
विवेक के स्वरूप को बताकर तुलसीदास जी सज्जनों के निर्मल स्वभाव का वर्णन कर रहे हैं।
काल सुभाव करम भरियाई। बेलवु प्रकर्दि बसचुकई भलाई।
सो सुधारि हरिजन जी मिलेही। दारी दुख दोष विमल जस देही॥
खलवु करही भल पाई सुसंगु। मितवु न मलिन सुभाव अभंगु॥
काल, सुभाव और करम की प्रबलता के कारण भले लोग भी कभी-कभी माया के वश में होकर भलाई से चूक जाते हैं। हर मनुष्य काल के वश में रहता है। इस जगत में जितनी भी जन्य वस्तुएं हैं, वे सब काल के अधीन हैं। काल ही उन सबका जनक है। इसका मतलब यह हुआ कि इस जगत में हर वस्तु जन्य है — परब्रह्म के अलावा। काल जन्य वस्तुओं का जनक है, तो काल का जनक है परब्रह्म। और राम जी यही परब्रह्म स्वरूप हैं।
सिर्फ मनुष्य ही नहीं, देव, ऋषि, सिद्ध, गंधर्व, यक्ष — ये सब भी काल के अधीन हैं। काल के अधीन मतलब — इनका आदि भी है और अंत भी है। पर श्रीराम जी इस काल के नियंता हैं। काल के नियंतरण से अगर बचना है, तो एक ही मार्ग है — श्रीराम जी की शरण।
काल की तरह हम लोग स्वभाव के वश में भी रहते हैं। स्वभाव का अर्थ है मिस्रग — स्वतःसिद्ध भाव, जिसे बदला नहीं जा सकता। हम जितना भी बोलें, स्वभाव नहीं बदलता। इसके उदाहरण भी हैं —
स्वभावो यादृशो यस्य न जहाति कदाचन।
अंगारस्य तद्वतेन मलिनत्वं न मुञ्चति॥
कोई भी मनुष्य अपने स्वभाव को छोड़ नहीं सकता। कोयले को सौ बार अच्छे से धो लीजिए, वह अपने कालेपन को नहीं छोड़ता। हजार उपदेश करके भी स्वभाव को बदला नहीं जा सकता।
पानी या दूध को चाहे जितना भी गरम कर लीजिए, वह कुछ देर बाद ठंडा हो ही जाएगा। ऐसे ही दुर्जनों को आप जितना भी धर्म समझाइए, वे उसमें दोष निकालना नहीं छोड़ेंगे। और सज्जनों को आप जितना भी माया में डाल दीजिए, वे अपनी भलमनसाहत नहीं छोड़ते।
कर्म — हमने जो अच्छा कर्म किया, वह हमें सुख देता है। और जो बुरा कर्म किया, वह हमें दुख देता है। यह कर्म पूर्व जन्म में किया हुआ या इस जन्म में किया हुआ भी हो सकता है। उसी को हमें सुख और दुख के रूप में भोगना पड़ता है।
अब हमने पहले देखा कि स्वभाव बदला नहीं जा सकता। इसका अर्थ यह नहीं कि स्वभाव कभी नहीं बदला जा सकता — पर उसे बदलना आसान नहीं है। स्वभाव को बदलने का उपाय है अभ्यास। बार-बार अच्छी चीजों को करने से वह अपना स्वभाव बन सकता है। और जो बुरा स्वभाव है, उसे बार-बार न अपनाने से उससे छुटकारा भी मिल सकता है।
इसमें और एक वस्तु की आवश्यकता है — श्रीराम जी का आशीर्वाद। राम जी से प्रार्थना करेंगे तो वे हमारे स्वभाव को भी बदल सकते हैं। राम जी से प्रार्थना कीजिए —
लखि सुबेस जग बंचक जेवु।
बेस प्रताप पूजिय हि तेवु॥
उपर ही अंतन होइ निबाह।
कालनेमि जिमि रावन राह॥
कियहु कुबेस साधु सनमानु।
