
भंडासुर एक बार फिर अप्रत्याशित हार होने पर दुखी और निराश हो गया। उसने अपने भाई विसंग और विशुक्र सहित सभी प्रमुखों की बैठक बुलाई और सोचने लगा कि भाग्य में उनके लिए क्या लिखा है। क्या देवदा फिर से उन पर हावी होने वाले हैं? अंत में उसने यह कहा कि चाहे भाग्य में जो भी हो, प्रयास में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।
जासूसों ने जानकारी दी कि दुश्मनों की अधिनायिका महिला दूर पश्चिम दिशा में दुश्मन की सरहद में ठहरी हुई थी। उसकी सुरक्षा के लिए बहुत कम बल तैनात था। उसके पश्चिम दिशा का छोर पूरी तरह से खुला था और वहां से बहुत आसानी से उसे आघात किया जा सकता था। शक्ति सेना केवल पूर्व और दक्षिण दिशा में केंद्रित थी। पीछे से हमला करके उसे पकड़ना संभव होना चाहिए।
विसंग अपनी अदृश्य होने की शक्ति के कारण इस कार्य के लिए समर्थ होगा। उसने अपने साथ 15 अन्य प्रमुखों को ले जाने की योजना बनाई जो शत्रु के आसपास के दूसरों को निपटा देंगे। इस योजना के साथ विसंग, 15 प्रमुख और 15 अक्षौहिणी सेना के साथ शून्यक के पश्चिमी द्वार से बाहर निकला और शक्ति सेना के उत्तर से होते हुए पीछे की तरफ गया जहाँ मां श्री ललिताम्बिका थीं। वहां पहुंचकर उन्होंने माता के रथ को मेरु पर्वत के समान विशाल और देवी को हजारों सूर्यों के समान तेजस्विनी देखा।
इस समय रात थी और अदृश्य असुर सेना ने अचानक हमले से श्रीदेवी के बहुत से रक्षकों को मार दिया। चक्रराज रथ की सबसे बाहरी आवरण की शक्तियां घायल हो गईं। हालांकि आंतरिक आवरण की योगिनियों ने सभी दिशाओं में विभिन्न हथियार मारने शुरू कर दिए। इसी बीच भंडासुर ने 10 अक्षौहिणी सेना के साथ कुटिलाक्ष को भेजा ताकि वे माता और उनकी सेना के बीच आ सकें। श्री ललिताम्बिका को सेना से अलग करने की योजना थी यह। यदि शक्ति सेना देवी की मदद करने जाने की कोशिश करती है तो वह ऐसे नहीं कर पाएगी।
15 नित्या देवियां भगवती श्री ललिता के पास गईं और उन्हें दैत्यों की अनैतिकता के बारे में बताया। रात का समय था। दैत्यों ने खुद को माया के द्वारा अदृश्य बना लिया था और यह जानते हुए कि देवी की पूरी सेना आगे है, फिर भी देवी पर पीछे से हमला करना शुरू कर दिया। जबकि देवी वास्तव में किसी प्रकार की सक्रिय लड़ाई में शामिल नहीं थीं। ये सभी युद्ध के नियमों का घोर उल्लंघन था। ये नित्या देवियां क्रोध से भरी हुई थीं और वे श्री ललिताम्बिका से इन दैत्यों को खत्म करने की अनुमति मांगने आईं थीं। देवी ने कहा आगे बढ़ो।
नित्या देवियों ने उन पर हमला कर दिया और सभी 15 प्रधानों को प्रत्येक नित्या देवी ने मौत के घाट उतार दिया। श्री ललिता परमेश्वरी ने पूरे ध्यान से युद्ध में नित्या देवियों की वीरता को देखा। नित्यापराक्रमाटोप निरीक्षणसमुत्सुका, माता का एक और नाम सहस्रनाम से। उसके सभी प्रमुखों की हत्या के बाद भी विसंग ने लड़ाई जारी रखने की कोशिश की परंतु जल्द ही उसे अपनी बेहद कमजोर स्थिति का अंदाजा हो गया। कामेश्वरी नित्या देवी ने अपने बाणों से उसकी सेना को छेद दिया और जो कोई भी बचा था उसके साथ विसंग को भागना पड़ा। भागते हुए असुरों को शक्ति सेना ने छोड़ दिया।
