श्री हरि के अवतारों का वास्तव में उद्देश्य जानिये

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श्री हरि के अवतारों का वास्तव में उद्देश्य जानिये

श्री हरि वृंदावन में कैसे रहते हैं? अपने भक्तों द्वारा परिवेष्टित घिरे हुए। वे भक्त भी कैसे? जो दोनों हाथों को ऊपर करके हरि नाम उच्चारण करने वाले लगातार। अभंग नामोच्चार। हरी हरी हरी हरी हरी राधे राधे राधे राधे। उनकी आंखों से भक्ति पारवश्यता से आंसू बह रहा है। उसे देखकर ऐसा लगता है कि राधा रानी के विरह दुख का समावेश उन सबके दिलों में हो गया हो। उन आंसुओं से भूमितल का अभिषेक हो रहा है। न केवल नामोच्चार, वे नाच रहे हैं मनमोहक भाव और ताल से। वे सब गा रहे हैं, श्री हरि के गुणगान। ऐसे भक्त हैं उनके चारों तरफ। इस भक्ति रस का आनंद लेकर भगवान श्री कृष्ण स्वयं एक कदंब के फूल जैसे खिल उठे हैं। उनको मैं प्रणाम करता हूं। भगवान अवतार क्यों लेते हैं? धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे। कहते हैं गीता में। धर्म जब भ्रष्ट होता है तो उसका पुनः संस्थापन के लिए। लेकिन लगता है भगवान यूं ही कहते हैं अर्जुन को। उदास अर्जुन को प्रोत्साहित कर रहे थे, उत्तेजित कर रहे थे। यूं ही कह दिया। यह तो श्री हरि वैकुंठ में बैठकर भी कर सकते हैं। यह तो उनके लिए मामूली सा कार्य है। इसके लिए अवतार क्यों लेंगे? इनही बिलोकत अति अनुरागा, बरबस ब्रह्म सुख ही मन त्यागा। उनको देखते ही जनक जैसे ब्रह्मनिष्ठ वैरागी का भी मन ब्रह्म सुख को त्याग देता है। सहज वैराग रूप मन मोरा थकित होत जिमि चंद चकोरा। चंद्रमा को देखकर जैसे चकोर मुग्ध हो जाता है, वैसे ही इनको देखकर मेरा मन जो स्वभाव से ही वैराग्य से भरा हुआ है, वो मुक्त हो रहा है। उन वैरागी ब्रह्मनिष्ठों के सामने अपना असीम सौंदर्य, सौकुमारी और माधुर्य प्रकट करके उन्हें मुक्त करके उन्हें भक्ति रस का परम अनुभूति दिलाने भगवान अवतार लेते हैं। तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द किंजल्क मिश्र तुलसी मकरन्द वायुहु अंतर्गत स्वविरेण चकारतेषां संशोभमक्षरजुषामपि चित्तदन्नोः कमल नेत्र भगवान के चरण कमल के पराग से मिली हुई तुलसी मंजरी को स्पर्श करके आती हुई हवा ने जब उनके नासिका छिद्रों में प्रवेश कर लिया तो उन अक्षर परमात्मा में नित्य स्थित रहने वाले ज्ञानी योगी महात्मा भी मुग्ध होकर भक्ति में परवश हो गए। यह है भक्ति का आनंद। उसकी अनुभूति। यह है भगवान का अवतारोद्देश्य।

 