जिमि जग जामवंत हनुमानु॥
इससे पहले तुलसीदास जी ने सज्जनों और दुर्जनों के स्वभाव और प्रकृति का वर्णन किया था। अब लोगों के मन में विद्यमान एक बड़ी भ्रांति को दूर कर रहे हैं।
क्या है वह भ्रांति? बहुत लोग सोचते हैं कि जो सु-रूप और अच्छे वेश धारण किए होते हैं, वे सज्जन हैं; और जो कुरूप हैं या अच्छे वेश में नहीं रहते, वे दुर्जन हैं। ऐसी नहीं है वास्तविकता।
जगत को ठगने वाले लोग भी साधु के वेश में हो सकते हैं। वे अपनी वेश-भूषा के कारण सबके द्वारा पूजे जाते हैं, पर कुछ समय बाद वे खुल जाते हैं और अपना असली स्वरूप दिखा देते हैं। इसके उदाहरण दे रहे हैं तुलसीदास जी — रावण और राहु का।
रावण जब सीता माता का अपहरण करने आया था, तो साधु-संन्यासी के वेश में आया था। पर इसका अर्थ यह नहीं कि हर सुवेश धारण किया हुआ मनुष्य सज्जन ही हो।
गोस्वामी तुलसीदास जी यह कहना चाह रहे हैं कि यह निर्णय करने से पहले कि कोई व्यक्ति सज्जन है या नहीं, कुछ दिन उसके साथ व्यवहार करें। यदि वह सच में सु-रूप सुवेश धारी सज्जन है, तो अच्छी बात है। और यदि वह सु-रूप वेश-धारी दुरजन है, तो अपने आप खुलकर अपना स्वभाव बता देगा।
कुछ लोगों का मन ऐसा होता है — किसी धोती-कुर्ता पहने हुए व्यक्ति को देखते ही सीधा जाकर अपने जीवन के दुख-कष्ट उसे बता देते हैं, उससे परिहार मांगते हैं। ऐसा मत कीजिए।
अगर वास्तव में वह सज्जन है, तो ठीक है, कोई समस्या नहीं। पर यदि वह दुष्ट है और सुवेश में रहता है, तो वह आपको घुमाएगा, अपने अधूरे ज्ञान को आप पर प्रयोग करेगा और अंत में आपको छोड़कर चला जाएगा।
इसलिए सज्जन और दुर्जन के बारे में निर्णय करने से पहले उनके बारे में जानने का प्रयास अवश्य करें।
सज्जन का स्वभाव परिस्थिति से प्रभावित क्यों होता है?
क्योंकि काल, कर्म और माया के प्रभाव से मन कुछ समय के लिए भ्रमित हो सकता है। परंतु सज्जन व्यक्ति की अंतरात्मा जाग्रत होती है, जो उसे अंततः सत्य और भलाई की ओर लौटाती है।
क्या सज्जन व्यक्ति भी गलतियाँ करता है?
हाँ, लेकिन वह अपनी भूल को स्वीकार कर उसे सुधारता है। उसकी सज्जनता का यही प्रमाण है।
अगर वह भी भटक सकता है तो वह दूसरों से अलग कैसे है?
वह भूल में फँसता नहीं, उसे पहचानकर सुधार करता है। यही उसे खरा बनाता है।
संसार की हर वस्तु काल के अधीन क्यों है?
जो भी उत्पन्न होता है, वह समय के प्रभाव में आता है — उसका आरंभ और अंत होता है। केवल वह तत्व काल से परे है जो कभी उत्पन्न नहीं हुआ।
क्या देवता और ऋषि भी काल के प्रभाव में आते हैं?
हाँ, वे भी समय के नियम से संचालित होते हैं, यद्यपि उनका काल चक्र लंबा होता है।
अगर सब कुछ कालबद्ध है तो शाश्वत तत्व क्या है?