कुटिलाक्ष जो देवी मां और उनकी सेना के बीच आ गया था, उसकी भी 10 अक्षौहिणी सेना भी मारी गई और वह भी वहां से भाग गया। सुबह चक्रराज रथ पर हमले की खबर मिलने पर घबराई हुई मंत्रिणी और दंडनाथा देवियां अपने रथ पर सवार होकर श्री ललिताम्बिका के पास आईं और अपने रथों को चक्रराज रथ के साथ खड़ा किया। उन्होंने श्री देवी मां से युद्ध के नियमों के प्रति कोई सम्मान नहीं रखने वाले असुरों के कुकृत्य के बारे में अपनी चिंता व्यक्त की।
उन्होंने रात में सुरक्षा और असुरों के अवैध हमलों से बचने के लिए पूरी शक्ति सेना के चारों तरफ एक आग से बना सुरक्षा कवच ‘वन्निप्राकार’, उसका निर्माण करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने सुझाया कि वन्निप्राकार में केवल दक्षिण में एक प्रवेश द्वार होना चाहिए और इसे पूर्ण तरह से संरक्षित किया जाना चाहिए। शून्यक शक्ति सेना के दक्षिण में था। नित्या देवी ज्वालामालिनी को सुरक्षा कवच के निर्माण का कार्य सौंपा गया। चक्रराज रथ को केंद्र में लाया गया और इसके दोनों ओर मंत्रिणी देवी और दंडनाथा देवी ने अपने रथ खड़े किए। सम्पत्करी देवी ने खुद को चक्रराज रथ के पीछे खड़ा किया और अश्वारूढ़ा देवी ने खुद को सामने की ओर खड़ा किया। श्रीदेवी ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवन्निप्राकारमध्यगा इस नाम से जानी जाने लगीं।
दंडनाथा ने वन्निप्राकार के प्रवेश द्वार की रक्षा के लिए स्तम्भिनी देवी को तैनात किया। भंडासुर ने अपने भाइयों और 30 पुत्रों के साथ परामर्श किया और अपने पुत्रों को 200 अक्षौहिणी सेना के साथ युद्ध के मैदान में भेजने का फैसला किया। वे सभी युद्ध में माहिर थे और बहुत शक्तिशाली थे। भंडासुर की देवताओं पर जीत का श्रेय उनको जाता था। शक्ति सेना के विनाश का और श्री देवी को उसके घुटनों पर लाने का एक दूसरे को वचन देने के बाद वे वन्निप्राकार की ओर चल दिए। उनकी कर्णभेदी चीखों ने शक्ति सेना के बीच हलचल और आतंक ला दिया।
बाला देवी श्री ललिताम्बिका की बेटी हैं। वे ज्ञान की देवी हैं, 9 साल की। बहुत शूरवीर और हमेशा अपनी मां की बातों का पालन करने वाली हैं। वे वन्निप्राकार की तरफ बढ़ते हुए दुश्मनों से लड़ना चाहती थीं। श्री ललिताम्बिका ने उन्हें यह कहकर मना करने की कोशिश की कि वे युद्ध के लिए बहुत छोटी थीं। बालाम्बिका ने भी हार नहीं मानी। अंत में मां श्री ललिता ने उन्हें भंडासुर के शक्तिशाली पुत्रों से लड़ने के लिए रणभूमि में जाने की अनुमति दे दी और जाने से पहले उन्हें एक दिव्य कवच, हथियार और जीत का आशीर्वाद दिया। बाद में वे अपनी बेटी का साहस देखकर बहुत खुश हुईं। देवी को भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता कहते हैं सहस्रनाम में।
