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पतंजलि योग सूत्र समाधि पाद सूत्र संख्या 21 तीव्र संवेगानाम आसन्नः योग तो बहुत लोग करते हैं। कोई कोई समाधि तक पहुंच पाता है, उन्हें समाधि के फल की भी प्राप्ति होती है। पर, बहुसंख्यक लोग समाधि तक नहीं पहुंच पाते हैं। यह मत भूलिए कि योगाभ्यास का लक्ष्य ही समाधि को पाना है। जो समाधि तक पहुंचते हैं उनमें भी कोई-कोई जल्दी ही पहुंचता है तो किसी-किसी को बहुत समय लगता है। ऐसा क्यों? इसका कारण बता रहा है सूत्र तीव्र संवेगानाम आसन्नः। इस सूत्र को अगले सूत्र के साथ ही देखना चाहिए। मृदु मध्याधिमात्रत्वात ततोपि विशेषः। योगाभ्यास में संवेग या आप कितनी शक्ति लगाकर, कितना समय लगाकर, कितनी प्रतिबद्धता के साथ अभ्यास करते हैं, इसके आधार पर योगियों को मृदु संवेग वाले, मध्य संवेग वाले और तीव्र संवेग वाले इस प्रकार। विभजन किया जाता है। योगाभ्यास के उपाय भी तीन प्रकार के हैं, मृदु, मध्य और अधिमात्र इस प्रकार। तो मान लो आप मृदु संवेग वाले हो। उपाय के रूप में आप मृदु, मध्य या अधिमात्र ले सकते हैं। इसी प्रकार आप तीव्र संवेग वाले हो। आपका उपाय मृदु, मध्य या अधिमात्र हो सकता है। इन सबके कई क्रमचय और संचय बनते हैं। जिसका संवेग भी तीव्र है और उपाय भी अधिमात्र, उसे सबसे जल्दी समाधि प्राप्त होती है। इनके बीच के भी कई स्तर हो सकते हैं, जैसे तीव्र संवेग वाले में भी कोई मृदु तीव्र होता है, कोई मध्य तीव्र होता है, कोई अधिमात्र तीव्र होता है। जो ५० किलो के ऊपर भार उठा सकता है, उसे हम बलवान कहेंगे। उसमें भी सब समान नहीं है। जो ६० किलो तक उठाएगा, वो मृदु बलवान, जो ८०-९० तक उठाएगा, वो मध्य बलवान। जो १०० से भी ऊपर उठाएगा, वो अति बलवान। इस प्रकार यहां भी उत्सुकता और प्रतिबद्धता रूपी संवेग अनुसार और उपाय के अनुसार कई क्रम छ और संचय बनते हैं। अधिमात्र तीव्र संवेग जिसको है और जो अधिमात्र उपाय को अपनाता है, उसे सबसे शीघ्रता से असम्प्रज्ञा समाधि की प्राप्ति होती है। किसी का संवेग मृदु क्यों है, तीव्र क्यों है, ये तो पूर्व जन्म से आई हुई वासनाओं के ऊपर निर्भर होता है।
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