हमारे पूर्वज नदियों का बडा ख्याल करते थे

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हमारे पूर्वज नदियों का बडा ख्याल करते थे

आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा कि हमारे पूर्वज नदियों का कितना ख्याल रखते थे। पहले, आपको पता है लोग शौच कार्य के लिए नदी किनारे ही जाते थे। आबादी कम थी। पर शिव पुराण में बोला है कि शौच के बाद साफ करने नदी में उतरना मना है। नदी से पानी निकालकर नदी के बाहर साफ करना चाहिए। उद्धृते न जले नैव शौजम कुरियात जलात बहिः ताकि नदी का पानी गंदा न हो जाए। दंत मंचन दांतों को साफ करना। येन केन च पत्रेन काष्ठेन च जलाद बेहिः कार्यम् संदर्जनीम् त्यज्य दंद धावनमीरितम्। जलाद बेहिः जल से बाहर नदी में खडे होकर नहीं नदी में थूकना मना है क्योंकि नदी देवता है। जल में जो देवता हैं, उनको प्रणाम करने के बाद स्नान करना चाहिए। भगवान श्री भैरव से अनुमति मांगते हैं पहले, स्नान करने से पहले, भैरवाय नमस्तुभ्यमनुज्ञां दातुमर्हसी कहकर। नदी में कपड़ा धोना मना। साबुन वगैरह से नदी में कपड़ा धोना मना है। नद्यादि तीर्थ स्नाने तु स्नान वस्त्रं न शोधयेत वापी कूप गृहा दौतु। स्नानाद ऊर्ध्वम् न येद् बुधः शिला धारवादिके वापि जले वापि स्थलेपि वा संशोध्य पीडयद्वस्त्रम् पितॄणाम् तृप्तये द्विजः। स्नान के बाद कपडे को कुवा आदि में या घर में ले जाकर पत्थर या लकड़ी के ऊपर धोना चाहिए। नदी में केवल आप प्रार्थना करके कपड़े पहनकर डुबकी लगा सकते हैं। ना शौच कर सकते, ना थूक सकते, ना उसमें कपड़े धो सकते। आजकल जो लोग प्रकृति संरक्षण के लिए काम करते हैं, आवाज उठाते हैं, उनके लिए बहुत कुछ है हमारे ग्रंथों में। नदी हमारे लिए देवता है। कभी नदी के साथ खिलवाड़ या अनादर नहीं कर सकते। यही हमारी संस्कृति है।

 

  • शिव पुराण के अनुसार शौच के पश्चात जल का उपयोग करने का सही नियम क्या है?
    शिव पुराण के अनुसार शौच के पश्चात नदी के भीतर जाकर स्वयं को स्वच्छ करना वर्जित है। नियम यह है कि नदी से जल पात्र में बाहर निकालकर, नदी तट से दूर ही शुद्धि करनी चाहिए ताकि नदी का मुख्य जल स्रोत दूषित न हो।
  • दंत धावन या दांतों की सफाई के विषय में क्या निर्देश दिए गए हैं?
    दांतों की सफाई करते समय नदी के जल में खड़े होना या उसमें थूकना वर्जित है। किसी भी पत्र या काष्ठ (लकड़ी) की सहायता से नदी के जल से बाहर रहकर ही दंत धावन करना चाहिए, क्योंकि नदी को देवता स्वरूप माना गया है।
  • नदी में स्नान करने से पूर्व भगवान भैरव से अनुमति क्यों मांगी जाती है?
    भगवान भैरव को काशी और अन्य तीर्थों का कोतवाल या रक्षक माना जाता है। उनसे अनुमति मांगना इस बात का प्रतीक है कि हम नदी के पावन क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए अपनी विनम्रता प्रकट कर रहे हैं और जल के प्रति सम्मान भाव रख रहे हैं।
  • नदी में वस्त्र धोने को लेकर शास्त्रों का क्या मत है?
    नदी के भीतर साबुन लगाकर या मल-मलकर वस्त्र धोना पूर्णतः मना है। शास्त्रों के अनुसार स्नान के पश्चात उपयोग किए गए वस्त्रों को घर, कुएं या किसी अन्य स्थान पर ले जाकर ही धोना चाहिए।
  • नदी के जल को प्रदूषित न करने के पीछे आध्यात्मिक कारण क्या है?
    हमारी संस्कृति में जल में देवताओं का वास माना गया है। नदी केवल जल की धारा नहीं, बल्कि साक्षात देवता है। उसमें थूकना, गंदगी करना या अपशिष्ट डालना देवता का अनादर माना जाता है।
  • क्या नदी में डुबकी लगाते समय वस्त्र पहनना अनिवार्य है?
    हां, मर्यादा और पवित्रता बनाए रखने के लिए वस्त्र पहनकर ही नदी में प्रार्थना पूर्वक डुबकी लगाने का विधान है। नग्न स्नान को शास्त्रों में वर्जित बताया गया है।
  • पितरों की तृप्ति के लिए वस्त्र निचोड़ने का क्या नियम है?
    स्नान के पश्चात वस्त्र को नदी के भीतर नहीं निचोड़ना चाहिए। उसे बाहर किसी शिला या काष्ठ पर ले जाकर निचोड़ना चाहिए, जिससे होने वाली जल की बूंदों से पितरों को तृप्ति मिलती है, परंतु मुख्य धारा की स्वच्छता बनी रहती है।
  • आधुनिक प्रकृति संरक्षणवादियों के लिए इन प्राचीन नियमों का क्या महत्व है?
    ये नियम सिद्ध करते हैं कि हमारे पूर्वज पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति अत्यंत सजग थे। जो बातें आज विज्ञान प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर सिखा रहा है, वे हमारे ग्रंथों में हजारों वर्षों से धर्म और आचरण का हिस्सा रही हैं।
  • नदी में स्नान करते समय मन की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
    स्नान से पूर्व जल के देवताओं को प्रणाम करना चाहिए और मन में यह भाव रखना चाहिए कि यह जल केवल शरीर ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी शुद्ध कर रहा है। यह एक भौतिक क्रिया नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुष्ठान है।
  • हमारी संस्कृति में नदियों को देवता मानकर पूजने का रहस्य क्या है?
    इसका रहस्य यह है कि जिस वस्तु को हम पूजते हैं, हम उसका शोषण नहीं करते। नदियों को देवता मानने से मनुष्य और प्रकृति के बीच एक भावनात्मक और पवित्र संबंध स्थापित होता है, जो स्वतः ही पर्यावरण की रक्षा सुनिश्चित करता है।
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