100 हंस उनका रथ खींच रहे थे। रास्ते में मंत्रिणी और दंडनाथा ने भी उन्हें वापस जाने के लिए समझाने का प्रयास किया लेकिन बालाम्बिका ने उन्हें भी मना लिया। वे दोनों भी बालाम्बिका के दोनों तरफ तैनात होकर वन्निप्राकार के दक्षिण द्वार की ओर रवाना हुए। बालाम्बिका ने बिजली की तरह अपने रथ को ठीक भंडासुर के 30 बेटों के मध्य में खड़ा किया और उन पर तीरों की बरसात कर दी। दंडनाथा और श्यामला वहीं रुक गईं और सिर्फ अचंभे से देखती रहीं। इस छोटी बच्ची को किसी की मदद की आवश्यकता नहीं है।
दूसरे दिन बालाम्बिका ने नारायणास्त्र का प्रयोग किया और पूरी 200 अक्षौहिणी सेना को तबाह कर दिया। फिर अपनी मां से प्रार्थना करने के बाद 30 तीरों से एक ही बार में भंडासुर के तीसों पुत्रों का सर काट दिया। इस प्रभावशाली जीत के बाद अपनी मां के पास वापस लौटने पर श्यामला और दंडनाथा ने उनके साहसी कृत्य माता श्री ललिताम्बिका को सुनाए। देवी ने उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया और बहुत प्रेम के साथ उनके माथे को चूमा।
अपने सभी 30 पुत्रों के मरने पर भंडासुर दुख से बेकाबू हो गया। एक 9 साल की लड़की ने उसके उन सभी पुत्रों की हत्या कर दी जिससे देवता भी डरते थे। यह अविश्वसनीय था। वो शोकग्रस्त होकर बेहोश हो गया और अपने सिंहासन से गिर गया। विशुक्र, विसंग और कुटिलाक्ष ने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि उसके पुत्रों की वीरगति प्राप्त हुई है जो कि सिर्फ कुछ ही बहादुर योद्धाओं को प्राप्त होती है। इसलिए उसे अपने पुत्रों की मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए।
भंडासुर गुस्से से तिलमिला रहा था। वो स्वयं युद्ध के मैदान में जाने के लिए तैयार हो गया ताकि उस स्त्री के टुकड़े-टुकड़े कर सके। परंतु उसके सेनापतियों ने उसे यह कहकर रोक दिया कि जब तक वे सब जिंदा हैं तब तक भंडासुर को युद्ध क्षेत्र में जाने की आवश्यकता नहीं है। भंडासुर ने विशुक्र को और दुश्मन के बीच स्थापना करने का आदेश दिया। विशुक्र शक्ति सेना के पास गया लेकिन वन्निप्राकार ने उसे रोक दिया। स्तम्भिनी द्वारा संरक्षित वन्निप्राकार के प्रवेश द्वार भी अभेद्य था। उसने एक पत्थर पर विघ्नयंत्र लिखकर उचित मंत्रों से उसे जागृत किया और उस पर नकारात्मक शक्तियों को जगाने के लिए बकरियों की बलि दी। फिर उसने सुरक्षा चक्र वन्निप्राकार के ऊपर से दुश्मन शिविर के अंदर फेंक दिया।
तत्काल शक्ति सेना में अशांति, हाहाकार और भगदड़ मच गई। शक्ति सेना ने अपने हथियार डाल दिए और कहने लगी कि हम क्यों बिना मतलब के असुरों को मारें और पाप में भागीदार बनें? देवताओं की मदद करके हमें क्या लाभ मिलेगा? यह ललिता है कौन? मंत्रिणी है कौन? दंडनाथा है कौन? हम इनकी सेवा क्यों करें? हमें यह सब व्यर्थ की परेशानी नहीं लेनी चाहिए। चलो आराम करते हैं। नींद से अच्छा कुछ भी नहीं है। मंत्रिणी और दंडनाथा को एहसास हुआ कि शक्ति सेना ने उनका आदेश पालन करना छोड़ दिया है।
उन्होंने यह बात श्री देवी मां को बताई। उन्होंने कहा हे देवी, पता नहीं क्यों हमारी सेना ने अचानक अहिंसा के सिद्धांत को अपना लिया है। उन्होंने आपकी पूजा करना बंद कर दिया है और वे हमारे प्रति अपमानजनक हो गई हैं। अपने हथियार रखकर वे आलसी हो गई हैं और नींद करने में मस्त हैं। इसी समय दुश्मन हमारे शिविर के बाहर नगाड़े बजाकर हमें चुनौती दे रहे हैं। श्री ललिताम्बिका असुरों द्वारा की गई हरकत को समझ गईं। उन्होंने कामेश्वर की ओर देखा जो सिर्फ मुस्कुरा दिए। माता जगदंबा भी मुस्कुराईं और भगवान गणेश का जन्म हुआ। कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा, सहस्रनाम का एक और नाम।