  • श्री गौर चंद्र की शारीरिक शोभा की तुलना विकसित कदम्ब के पुष्प से क्यों की गई है?
    जब भक्त भक्ति के परमानंद में डूबकर हरि नाम का संकीर्तन करते हैं, तो उस आनंद को देखकर भगवान स्वयं पुलकित हो उठते हैं। कदम्ब का पुष्प खिलने पर जिस प्रकार रोमयुक्त प्रतीत होता है, वैसे ही भक्ति रस के आस्वादन से भगवान के शरीर पर रोमांच हो आता है, जो उनके परमानंद की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
  • श्री हरि के पार्षदों और भक्तों की भक्ति अवस्था का क्या स्वरूप बताया गया है?
    भगवान के भक्त अपनी भुजाओं को ऊपर उठाकर निरंतर हरि नाम का उच्चारण करते हैं। उनकी आँखों से भक्ति के आवेग में आंसुओं की अविरल धारा बहती है, जिससे पृथ्वी का अभिषेक होता है। वे केवल नाम ही नहीं लेते, अपितु दिव्य भाव और ताल के साथ नृत्य और गायन में पूर्णतः लीन रहते हैं।
  • भक्तों की आँखों से बहने वाले आंसुओं के पीछे कौन सा गूढ़ भाव छिपा है?
    भक्तों के उन आंसुओं को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके हृदय में श्री राधा रानी के विरह दुख का समावेश हो गया हो। यह विरह की अग्नि नहीं, अपितु प्रेम की वह उच्चतम अवस्था है जहाँ भक्त अपने आराध्य के वियोग में तड़पता हुआ भी परम आनंद का अनुभव करता है।
  • क्या धर्म की स्थापना ही भगवान के अवतार का एकमात्र और वास्तविक कारण है?
    यद्यपि गीता में धर्म संस्थापना की बात कही गई है, परंतु वास्तव में यह कार्य भगवान वैकुंठ में बैठकर भी कर सकते हैं। अवतार का मुख्य और गुप्त कारण अपने भक्तों को अपने दिव्य सौंदर्य और माधुर्य का दान करना तथा उन्हें भक्ति रस की अनुभूति कराना है।
  • राजा जनक जैसे ब्रह्मनिष्ठ ज्ञानी भगवान के दर्शन मात्र से क्यों विचलित हो गए?
    राजा जनक का मन स्वभाव से ही वैरागी था और वे ब्रह्म सुख में स्थित रहते थे। परंतु श्री राम के असीम सौंदर्य और सुकुमारता को देखकर उन्होंने उस निर्गुण ब्रह्म सुख को भी त्याग दिया। भगवान का माधुर्य इतना प्रबल है कि वह परम वैरागियों के मन को भी चकोर की भांति अपनी ओर खींच लेता है।
  • 'अक्षरजुषामपि' पद के माध्यम से ज्ञानियों की किस स्थिति का वर्णन किया गया है?
    इसका अर्थ है कि वे ज्ञानी जो सदा उस अक्षर (अविनाशी) परमात्मा के ध्यान में मग्न रहते हैं और संसार से विरक्त हैं, वे भी भगवान के साकार रूप और उनकी सुगंध के सम्मुख अपने चित्त का नियंत्रण खो बैठते हैं और भक्ति के वश में हो जाते हैं।
  • भगवान के चरण कमलों की तुलसी मंजरी का योगियों के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
    जब भगवान के चरणों के पराग से मिश्रित तुलसी की सुगंध वायु के माध्यम से योगियों की नासिका में प्रवेश करती है, तो वह उनके स्थिर चित्त में भी खलबली मचा देती है। यह दर्शाता है कि भगवान की भक्ति का आनंद मुक्ति के सुख से भी कहीं अधिक श्रेष्ठ और बलवान है।
  • भगवान के अवतार का 'माधुर्य' पक्ष उनके 'ऐश्वर्य' पक्ष से कैसे श्रेष्ठ है?
    ऐश्वर्य में भगवान की शक्ति और नियम का प्रदर्शन होता है, जिसे दूर से प्रणाम किया जाता है। परंतु माधुर्य में भगवान अपनी सुंदरता और प्रेम से भक्तों को आकर्षित करते हैं। अवतार का उद्देश्य इसी प्रेम और माधुर्य के माध्यम से जीवों को अपने पास बुलाना है।
  • इस विवरण में 'भक्ति पारवश्यता' का क्या अभिप्राय है?
    भक्ति पारवश्यता वह अवस्था है जहाँ भक्त का अपनी इंद्रियों और देह पर नियंत्रण नहीं रहता। वह पूरी तरह से भगवान के प्रेम के अधीन हो जाता है। इसी अवस्था में नृत्य, रुदन और गायन स्वतः ही स्फुरित होते हैं।
  • अंततः भगवान के अवतार लेने का रहस्य क्या सिद्ध होता है?
    अवतार का रहस्य केवल दुष्टों का संहार करना नहीं, अपितु उन प्रेमियों और भक्तों को अपना सामीप्य प्रदान करना है जो उनके रूप और गुणों के प्यासे हैं। भगवान अपने आनंद को अपने भक्तों के साथ बांटने के लिए ही पृथ्वी पर अवतरित होते हैं।
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