
तुलसीदास जी के रामचरितमानस के बालकाण्ड का बारहवां मंगलाचरण।
उधरहि विमल बिलोचन ही के मिटहि दोष दुख भारजनी के
श्री गुरु के पदनख के प्रकाश से हृदय में विद्यमान दिव्य नेत्र खुल जाता है और संसार नामक रात्रि का सारा दोष और दुख मिट जाता है। यह भवसंसार रजनि के समान है, रात्रि के समान है। रात्रि में मनुष्य अपने वश में नहीं रह पाता। वह सो जाता है, नींद के वश में हो जाता है। अपने शरीर और मन पर उसका काबू नहीं रहता।
यह संपूर्ण जीवन भी वैसा ही है। मनुष्य अपने वश में नहीं रहता, माया के वश में रहता है। किंतु जब प्रतिदिन मनुष्य सुबह उठता है, तब वह अपने वश में आ जाता है। उसी प्रकार गुरु के पदनख के प्रकाश से हृदय का नेत्र खुलने के बाद मनुष्य माया के वश को छोड़कर अपने वश में आ जाता है और भक्ति के मार्ग में चलने लगता है।
रात्रि के अंधकार को सूर्य का प्रकाश ही संपूर्णतः मिटा पाता है। उसी प्रकार गुरु के पदनख की ज्योति को सूर्य का प्रकाश कहा गया है —
दलन मोह तम सोसु प्रकाशु —
जो सूर्य के समान होकर भवरजनी के अंधकार को मिटाता है।
इस मंगलाचरण का पहला पद है उधरहि।
'उ' धातु का अर्थ है अंगीकार या धारण करने वाला।
'उधर' — अंगीकार को धारण करने वाला है। यह गुरु के पद के नख का प्रकाश शिष्य के मस्तक को अंगीकार करके उसे सफल बनाने वाला है। यह गुरु के पदनख का प्रकाश है, और इस गुरु के पदनख के प्रकाश को मेरा नमस्कार।
'उ' का एक अर्थ शिव जी भी है — अतिविश्वमजत्वात् सर्वं व्याप्नोति इति उः —
जो सर्वत्र व्यापत हैं, वे शिव हैं।
यह श्री गुरु के पदनख का प्रकाश भी सर्वत्र व्यापत है।
जैसे रात्रि के अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य रूप तेज पिंड की आवश्यकता होती है, वैसे ही भवरजनी के अज्ञानरूपी अंधकार को मिटाने वाला गुरु पद के नख का प्रकाश है।
ऐसे गुरु पद के नख के प्रकाश को मेरा नमस्कार।
भवरजनी का विशेष है अंधकार।
जैसे रात्रि के अंधकार में चोर आते हैं, वैसे ही हमारे जीवन में काम, राग, मत्सर आदि चोर आते हैं। यदि उस अंधकार को मिटा दिया जाए तो ये चोर नहीं आ पाएंगे। रात्रि के अंधकार को मिटाने पर चुराने वाले चोर नहीं आते। उसी प्रकार जीवन में विद्यमान अंधकार को मिटा दिया जाए तो काम आदि चोर नहीं आएंगे।
इन चोरों को मिटाने वाले मेरे गुरु के पदनख के प्रकाश को मेरा नमस्कार।
गुरु के प्रकाश से ज्ञान नेत्र खुलना क्या दर्शाता है?
यह बताता है कि जब गुरु की कृपा मिलती है तो मनुष्य के भीतर का अज्ञान दूर हो जाता है। जैसे आँखों के खुलने पर अंधकार नहीं रहता, वैसे ही हृदय में विवेक का प्रकाश फैलता है। यह ज्ञान केवल पुस्तकीय नहीं, अनुभवजन्य होता है जो जीवन की दिशा बदल देता है।
गुरु का प्रकाश मनुष्य को अपने वश में कैसे लाता है?
जब तक अज्ञान है, मनुष्य माया के वश में रहता है। गुरु का प्रकाश भीतर का नियंत्रण लौटाता है। वह मन को स्थिर करता है, विवेक देता है और व्यक्ति को स्वयं की शक्ति का अनुभव कराता है। इससे वह परिस्थितियों का दास न रहकर स्वामी बनता है।
क्या मनुष्य बिना गुरु के स्वयं यह ज्ञान पा सकता है?