अपनी मां से आशीर्वाद लेकर वे विघ्नयंत्र को नष्ट करने के लिए निकल पड़े। उन्होंने यंत्र को तथा उसकी बुरी ताकतों को अपने मजबूत दांतों से चूर-चूर कर दिया और इसका चूरा हवा में उड़ा दिया। श्री देवी माता खुश हो गईं और महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता के नाम से जानी जाने लगीं।
शक्ति सेना जादू के असर से बाहर आ गई और फिर से सक्रिय हो गई। महागणेश ने 7 करोड़ हाथी के सर वाले योद्धाओं को प्रकट किया जो सातों महासागरों को पीने की क्षमता रखते थे और आमोद, प्रमोद, सुमुख, दुर्मुख, विघ्न और विघ्नहर्ता को उनका सेनापति नियुक्त किया। श्री गणेश की सेना विशुक्र की 30 अक्षौहिणी सेना पर टूट पड़ी और उनका संहार कर दिया। गजासुर और उसकी 7 अक्षौहिणी सेना भी नष्ट हो गई। विशुक्र भी शून्यक वापस भाग गया। विजयी भगवान गणेश भी अपने शिविर लौट आए। श्री ललिताम्बिका ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे सभी देवताओं में सबसे पहले पूजे जाएंगे।
भंडासुर ने अपनी सेना का पुनर्गठन किया। विशुक्र और विसंग 400 अक्षौहिणी सेना लेकर फिर से लड़ने गए। भंडासुर की बहन धुमिनी के 10 पुत्र जिन्हें स्वयं भंडासुर ने प्रशिक्षित किया था वे भी उनके साथ गए। इस संगठन को देखते हुए देवता उलझन में पड़ गए। दोनों पक्ष के बीच भयानक लड़ाई हुई। दंडनाथा ने विसंग से और श्यामला ने विशुक्र से लड़ना शुरू किया। भंडासुर के भतीजों में उलुकजित से अश्वारूढ़ा देवी लड़ीं। पुरुषेण से सम्पत्करी देवी लड़ीं। विषेण से नकुली देवी लड़ीं। कुन्तिषेण से महामाया देवी लड़ीं। मलत से उन्मत्त भैरवी लड़ीं। करुश से लघुश्यामा देवी लड़ीं। मंगल से स्वप्नेशी देवी लड़ीं। दृघण से वाग्वादिनी देवी लड़ीं और कोल्लाट से चण्डकाली देवी लड़ीं।
शक्ति सेना का भारी पक्ष देखकर विशुक्र ने इस लड़ाई के तीसरे दिन तृषास्त्र चलाया। इसके परिणामस्वरूप शक्ति सेना गंभीर प्यास के मारे पूरी तरह से थक गई। कमजोरी और थकान की वजह से वे बड़ी संख्या में जमीन पर गिरने लगी। शक्ति सेना का लड़ना बंद हो गया और वे भारी संख्या में मारी जाने लगी। मंत्रिणी देवी ने दंडनाथा को किरिचक्र रथ पर सवार मदिरा सिंधु को बुलाने के लिए कहा। मदिरा सिंधु मदिरा का देव है। उन्होंने मदिरा की वर्षा की और शक्ति सेना के पास स्वादिष्ट मदिरा की करोड़ों नहरें बहने लगीं। शक्तियों ने इसे ग्रहण किया और वे फिर से तरोताजा हो गईं। वे शक्तियां फिर से युद्ध के लिए तैयार हो गईं।
