शिवलिंग के बारे में कुछ विशेष जानकारी

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शिवलिंग के बारे में कुछ विशेष जानकारी

शिवलिंग की महिमा के बारे में हमने देखा। भगवान भोलेनाथ महादेव कैसे एक अग्नि स्तंभ के रूप में अरुणाचल में प्रकट हुए। अनादि अनंत अग्नि स्तंभ का रूप लेकर। शिवलिंग इस अग्नि स्तंभ का ही प्रतीक है। अगर आप मोक्ष की इच्छा रखते हैं, मुक्ति की इच्छा रखते हैं तो शिवलिंग की ही पूजा करें। शिवलिंग की पूजा से लौकिक सुख भोग भी मिलेगा, पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शिवलिंग की ही पूजा करनी चाहिए। न तो शिव जी की मूर्ति की। शिव जी की मूर्ति की पूजा केवल लौकिक विषयों के लिए है जैसे स्वास्थ्य, धन संपत्ति, संतान, विवाह इत्यादि। शिव पुराण में बताया है सबसे श्रेष्ठ शिवोपासना है श्रवण, कीर्तन, मनन। उनकी महिमा के बारे में सुनो, दूसरों को सुनाओ, उसका मनन करो। जिनको श्रवण, कीर्तन, मनन का सौभाग्य नहीं मिलता हो, वे शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं जो ठीक उसी तरह श्रेष्ठ और फलदायक है। नैमिषारण्य में ऋषियों ने सूत जी से कहा, हमें शिवलिंग पूजन के बारे में और बताइए। कब और कैसे करें लिंग पूजा? सूत जी ने अब तक उन्हें इतना ही बताया कि शिवलिंग पूजा का प्रारंभ कैसे हुआ था। ब्रह्मा जी और श्री हरि ने ही सबसे पहले शिवलिंग की पूजा की थी। उन्होंने अपनी पूजा में जिन द्रव्यों का प्रयोग किया, आज भी हम पूजा में उन्हीं द्रव्यों को लेते हैं। एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आप शिवलिंग की स्थापना करते हैं, शिवलिंग घर ले आते हैं तो उसकी प्रतिदिन पूजा होनी चाहिए। मंदिर हो या घर, अगर शिवलिंग है तो प्रतिदिन पूजा होनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि जब समय मिले करें, छुट्टी के दिन करें, ऐसा नहीं। अगर आपके पास हर दिन पूजा के लिए समय नहीं है तो मंदिर जाइए, वहां पूजा कीजिए। शिवलिंग को घर मत लाइए। इसी के लिए ही तो मंदिर बने हैं। शास्त्र में बताया गया है कि शिवलिंग की स्थापना पुण्य नदियों के किनारे होनी चाहिए। अर्थात जहां शुद्ध और निर्मल पानी की सुविधा हो। जहां आप रहते हैं, वो पुण्य नदी किनारे नहीं है और आप घर में शिवलिंग पूजन करना चाहते हैं तो कम से कम उसकी पहली बार स्थापना की जो क्रिया है, वो किसी पुण्य क्षेत्र में पुण्य नदी किनारे करें। उसके बाद वो शिवलिंग को घर ले आए। शिवलिंग सारे लक्षणों से युक्त होना चाहिए। किसी भी शिला को उठाकर आप उसकी पूजा नहीं कर सकते। पृथ्वी, जल और अग्नि से संबंधित वस्तुओं से लिंग का निर्माण हो सकता है। जैसे शिला भूमि से प्राप्त या जल से प्राप्त, पार्थिव या आप्य। तैजस अग्नि से प्राप्त अर्थात धातु। पंच धातु जैसे। अगर आप इन नियमों का पालन करेंगे तो शीघ्र ही फल मिलेगा। पूजा के विषय में मनमानी करने से कोई फल नहीं मिलेगा। लिंग की स्थापना शुभ समय देखकर करनी चाहिए। सुख दुख करं कर्मा शुभाशुभ मुहूर्त जम। शुभ समय में प्रारंभ किया हुआ कार्य शुभ फल देगा। अशुभ समय में प्रारंभ किया हुआ कार्य अशुभ फल देगा। दो तरह की स्थापना है, चल और अचल, जंगम और स्थावर। घर का शिवलिंग जिसको आप एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकते हैं। जैसे प्रवास के समय साथ में लेकर गए। घर में भी अभिषेक के समय निकालकर अभिषेक पीठ के ऊपर रख दिया, अभिषेक होने के बाद वापस रख दिया। इसको कहते हैं चल प्रतिष्ठा या जंगम प्रतिष्ठा। दूसरा मंदिर के जैसे स्थिर प्रतिष्ठा, स्थिर स्थापना। स्थावर, अचल। जंगम के लिए, घर के लिए छोटा सा शिवलिंग। आचल के लिए, स्थावर के लिए स्थूल शिवलिंग। यही उत्तम होता है। शिवलिंग के साथ पीठ अवश्य होना चाहिए। ज्यादा करके यह पीठ गोलाकार में मिलता है। पर पीठ चौकोर, त्रिकोण या खटवांग जैसे आजकल जो दीवान मिलता है, बीच में चारपाई जैसा और दोनों तरफ ऊपर उठा हुआ। पीठ का आकार ऐसा भी हो सकता है। स्थावर में, अचल में लिंग और पीठ एक ही पदार्थ का होना चाहिए। लिंग शिला का तो पीठ भी शिला का ही। लिंग धातु का तो पीठ भी धातु का। इसमें एक और विशेष बात है। दोनों अलग-अलग बनाकर बाद में उन दोनों को जोड़ा जाता है। इसमें भी लिंग पहले बनता है और पीठ उसके बाद। जंगम लिंग या चल लिंग जिसकी पूजा घरों में होती है, दोनों लिंग और पीठ दोनों जुड़ा हुआ रहता है। दोनों को एक साथ में एक ही शिला को गढ़ कर बनाया जाता है। धातु का हे तो दोनों एक ही ढलाई सांचे से बनते हैं, एक साथ। पृथक-पृथक बनाकर जोड़ना नहीं चाहिए। इसका एक ही अपवाद है बाणलिंग जो नर्मदा जी से प्राकृतिक रूप में पाया जाता है। बाणलिंग के लिए पीठ बाद में भी अलग से बना सकते हैं। शिवाय नमः।

