स्वयं को मधुर और प्रसन्न बनाने के लिए मंत्र

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स्वयं को मधुर और प्रसन्न बनाने के लिए मंत्र

इयं वीरुन् मधुजाता मधुना त्वा खनामसि । मधोरधि प्रजातासि सा नो मधुमतस्कृधि ॥१॥

जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम् । ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि ॥२॥

मधुमन् मे निक्रमणं मधुमन् मे परायणम् । वाचा वदामि मधुमद्भूयासं मधुसंदृशः ॥३॥

मधोरस्मि मधुतरो मदुघान् मधुमत्तरः । मामित्किल त्वं वनाः शाखां मधुमतीमिव ॥४॥

परि त्वा परितत्नुनेक्षुणागामविद्विषे । यथा मां कमिन्यसो यथा मन् नापगा असः ॥५॥

यह सूक्त मधुरता, आकर्षण और सामंजस्य को जगाने के लिए है। इसका भाव यह है कि व्यक्ति के वचन, विचार और व्यवहार इतने मधुर हो जाएं कि सामने वाला स्वाभाविक रूप से उसकी ओर आकर्षित हो जाए।

इसमें कहा गया है:
हे मधुरता से उत्पन्न शक्ति, मैं तुम्हें मधु के साथ धारण करता हूं। तुम मधुरता से ही जन्मी हो, इसलिए हमें भी मधुर बना दो। मेरी जिह्वा के अग्र भाग में मधुरता हो, जिह्वा के मूल में भी मधुरता हो। मेरे संकल्प, मेरे कर्म और मेरा मन सब तुम्हारी ओर आकर्षित हों। मेरा चलना, मेरा लौटना सब मधुर हो। मैं जो भी बोलूं, वह मधुर हो, और मैं स्वयं भी मधुर स्वभाव वाला बन जाऊं। मैं मधु के समान बनूं, उससे भी अधिक मधुर बनूं, और जैसे मधु से भरी हुई शाखा सबको आकर्षित करती है, वैसे ही तुम मुझे सबके लिए प्रिय बना दो। मैं तुम्हें चारों ओर से इस मधुरता के सूत्र में बांधता हूं, ताकि कोई द्वेष न रहे। जिस प्रकार प्रियजन आकर्षित होते हैं और दूर नहीं जाते, वैसे ही तुम भी मेरे पास स्थिर रहो।

सार यह है कि यह मंत्र बाहरी नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर मधुरता, सौम्यता और आकर्षण विकसित करने के लिए है, जिससे संबंध स्वाभाविक रूप से सुंदर और स्थिर बनते हैं।

 


क्या इस मंत्र को सुनने के लिए दीक्षा आवश्यक है?

नहीं। दीक्षा केवल तब आवश्यक होती है जब आप मंत्र साधना करना चाहते हैं, सुनने के लिए नहीं।

लाभ प्राप्त करने के लिए बस हमारे द्वारा दिए गए मंत्रों को सुनना पर्याप्त है।

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