दंडनाथा ने मदिरा सिंधु को आशीर्वाद दिया कि उन्हें सोमरस के समान यज्ञों में जगह मिलेगी और देवता उचित शुद्धि संस्कारों के बाद सुरा यानी मदिरा का ग्रहण करेंगे। मदिरा की निर्धारित मात्रा ग्रहण करने पर सिद्धियां प्राप्त होंगी। महेश्वर, बलराम, भार्गव और दत्तात्रेय जैसे महान भी उसे भरपूर मात्रा में पिएंगे। इसके बाद मदिरा सिंधु अपनी जगह पर वापस लौट आया। भयंकर लड़ाई चलती रही और अंत में विशुक्र, विसंग और भंडासुर के सभी भतीजे सेना समेत मारे गए। विशुक्र को वाराही ने मार दिया। श्रीदेवी मां बहुत प्रसन्न हुईं और वे विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता नाम से जानी जाने लगीं।
विसंग मंत्रिणी द्वारा मारा गया। श्रीदेवी मां मन्त्रिण्यम्बाविरचितविसंगवधतोषिता के रूप में जानी जाने लगीं। अगस्त्य महर्षि यह जानने के लिए उत्सुक हो गए कि अपने भाइयों और भतीजों की मृत्यु की खबर सुनकर भंडासुर की क्या प्रतिक्रिया थी और श्रीदेवी मां ने उसे कैसे पराजित किया। ऋषि हयग्रीव ने बताना जारी रखा। भंडासुर ने जब अपने भाइयों और भतीजों की मृत्यु के बारे में सुना तो वो बेहोश हो गया। कुटिलाक्ष के सांत्वना देने के बावजूद भी उसका रोना नहीं रुका।
अपने दुख पर नियंत्रण पाने के बाद लाल आंखों और कुटिल भों के साथ वो चिल्लाया, मैं अपने कुल के विनाश का बदला उस स्त्री के खून से लूंगा और सिर्फ उसका खून ही मेरे दुखों की आग को बुझा सकता है। उसने कुटिलाक्ष को युद्ध के लिए सेना तैयार करने का आदेश दिया। घातक हथियार और कवच पहनते हुए भंडासुर अपने 24 सेनापतियों के साथ युद्ध के मैदान की ओर बढ़ने लगा। कुटिलाक्ष 35 सेनापतियों और उनकी सेना के साथ था। पूरी सेना में 2185 अक्षौहिणी सैनिक शामिल थे। शून्यक में केवल महिलाएं ही बची थीं।
भंडासुर आभीलम नामक एक रथ पर सवार था। इसे शेर खींच रहे थे। यातना नामक तलवार उसके हाथों में लहरा रही थी। उसकी सेना इतनी घनी थी कि कुछ सिपाहियों को चलने के लिए जगह ही नहीं मिल पा रही थी। वे एक दूसरे के ऊपर चढ़ के जा रहे थे। भंडासुर की जोरदार दहाड़ से पृथ्वी हिल गई। महासागर सूख गए। सूर्य और चंद्र दूर भागने लगे। नक्षत्र डूब गए और शक्ति सेना भय से कांपने लगी। वन्निप्राकार भी एक पल के लिए बुझ गया परंतु फिर वापस आ गया।
श्री ललिताम्बिका स्वयं भंडासुर से लड़ने के लिए तैयार हो गईं। वे चक्रराज रथ पर सवार थीं। उनके पीछे मंत्रिणी देवी अपने गेय चक्र रथ पर और दंडनाथा अपने किरिचक्र रथ पर सवार थीं। शक्ति सेना विभिन्न जानवर हाथी, शेर, ऊंट, गिद्ध और घोड़ों पर सवार थी। श्रीदेवी मां और उनकी सेना को बाहर निकालने के लिए ज्वालामालिनी देवी ने वन्निप्राकार के प्रवेश द्वार को चौड़ा कर दिया। देवताओं के डमरुओं का बजना और आकाश से फूलों को बरसना देवी की जीत के शुभ लक्षण थे। असुर पक्ष में अपशकुन दिखने लगे। शक्तियां असुरों का सर्वनाश करने लगीं।
चारों तरफ रक्त ही रक्त था। श्रीदेवी द्वारा असुरों की ओर छोड़ा गया एक तीर धनुष से छूटते ही 10 तीरों में बदल गया। आकाश में उड़ते हुए वो 100 तीरों में परिवर्तित हो गया। असुरों तक पहुंचने से पहले यह 1000 तीरों में बदल गया और फिर 1 करोड़ तीर बनके इसने असुरों के अंगों को छेद दिया। चौथे दिन श्रीदेवी मां और भंडासुर के बीच आमने-सामने की लड़ाई शुरू हो गई। उन्होंने एक दूसरे पर अस्त्र छोड़ना शुरू किया।
