गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की शुरुआत में ही केवल देवताओं की ही नहीं, बल्कि दैत्य, राक्षस, प्रेत, नाग आदि सबकी वंदना की है—
'देव दनुज नर नाग खग, प्रेत पितर गंधर्व।
बंदऊ किन्नर रजनिचर, कृपा करहु अब सर्व॥'
क्यों? क्योंकि तुलसीदास जी यह बताना चाहते हैं कि योग और भक्ति की दृष्टि से वे कितनी ऊँची अवस्था तक पहुँच चुके थे।
इससे पहले वे कहते हैं—
'जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानी।
बंदऊ सबके पदकमल सदा जोरी जुगपानी॥'
अर्थात, जड़ और चेतन, सभी जीवों में राम का ही अंश व्याप्त है। तुलसीदास जी का भाव है कि समस्त जगत श्रीराम के विश्वरूप का ही विस्तार है। वे कहते हैं—
'विश्वरूप व्यापक रघुराई।
हरी व्यापक सर्वत्र समाना॥
देश काल दिशि विदिशि हुमाही।
कहहु सो कहा जहं प्रभु नाही॥'
वाल्मीकि रामायण में भी कहा गया है— ‘जगत् सर्वं शरीरं ते’,
और भागवत में आता है— यह सम्पूर्ण जगत भगवान का ही शरीर है। उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।
हो सकता है कि राक्षस देवताओं के शत्रु हों, पर भक्त या योगी के लिए कोई शत्रु नहीं होता। देव और दैत्य आपस में युद्ध करते होंगे, दैत्य दुष्ट भी होंगे, पर भक्त की दृष्टि में वे भी उसी परमात्मा के अंग हैं।
मारीच प्रसंग में जब उसने भगवान से कहा कि वह यज्ञों में बाधा डालता है, तो भगवान ने उसे नहीं रोका। उन्होंने कहा— 'ठीक है, तुम लोग अपना धर्म निभा रहे हो, पर मैं भी तुम्हें मारकर अपना क्षत्रिय धर्म निभा रहा हूँ।' यह दृष्टि अद्वैत की है— किसी से स्थायी द्वेष नहीं रखना।
हर प्राणी—जड़ या चेतन—सब राममय हैं। प्रेत, पिशाच, राक्षस तक वंदनीय हैं। यही है सच्चे भक्त और योगी का भाव।
तुलसीदास जी आगे कहते हैं—
'आकर चारी लाख चौरासी।
जाती जीव नभ जल धल वासी॥
सीय राममय सब जग जानी।
करहु प्रणाम जोरी जुगपानी॥'
वृक्षादि 20 लाख, जलचर 9 लाख, कृमि 11 लाख, पक्षी 10 लाख, पशु 30 लाख, वानर 4 लाख—
ये सब विभिन्न स्वरूप हैं, पर अंततः सबमें वही राम तत्व विद्यमान है।
जो सच्चा भक्त बनना चाहता है, उसे यही दृष्टि अपनानी होगी—
हर जीव, हर कण में, श्रीराम का ही दर्शन।
भक्ति की दृष्टि से सभी प्राणी वंदनीय क्यों हैं?
क्योंकि तुलसीदास जी के अनुसार परम तत्व सबमें एक समान रूप से व्याप्त है। चाहे देव हों या दैत्य, सभी उसी चैतन्य के अंश हैं। भक्ति का अर्थ है भेदभाव मिटाना और हर जीव में उसी दिव्यता को पहचानना।
क्या सचमुच राक्षस और प्रेत भी वंदनीय हो सकते हैं?
हाँ, जब दृष्टि अद्वैत की हो, तो किसी में भी अशुद्धता नहीं दिखती। जैसे सूर्य हर वस्तु पर समान रूप से चमकता है, वैसे ही दिव्य चेतना हर प्राणी में समान रूप से विद्यमान है।
अगर सबमें एक ही तत्व है तो फिर अच्छाई-बुराई का क्या अर्थ रह जाता है?
अच्छाई-बुराई व्यवहार जगत के स्तर पर हैं, पर ज्ञान दृष्टि से सब ब्रह्मस्वरूप हैं। यह दृष्टि अहंकार को समाप्त करती है और द्वेष से मुक्त करती है।
योगी किसी को शत्रु क्यों नहीं मानता?
क्योंकि उसकी दृष्टि एकात्म होती है। वह जानता है कि विरोध केवल शरीर और प्रवृत्ति का है, आत्मा में कोई भेद नहीं। इस भाव से द्वेष स्वतः समाप्त हो जाता है।
क्या इस दृष्टि से जीवन में संघर्ष समाप्त हो जाता है?
संघर्ष रहता है, पर मन में कड़वाहट नहीं रहती। कर्म और कर्तव्य चलते रहते हैं, पर उनके पीछे द्वेष या अहंकार नहीं होता।
जो बुराई करता है, उसके प्रति भी यही दृष्टि रखनी चाहिए क्या?
हाँ, पर इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय को सहा जाए। अन्याय का विरोध धर्म है, पर द्वेष रहित होकर किया गया विरोध ही योग कहलाता है।
मारीच प्रसंग में भगवान का उत्तर क्या दर्शाता है?
उन्होंने कहा कि हर प्राणी अपना धर्म निभा रहा है—दैत्य अपना, मैं अपना। यह पूर्ण समत्व की दृष्टि है, जिसमें कर्तव्य और करुणा साथ चलते हैं।
क्या इस दृष्टिकोण से हिंसा भी धर्म हो सकती है?
यदि वह धर्मपालन और समाजरक्षा के लिए हो, तो हाँ। उद्देश्य शुद्ध हो तो कर्म भी शुद्ध होता है।
क्या यह दृष्टि केवल संतों के लिए है या हर व्यक्ति अपना सकता है?
हर व्यक्ति इसे अभ्यास से अपना सकता है। धीरे-धीरे जब मन से द्वेष मिटता है, तब यह भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
84 लाख योनियों की बात का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
यह सृष्टि की विविधता का प्रतीक है। हर जीव किसी न किसी स्तर पर उसी दिव्यता को धारण करता है। यह समझ मन में समभाव और करुणा जगाती है।
क्या इस ज्ञान से भक्ति का अभ्यास आसान हो जाता है?
हाँ, क्योंकि जब हर रूप में एक ही ईश्वर दिखता है, तो पूजा हर क्षण, हर स्थान पर संभव हो जाती है।
अगर सबमें ईश्वर हैं तो फिर मंदिरों की क्या आवश्यकता रह जाती है?
मंदिर वह स्थान है जहाँ यह एकत्वभाव जाग्रत करने का अभ्यास होता है। जब मन स्थिर और श्रद्धामय होता है, तब वही भाव सबमें फैल जाता है।
Astrology
Bhagavad Gita
Bhagavatam
Bharat Matha
Devi
Devi Mahatmyam
Ganapathy
Garuda Puranam
Glory of Venkatesha
Hanuman
Kathopanishad
Mahabharatam
Mantra Shastra
Mystique
Practical Wisdom
Purana Stories
Radhe Radhe
Ramayana
Rare Topics
Rigveda Explained
Rituals
Sages and Saints
Shiva
Spiritual books
Sri Suktam
Story of Sri Yantra
Temples
Vedas
Vishnu Sahasranama
Yoga Vasishta