केवल स्वाध्याय से कुछ समझ मिल सकती है, पर अंतःकरण की अंधकार पर विजय गुरु के बिना नहीं होती। गुरु ही वह सूर्य है जो अंदर के तमस को जलाता है। आत्मबल और शास्त्रबुद्धि तब ही फलती है जब उसकी दिशा कोई प्रदर्शित करे।
संसार को रात्रि के समान क्यों कहा गया है?
क्योंकि इसमें चेतना सोई रहती है और मनुष्य अज्ञान के स्वप्न में बंधा होता है। जैसे रात में चोर सक्रिय रहते हैं, वैसे ही माया और वासनाएं इस अज्ञान में कार्य करती हैं। भक्ति और ज्ञान का उदय इस रात्रि के अंत की घोषणा है।
गुरु का प्रकाश इस अंधकार को कैसे मिटाता है?
वह सूर्य की तरह है जो केवल चमकता ही नहीं, दिशा भी देता है। यह प्रकाश अंतर्मन की जड़ता को तोड़ता है, विचारों को स्पष्ट करता है और श्रद्धा को सुदृढ़ बनाता है। उसके आगे भ्रम और भय टिक नहीं पाते।
अगर मनुष्य पहले से ही बुद्धिमान है तो उसे गुरु की क्या आवश्यकता?
बुद्धि केवल तथ्य दिखाती है, सत्य नहीं। गुरु वह दर्पण है जो बुद्धि को पारदर्शी बनाता है ताकि सत्य प्रतिबिंबित हो सके। बिना गुरु के बुद्धि अपनी ही उलझनों में फँस जाती है, और विवेक भी मोह का रूप ले लेता है।
‘उधरहि’ शब्द का गूढ़ अर्थ क्या है?
यह गुरु के उस तेज का द्योतक है जो शिष्य के मन को स्वीकार कर उसे जीवन में सफल बनाता है। यह केवल प्रकाश नहीं, अनुग्रह है — जो शिष्य की अंधेरी चेतना को आलोकित करता है। यह धारण और अंगीकार की शक्ति है।
गुरु का तेज सर्वव्यापी कैसे है?
क्योंकि गुरु का ज्ञान सीमित व्यक्ति तक नहीं रहता, वह तत्वस्वरूप है। जैसे सूर्य का प्रकाश सभी को समान रूप से आलोकित करता है, वैसे ही गुरु का तेज भी सभी के भीतर कार्य करता है। यह प्रकाश धर्म, जाति या समय से परे है।
क्या यह ‘तेज’ किसी देवता से भिन्न है?
नहीं, यह वही दिव्य तेज है जो हर रूप में सत्य की ओर ले जाता है। देवत्व कोई रूप नहीं, चेतना का स्तर है। गुरु उस चेतना का जीवंत माध्यम बनकर जगत को दिशा देता है।
जीवन में अंधकार और विकारों का संबंध क्या है?
अज्ञान का अंधकार रहने पर मन कमजोर होता है और काम, राग, मत्सर जैसे विकार भीतर प्रवेश करते हैं। यह चोरों की तरह मनुष्य की शांति और विवेक को लूट लेते हैं। जब प्रकाश आता है, ये चोर स्वतः भाग जाते हैं।
गुरु का प्रकाश इन विकारों को कैसे हटाता है?
वह हृदय में सत्य का तेज भर देता है जिससे झूठे सुखों की शक्ति समाप्त हो जाती है। जैसे उजाले में चोर छिप नहीं सकते, वैसे ही इस ज्ञानप्रकाश में वासनाएं नष्ट हो जाती हैं। मन निर्मल होकर भगवद्भाव की ओर मुड़ता है।
क्या यह परिवर्तन स्थायी रहता है?
यदि साधक श्रद्धा और अभ्यास से उस प्रकाश को निरंतर बनाए रखे तो हाँ, यह स्थायी होता है। जब प्रकाश को उपेक्षित किया जाता है, तब अंधकार लौट आता है। स्थिरता अनुशासन और सत्संग से बनी रहती है।
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