भंडासुर ने एक अंधतामिस्रक नामक अस्त्र छोड़ा जिसे श्रीदेवी मां ने अपने महातरण्यास्त्र से नष्ट कर दिया। श्री ललिताम्बिका ने अपने गायत्र्यस्त्र से भंडासुर का पाषण्डास्त्र नामक अस्त्र नष्ट कर दिया। भंडासुर ने शक्ति सेना की आंखें नष्ट करने के लिए अंधास्त्र छोड़ा। श्रीदेवी ने इसे अपने चाक्षुष्मती अस्त्र से नष्ट कर दिया। देवी मां ने अपने विश्वावसु अस्त्र से भंडासुर के शक्तिनाशक अस्त्र, महामृत्युंजय अस्त्र से अन्तकास्त्र, धारणास्त्र से सर्वस्मृतिनाशनास्त्र और अभयंकर ऐन्द्रास्त्र से भयास्त्र को नष्ट कर दिया।
भंडासुर ने महारोगास्त्र चलाया। इससे क्षयरोग जैसी हजारों घातक बीमारियां बाहर आईं और शक्ति सेना के बीच फैल गईं। श्रीदेवी ने नामत्रयास्त्र से इसे नष्ट कर दिया। नामत्रयास्त्र श्रीहरि के तीन पवित्र नाम हैं। अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः। ये नाम इतने शक्तिशाली हैं कि वे खुद ही एक अस्त्र हैं। अगर आप हर दिन 108 बार इन नामों को लिखेंगे तो आपकी सेहत में काफी सुधार महसूस करेंगे। ये स्वयं श्री ललिताम्बिका द्वारा प्रयोग किया गया अस्त्र है।
भंडासुर के आयुर्नाशनास्त्र को श्रीदेवी मां ने कालसंकर्षणी अस्त्र से नष्ट कर दिया। भंडासुर ने महासुरास्त्र चलाया। मधु, कैटभ, महिषासुर, चण्ड और मुण्ड जैसे भयानक और शक्तिशाली असुर इससे बाहर निकले और शक्ति सेना पर कहर बरसाने लगे। बहुत बड़ी मात्रा में क्षति हुई शक्ति सेना की। डरी और घबराई हुई शक्ति सेना देवी श्री ललिताम्बिका के पैरों पर गिरकर शरण मांगने लगी। श्रीदेवी ने भों को वक्र किया और एक जोरदार हुंकार लगाई। इससे दुर्गा देवी प्रकट हुईं जिन्हें सभी देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियां और अपने हथियार दिए। उन्होंने उन सभी शक्तिशाली असुरों को नष्ट कर दिया जो महासुरास्त्र से निकले थे।
भंडासुर ने मुखास्त्र से शक्तियों को मूक बनाने की कोशिश की परंतु श्रीदेवी मां ने उसे अपने महावाग्वादिनी अस्त्र से नष्ट कर दिया। दुर्मद ने सोमक जैसे असुर बनाए जिन्होंने वेदों को चुरा लिया। माता के दाएं अंगूठे के नाखून से भगवान विष्णु अपने मत्स्यावतार लेकर निकले और उसे नष्ट कर दिया। भंडासुर ने अर्णवास्त्र का उपयोग करके जलप्रलय का निर्माण किया जिसने शक्ति सेना को जलमग्न कर दिया। श्रीदेवी की तर्जनी उंगली के नाखून से भगवान विष्णु के कूर्मावतार निकले और उन्होंने शक्तियों को बाहर निकाला प्रलय जल से।
भंडासुर ने हिरण्याक्षमहास्त्र चलाया। उससे करोड़ों हिरण्याक्ष निकले और शक्तियों का वध करने लगे। माता श्री ललिता के मध्यमा उंगली के नाखून से भगवान विष्णु के वराहावतार निकले जिन्होंने सभी हिरण्याक्षों को नष्ट कर दिया। गुस्से आए भंडासुर की भों से हजारों हिरण्यकश्यप निकले जो शक्तियों को मारने लगे। जैसे प्रह्लाद को बचाया था वैसे ही भगवान विष्णु के नरसिंहावतार श्रीदेवी के दाहिनी अनामिका उंगली के नाखून से बाहर निकले और सभी हिरण्यकश्यपों को नष्ट कर दिया।
