदास होकर चले गए।

फिर द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को बुलाया। दुर्योधन सबसे बड़ा कौरव था। उसे बहुत घमंड था। वह अपनी जगह पर गया और धनुष उठाया। उसने चिड़िया पर निशाना साधा। द्रोणाचार्य ने उससे भी वही सवाल पूछे। उन्होंने पूछा, 'तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?' दुर्योधन ने जल्दी से जवाब दिया, 'मुझे चिड़िया दिख रही है। मुझे पेड़ दिख रहा है। मुझे पत्ते और तना भी दिख रहा है।' द्रोणाचार्य खुश नहीं हुए। उन्होंने दुर्योधन को रोक दिया और कहा, 'तुम निशाना नहीं लगा सकते।' उन्होंने दुर्योधन को वापस भेज दिया।

फिर द्रोणाचार्य ने भीम को बुलाया। भीम बहुत शक्तिशाली थे। वे आगे आए और निशाना साधा। द्रोणाचार्य ने उनसे भी सवाल पूछा। भीम ने पेड़ की तरफ देखा और कहा, 'मुझे चिड़िया दिख रही है। मुझे बड़ा पेड़, उस पर लगे फल और यहाँ मौजूद सभी लोग दिख रहे हैं।' द्रोणाचार्य ने उन्हें भी रोक दिया और वापस जाने को कहा। द्रोणाचार्य ने बाकी राजकुमारों और दूसरे राजाओं को भी बुलाया। उन्होंने एक-एक करके सबकी परीक्षा ली। सभी ने वही जवाब दिया—उन्हें चिड़िया, पेड़, बगीचा और गुरुजी सब दिख रहे थे। द्रोणाचार्य ने सबको डांटा। उन्होंने कहा कि उनका ध्यान केंद्रित नहीं है और सबको वापस भेज दिया।

अंत में, द्रोणाचार्य ने अर्जुन की ओर देखा। अर्जुन तीसरे पांडव थे और द्रोणाचार्य के सबसे प्रिय शिष्य थे। द्रोणाचार्य मुस्कुराए और अर्जुन को आगे बुलाया। उन्होंने कहा, 'अब तुम्हारी बारी है। तुम्हें निशाना लगाना ही होगा। तैयार हो जाओ।' अर्जुन निशानी पर गए। उन्होंने धनुष उठाया और डोरी को कसकर खींचा। उनका धनुष एक गोले जैसा बन गया। वे एक मूर्ति की तरह स्थिर खड़े हो गए और गुरु के आदेश का इंतज़ार करने लगे।

द्रोणाचार्य ने एक पल इंतज़ार किया और फिर अर्जुन से पूछा, 'हे अर्जुन, क्या तुम्हें चिड़िया दिख रही है? क्या तुम्हें पेड़ दिख रहा है? क्या मैं दिख रहा हूँ?' अर्जुन ने अपनी नज़र निशाने पर ही रखी। उन्होंने द्रोणाचार्य की तरफ नहीं देखा। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा, 'मुझे चिड़िया दिख रही है। मुझे न पेड़ दिख रहा है और न ही आप।' द्रोणाचार्य खुश हुए, लेकिन वे पक्का करना चाहते थे। उन्होंने फिर पूछा, 'अगर तुम्हें चिड़िया दिख रही है, तो उसका वर्णन करो।' अर्जुन ने तुरंत कहा, 'मुझे चिड़िया का सिर दिख रहा है। मुझे उसका शरीर नहीं दिख रहा। मुझे सिर्फ सिर दिखाई दे रहा है।' द्रोणाचार्य बहुत प्रसन्न हुए। वे समझ गए कि अर्जुन तैयार हैं। उन्होंने चिल्लाकर आदेश दिया, 'बाण छोड़ो!'

अर्जुन ने इंतज़ार नहीं किया। उन्होंने तुरंत बाण छोड़ दिया। तीर बहुत तेज़ी से गया और लकड़ी की चिड़िया पर लगा। उसने चिड़िया का सिर काट दिया। सिर ज़मीन पर आ गिरा। परीक्षा समाप्त हो गई थी। अर्जुन सफल हो गए थे। द्रोणाचार्य ने अर्जुन के पास जाकर उन्हें गले लगा लिया। उन्हें बहुत गर्व था। वे जानते थे कि अर्जुन सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं। बाकी राजकुमार चुपचाप देख रहे थे। उन्होंने एकाग्रता (focus) का एक ज़रूरी पाठ सीख लिया था।

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