सदाचार का पालन करें।
सदाचार हीन व्यक्ति को कभी जीवन में सुख नहीं मिलता। सदाचार के बिना यज्ञ, पूजा, दान कुछ भी करने से कोई फायदा नहीं मिलेगा। चाहे वेद-विद्वान भी हो, सदाचारी नहीं है तो अपवित्र हो जाता है।
अन्न शुद्ध है, पवित्र है, पर अगर नरकपाल में परोसा जाएं तो खा पाएंगे? वेद पवित्र हैं, पर जिसके अंदर वेद हैं, वह अपवित्र है तो?
सदाचारी इहलोक और परलोक दोनों को ही जीतता है।
तीर्थों में पुण्य क्यों है? तीर्थों में लोग क्यों जाते हैं? अपने पापों को धोने। इसलिए सारे पुण्य तीर्थ सदाचारियों के इंतजार में रहते हैं।
एक महात्मा से मिलने कोई आया था – महात्मा साधु संत, अतिथि था। बगल से एक पुण्य नदी बहती थी। कहा – चलो स्नान कर लो।
पर स्नान करने महात्मा नहीं उतरे। महात्मा हँसते हुए कहे – 'अरे मेरे पास कोई पाप नहीं है धोने।' अतिथि ने स्नान किया। दोनों लौटने लगे।
तब महात्मा बोले – 'चलो, मैं भी स्नान कर लेता हूं।' अतिथि पूछे – 'अब क्या हुआ?' बोले – 'नहीं, तुमने जो पाप धोया है, मेरे संपर्क से नदी स्वच्छ हो जाएगी।'
हँसी-मजाक में है, मत भूलिए। पर ऐसे साफ सदाचारियों को कहते हैं जंगम तीर्थ। ये घूम सकते हैं जगह-जगह। इनके सत्संग से लोग पवित्र हो जाते हैं। हर पुण्य तीर्थ ऐसे पुण्यात्माओं की प्रतीक्षा में रहते हैं।
असूया रहित श्रद्धा से युक्त सदाचारी चाहे विद्वान नहीं भी हो, सुखी रहता है, इष्ट फलों को प्राप्त करता है।
धर्म क्या है – सदाचार। अच्छे कुलों का लक्षण क्या है – सदाचार। जो सदाचार का पालन नहीं करता, न वह धर्मिष्ठ है, न कुलीन।
सदाचार से आयु की वृद्धि होती है। सदाचार से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सदाचार से कीर्ति की प्राप्ति होती है। सदाचार दरिद्रता और अपमृत्यु का विनाश करता है।
सदाचारों का पालन करने से मन और शरीर स्वच्छ हो जाता है।
लोक में बहुत से दुराचारी सुखी और समृद्ध दिखाई पड़ते हैं, और कई सदाचारी दरिद्र और दुखी भी दिखाई देते हैं। आज अभी जो दिखाई पड़ रहा है, वह उसके पहले के कर्म का फल स्वरूप है। पहले के जन्मों में इस दुराचारी ने पुण्य किया होगा, और आज जो सदाचारी दुखी दिखाई पड़ रहा है, उसने पहले बुरा कर्म किया रहेगा।
अब जिसका आचरण कर रहे हो, उसका फल तुरन्त नहीं, परलोक में या अगले जन्म में मिलेगा।
वेदों में जो सदाचार बताया है, उन्हीं का विस्तार पुराणों, स्मृतियों, इतिहासों और धर्मशास्त्र के ग्रंथों में किया गया है। धर्म सूक्ष्म है, तद्वारा सदाचार भी सूक्ष्म हैं। ये पुनर्जन्म और कर्मविपाक के सिद्धांतों पर आधारित हैं। इनका निर्णय बहुमत या जनप्रियता से नहीं होता है। ये सिद्धांत नित्य हैं, अटल हैं।
जिनको इन बातों का ज्ञान नहीं है, सम्यक ज्ञान नहीं है, उनको लेकर टीवी चैनल पर आधे घंटे की बहस कराने से – जिसके बीच पंद्रह मिनट विज्ञापन में चला जाता है – ऐसे करने से धर्म और सदाचार के विषयों का कभी निर्णय नहीं हो सकता।
धर्म और सदाचार के विषयों में संदेह आने पर क्या करना चाहिए – वेद ही बताता है:
'अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्। ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तेरन्, तथा तत्र वर्तेथाः।'
'अथाभ्याख्यातेषु, ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः, युक्ता आयुक्ताः, अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तेषु वर्तेरन्, तथा तेषु वर्तेथाः।'
पक्षपातरहित, स्वतंत्र विद्वान, धर्मकामी, सौम्य अनुभवी महात्माओं को देखो, वे जैसे आचरण करते हैं, वैसा करो।
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