भंडासुर ने श्रीदेवी मां पर बलीन्द्रास्त्र चलाया। उनकी दाहिनी छोटी उंगली के नाखून से सैकड़ों वामन निकले और उन्होंने उसके इस अस्त्र को नष्ट कर दिया। भंडासुर द्वारा चलाए गए हैहयास्त्र से करोड़ों कार्तवीर्यार्जुन निकले। श्रीदेवी के बाएं अंगूठे के नाखून से परशुराम बाहर आए और उन्होंने उन सभी को नष्ट कर दिया। गुस्से आए भंडासुर ने एक हुंकार लगाई और उससे रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद उत्पन्न हुए। श्री ललिताम्बिका की बाईं तर्जनी उंगली के नाखून से श्रीराम और लक्ष्मण निकले और उन्हें नष्ट कर दिया।
भंडासुर के सेनापति महाभीम द्वारा चलाए गए द्विवदास्त्र से कई विशाल क्रूर बंदर निकले जो शक्ति सेना पर हमला करने लगे। श्रीदेवी के बाईं मध्यमा उंगली के नाखून से बलराम निकले जिन्होंने उन सबको नष्ट कर दिया। भंडासुर ने राजासुरास्त्र चलाया जिसमें से कई असुर राजा जैसे कंस, चाणूर, केशी, शंभर, प्रलंब निकले। श्री ललिताम्बिका की बाईं अनामिका उंगली से वासुदेव निकलकर उन सभी को नष्ट कर दिया।
भंडासुर ने कल्यास्त्र चलाया जिससे कई प्रकार के क्रूर प्राणी निकले जो धर्म को नष्ट करना चाहते थे। उन्होंने शक्ति सेना पर हमला शुरू कर दिया। श्रीदेवी मां के बाएं हाथ की छोटी उंगली के नाखून से कल्कि निकले और उन सबको नष्ट कर दिया। दसों विजयी अवतार श्री ललिताम्बिका के सामने नतमस्तक हुए। देवी मां ने उन्हें हर कल्प में धर्म के रक्षक बनने के लिए कहा। वे सभी वैकुंठ लौट गए। देवी मां करांगुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृति इस नाम से जानी जाने लगीं।
भंडासुर ने तब महामोहास्त्र चलाया और शक्तियां बेहोश होने लगीं। श्रीदेवी ने इसे शाम्भवास्त्र से नष्ट कर दिया। दिन समाप्त हो रहा था और श्रीदेवी मां अब इस युद्ध को आगे नहीं खींचना चाहती थीं। नारायणास्त्र का प्रयोग करते हुए श्री ललिताम्बिका ने भंडासुर की पूरी सेना को नष्ट कर दिया और पाशुपतास्त्र का प्रयोग करके उसके सभी सेनापतियों को मार दिया। महापाशुपतास्त्राग्नि निर्दग्धासुरसैनिका। वे सभी महापाशुपतास्त्र से निकलने वाली अग्नि से जलकर मर गए।
अंत में श्री ललिताम्बिका ने महाकामेश्वरास्त्र से भंडासुर को भी मार दिया। उन्होंने शून्यक को जलाकर नष्ट कर दिया और वहां केवल बंजर भूमि शेष रह गई। वे कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका के नाम से प्रसिद्ध हो गईं। वहां हर जगह खुशी की लहर थी। देवताओं ने फूल बरसाए। वाद्यों ने जीत की धुन बजाई। गंधर्व गीत गाने लगे और अप्सराएं नाचने लगीं। श्री ललिताम्बिका की स्तुति हर जगह सुनाई देने लगी।
सप्तर्षियों ने अग्नि में आहुतियां दीं और मंत्रों से आशीर्वाद दिया। इस प्रकार विजयी होकर श्री ललिता परमेश्वरी पूरी शक्ति सेना के साथ अपने शिविर में वापस लौट आईं। यह है सर्वशक्ति स्वरूपा श्री जगदम्बा ललिता त्रिपुर सुंदरी की अद्भुत कहानी। सभी लोग श्री माता की पूजा उपासना करके उनकी महान कृपा का पात्र बनें और जैसा बताया गया इस जन्म में समस्त भोग और ऐश्वर्य और बाद में मोक्ष भी पाएं।
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