
वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को श्रीनृसिंह जयंती मनाई जाती है। इसी दिन भगवान श्रीनृसिंह स्तंभ से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का वध करके अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा करते हैं। अतः इस तिथि को व्रत करके श्रीनृसिंह भगवान की पूजा करनी चाहिए और रात्रि को जागरण करना चाहिए।
पद्मपुराण में कहा गया है:
जो व्यक्ति वैशाख महीने की शुक्ल चतुर्दशी को श्रद्धा और भक्ति के साथ नृसिंह भगवान की पूजा करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
जो व्यक्ति इस दिन भगवान का स्मरण करते हुए उपवास करता है, और श्रीनृसिंह भगवान का ध्यान करता है, वह भी समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
इस दिन जो भी हवन, पिंडदान, दान आदि किया जाता है वह दस गुना फल देने वाला होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
यह व्रत वैशाख मास में आने वाले चार मुख्य व्रतों में से एक माना गया है – वृद्धत्व प्राप्ति हेतु वृद्धाष्टमी, आयुरारोग्य हेतु नरसिंह चतुर्दशी, संतान प्राप्ति हेतु मोहिनी एकादशी, और विशेष पुण्य फल हेतु अक्षय तृतीया।
नरसिंह चतुर्दशी व्रत का विधान इस प्रकार है:
प्रातः स्नान आदि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें – 'मैं भगवान नरसिंह के प्रसन्नता हेतु चतुर्दशी व्रत करूँगा।'
इसके पश्चात व्रती को दिन भर उपवास करना चाहिए। यदि संभव हो तो निर्जल व्रत करें। न हो तो फलाहार करें। इस दिन अन्न, तेल, मांस, लहसुन-प्याज आदि तामसिक वस्तुओं का त्याग अनिवार्य है।
सायंकाल संध्या के बाद भगवान नरसिंह का पूजन करें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर भगवान नरसिंह की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। पास में एक स्तंभ का प्रतीक रखें, जिससे यह स्मरण हो कि भगवान स्तंभ से प्रकट हुए थे।
पूजन विधि:
फिर भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं।
रात्रि जागरण करें। श्रीनृसिंह कवच, विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता का पाठ करें।
प्रातःकाल ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें।
शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन जो व्यक्ति विधिपूर्वक उपवास रखकर रात्रि जागरण करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है। यह व्रत समस्त रोगों से रक्षा करता है, दुःस्वप्नों का नाश करता है और भूत-प्रेत बाधाओं से मुक्ति देता है।
नृसिंह भगवान को 'मृत्युञ्जय' कहा गया है – अर्थात जो मृत्यु के भी अधिपति हैं। उनका स्मरण मात्र ही जीवन में भय, क्लेश, रोग और पापों से मुक्ति देने वाला है।
नृसिंह भगवान का स्वरूप अत्यंत उग्र है, परंतु अपने भक्तों के लिए वह करुणामय हैं। वे कहते हैं – 'मैं अपने भक्त की रक्षा हेतु समय, स्थान और रूप की सीमाएं तोड़ सकता हूँ।'
इस दिन भगवान के 'नृसिंह स्तोत्र', 'नृसिंह कवच', 'प्रह्लाद स्तुति', 'भगवद्गीता' के सातवें स्कंध का पाठ अति फलदायक होता है।
जिनको ग्रहदोष, विशेषतः राहु-केतु से कष्ट हो, उनके लिए यह व्रत अत्यंत कल्याणकारी है। साथ ही, जिन घरों में संतान को भय, रोग या रात में डर लगता है, उन्हें नृसिंह स्तोत्र का पाठ नियमित करना चाहिए।