वह जो न उत्पन्न हुआ है, न नष्ट होगा — वही परब्रह्म, जो काल को भी नियंत्रित करता है।
स्वभाव को बदलना इतना कठिन क्यों होता है?
क्योंकि यह मन के गहरे संस्कारों का परिणाम है, जो समय के साथ जड़ पकड़ लेते हैं। केवल ज्ञान या उपदेश से यह नहीं बदलते।
क्या स्वभाव में बदलाव संभव है?
हाँ, लेकिन इसके लिए अभ्यास, संयम और दिशा की निरंतरता चाहिए।
अगर स्वभाव जन्मजात है तो उसे बदलना असंभव नहीं हुआ?
नहीं। जन्मजात होने का अर्थ केवल प्रारंभिक स्थिति है, मनुष्य में उसे सुधारने की क्षमता रहती है।
अभ्यास स्वभाव में बदलाव कैसे लाता है?
बार-बार किसी कर्म को करने से मन उसे सहजता से अपनाने लगता है, और धीरे-धीरे वही उसका नया स्वभाव बनता है।
क्या अभ्यास से स्वभाव पूरी तरह बदल सकता है?
हाँ, लेकिन इसके लिए धैर्य और निरंतरता चाहिए। अस्थायी कोशिशें असर नहीं लातीं।
अगर अभ्यास ही काफी है तो सब लोग क्यों नहीं बदलते?
क्योंकि अभ्यास कठिन होता है और अधिकतर लोग प्रारंभिक असफलता से ही पीछे हट जाते हैं।
कर्म का फल कैसे निश्चित होता है?
हर कर्म एक बीज की तरह होता है — समय आने पर वह फल देता है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा।
क्या सभी दुख-कष्ट पिछले कर्मों का ही फल हैं?
बहुत हद तक हाँ। यह वर्तमान और पूर्वजन्म के कर्मों का सम्मिलित परिणाम होता है।
अगर सबकुछ पूर्व निर्धारित है तो वर्तमान प्रयास का क्या मूल्य है?
वर्तमान प्रयास पुराने कर्मों के प्रभाव को कम कर सकता है और भविष्य को बदल सकता है।
वेश या रूप से सज्जनता का अनुमान क्यों गलत हो सकता है?
क्योंकि कोई भी व्यक्ति अच्छा दिखने का आवरण ओढ़ सकता है, पर उसका स्वभाव समय के साथ ही प्रकट होता है।
क्या सुंदर या धार्मिक वेशधारी को तुरंत सज्जन मान लेना उचित है?
नहीं। पहले उसके व्यवहार, दृष्टिकोण और आचरण को परखना चाहिए।
क्या वेशभूषा का कोई महत्व नहीं है?
वह केवल एक संकेत हो सकता है, प्रमाण नहीं। निर्णायक तत्व केवल आचरण है।
किसी के स्वभाव को समझने के लिए समय क्यों आवश्यक है?
क्योंकि व्यक्ति का असली चेहरा परिस्थितियों में ही सामने आता है।
क्या धीरे-धीरे परखना ही सच्चा ज्ञान देता है?
हाँ। क्षणिक धारणा अक्सर भ्रमित कर सकती है।
क्या तुरंत विश्वास करना मूर्खता है?
अक्सर हाँ। विवेकशील परख ही सुरक्षा है।
कृपा का स्वभाव परिवर्तन में क्या योगदान है?
जब मनुष्य स्वयं प्रयास करता है, तो कृपा उसे मानसिक बल, स्पष्टता और संकल्प प्रदान करती है।
क्या केवल अभ्यास से ही परिवर्तन होगा?
नहीं। अभ्यास को फलदायी बनाने के लिए भीतर की प्रेरणा, यानी कृपा, भी चाहिए।
क्या केवल कृपा से बिना प्रयास परिवर्तन संभव है?
नहीं। कृपा उसी को सहारा देती है जो स्वयं चलने को तैयार हो।
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