प्रसिद्ध मंदिरों जैसे अहोबिलम (आंध्र प्रदेश), सिंहाचलम् (विशाखापट्टनम), मेलकोट और सिरंगम में इस दिन विशेष पूजन, अलंकार और अभिषेक की परंपरा है। अहोबिलम में भगवान के नौ स्वरूप पूजित होते हैं और सिंहाचलम् में पूरे वर्ष चंदन से ढंके विग्रह का चतुर्दशी को उग्रमूर्ति दर्शन कराया जाता है।
इस प्रकार, यह पर्व न केवल एक परंपरा है, बल्कि भक्त और भगवान के संबंध की जीवंत अभिव्यक्ति है – जहाँ विश्वास और समर्पण पर कृपा और सुरक्षा का उत्तर आता है।
१. ॐ नारसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो सिंहः प्रचोदयात्॥
२. श्री प्रह्लाद उवाच:
३. कवचं नारसिंहस्य प्रवक्ष्यामि समाहितः। श्रुत्वा लाभं प्रप्नोति सर्वत्र विजयī भवेत्॥
४. सर्वरोगान् प्रशमयेत् सर्वसम्पदवर्धनम्। दुःस्वप्न नाशनं कुर्यात् स्मरणं भय नाशनम्॥
५. ग्रहेभ्यः शान्तिकरं यक्षराक्षः विनाशनम्। शत्रूनां भयदं नृणां रक्षणायां परायणम्॥
६. पूर्वतो मे कपिं राजं आग्नेयं च प्रदक्षिणम्। दक्षिणे च महावीरं पश्चिमे पृष्ठतः स्थितम्॥
७. वायव्ये नारसिंहश्च उत्तरं पातु लक्ष्मणः। ईशान्यां पातु भक्तानां वरदः पुरुषोत्तमः॥
८. ऊर्ध्वं पातु हरिः शम्भुः अधो मे पातु माधवः। हृदि मे नारसिंहस्तु ज्वालामालिनि सन्निभः॥
९. बाहु युग्मं च मे पातु लोकभयङ्करः प्रभुः। करौ मे देववरदो नृसिंहः पातु सर्वतः॥
१०. चरणौ पातु मे विष्णुः मार्गे पातु नृकेसरी। शीर्षे पातु श्रीनृसिंहः सर्वाङ्गे सर्वतः प्रभुः॥
११. नखानि च पातु नृसिंहः शिरः पातु धनंजयः। नेत्रे पातु सुरश्रेष्ठः श्रोत्रे पातु महाबलः॥
१२. नासिकां मे पातु लोकविद्वेषकृद्रिपुः। ओष्ठं पातु महावीरः जिह्वां मे सुरपूजितः॥
१३. मुखं पातु महोत्तंसः कण्ठं पातु च कंकणिः। स्कन्धौ भूधरभृद्राजा पातु मे किल भीषणः॥
१४. भूजङ्गेश्वरपाशाढ्यः करौ मे देववरदः। उदरं पातु मे विष्णुर्भक्तानां रक्षणं परम्॥
१५. कटिं च पातु नारसिंहः गूह्यं मे पातु योगिनाम्। ऊरू मनोभवः पातु जानुनी नरवन्दितः॥
१६. जङ्घे पातु धराभारहर्ता योऽसुरनिसूदनः। पादौ मे देवदेवेशः पातु मे सर्वतः प्रभुः॥
१७. एतत्कवचमज्ञात्वा यो जपेत्संकरं नरः। स सर्वं विनशं याति यावद्भूमण्डलं ध्रुवम्॥
१८. यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसंध्यं श्रद्धयान्वितः। ददाति स यथाकामं क्षयं यान्ति न संशयः॥
१९. सर्वत्र जयमाप्नोति सर्वत्र विजयभूषणः। जीवेत् वर्षशतं सौम्यं धनं धान्यं समृद्धिभिः॥
२०. पुत्रपौत्रादिसहितं लभते मोक्षमुत्तमम्। भूतप्रेतपिशाचाद्याः भयं नास्ति कदाचन॥
१. स्थान व समय:
२. प्रारंभिक आचमन व प्रार्थना:
३. दीपक व अगरबत्ती जलाएं।
४. श्री नृसिंह कवच का पाठ करें —
५. समापन के समय प्रार्थना करें —
६. नमस्कार करें और तुलसी पत्र या फल अर्पित करें।
७. यदि संभव हो तो ११, २१, १०८ बार पाठ करें। विशेष कष्टों की स्थिति में यह कवच सात दिन, इक्कीस दिन या चालीस दिन तक नित्य करें।
अब यह श्री नृसिंह कवच संपूर्ण रूप से भावार्थ, सारांश, और पाठ विधि सहित तैयार है। इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ें, साझा करें और अपनी साधना का हिस्सा बनाएं।
नृसिंह भगवान की जय!
Astrology
Bhagavad Gita
Bhagavatam
Bharat Matha
Devi
Devi Mahatmyam
Ganapathy
Garuda Puranam
Glory of Venkatesha
Hanuman
Kathopanishad
Mahabharatam
Mantra Shastra
Mystique
Practical Wisdom
Purana Stories
Radhe Radhe
Ramayana
Rare Topics
Rigveda Explained
Rituals
Sages and Saints
Shiva
Spiritual books
Sri Suktam
Story of Sri Yantra
Temples
Vedas
Vishnu Sahasranama
Yoga Vasishta