 

  • मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले साधक के लिए शिव मूर्ति और शिवलिंग की पूजा में क्या अंतर बताया गया है?
    शास्त्रों के अनुसार, शिव जी की मूर्ति की पूजा लौकिक सुखों जैसे स्वास्थ्य, धन, संतान और विवाह की प्राप्ति के लिए की जाती है। इसके विपरीत, यदि कोई साधक जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति और मोक्ष की इच्छा रखता है, तो उसे अनिवार्य रूप से शिवलिंग की ही पूजा करनी चाहिए। शिवलिंग उस अनंत अग्नि स्तंभ का प्रतीक है जिसका न आदि है और न अंत।
  • शिवोपासना के तीन सबसे श्रेष्ठ साधन कौन से हैं और उनके अभाव में क्या विकल्प दिया गया है?
    शिव पुराण के अनुसार शिवोपासना के तीन सबसे उत्तम मार्ग श्रवण, कीर्तन और मनन हैं। अर्थात महादेव की महिमा को सुनना, उसका गान करना और हृदय में निरंतर चिंतन करना। जो लोग इन तीनों को करने में असमर्थ हैं, उनके लिए शिवलिंग का पूजन बताया गया है, जो उतना ही श्रेष्ठ और फलदायक है।
  • घर में शिवलिंग की स्थापना को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सावधानी क्या बताई गई है?
    घर में शिवलिंग स्थापित करने का सबसे कड़ा नियम यह है कि उसकी प्रतिदिन पूजा होनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन समय नहीं निकाल सकता, तो उसे घर में शिवलिंग नहीं रखना चाहिए। ऐसी स्थिति में मंदिर जाकर पूजा करना ही उचित है क्योंकि मंदिर इसी उद्देश्य के लिए बनाए गए हैं।
  • शिवलिंग की स्थापना के स्थान और उसकी प्रथम शुद्धि के विषय में क्या विधान है?
    शिवलिंग की स्थापना पुण्य नदियों के तट पर करना सर्वश्रेष्ठ है जहाँ शुद्ध जल सुलभ हो। यदि कोई व्यक्ति ऐसे स्थान पर नहीं रहता, तो उसे कम से कम शिवलिंग की प्रथम स्थापना की क्रिया किसी पुण्य क्षेत्र या पवित्र नदी के किनारे संपन्न करनी चाहिए और उसके पश्चात ही उसे घर लाना चाहिए।
  • शिवलिंग निर्माण के लिए किन तत्वों का प्रयोग शास्त्रोक्त माना गया है?
    शिवलिंग का निर्माण पृथ्वी, जल और अग्नि (तेज) से संबंधित शुद्ध वस्तुओं से होना चाहिए। इसमें भूमि से प्राप्त शिला (पार्थिव), जल से प्राप्त शिला (आप्य) या अग्नि के प्रतीक स्वरूप धातुओं (तैजस) जैसे पंचधातु का प्रयोग किया जा सकता है। किसी भी साधारण पत्थर को उठाकर पूजा करना वर्जित है।
  • पूजा के फल की प्राप्ति में शुभ मुहूर्त का क्या महत्व है?
    सुख और दुःख हमारे कर्मों और उनके आरंभ के समय पर निर्भर करते हैं। शुभ मुहूर्त में किया गया पूजन शुभ फल देता है, जबकि अशुभ समय या मनमानी रीति से की गई पूजा निष्फल हो सकती है। इसलिए स्थापना और विशेष पूजन सदा शास्त्रोक्त शुभ समय देखकर ही करना चाहिए।
  • चल और अचल (स्थावर और जंगम) प्रतिष्ठा में क्या मूलभूत अंतर है?
    चल या जंगम प्रतिष्ठा वह है जिसमें शिवलिंग छोटा होता है और उसे प्रवास या अभिषेक के समय एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। अचल या स्थावर प्रतिष्ठा मंदिरों में होती है जहाँ शिवलिंग विशाल होता है और उसे एक बार स्थापित करने के बाद हटाया नहीं जाता।
  • लिंग और पीठ के निर्माण और उनके मेल के विषय में क्या सूक्ष्म नियम है?
    स्थावर (मंदिर के) लिंग में लिंग और पीठ एक ही पदार्थ के होने चाहिए और उन्हें अलग-अलग बनाकर बाद में जोड़ा जाता है। इसमें लिंग का निर्माण पहले होता है। इसके विपरीत, घर के (चल) लिंग में लिंग और पीठ एक ही पत्थर या सांचे से निर्मित होने चाहिए, उन्हें अलग से जोड़ना निषेध है।
  • पीठ के विभिन्न आकारों का क्या महत्व है और वे किस प्रकार के हो सकते हैं?
    यद्यपि सामान्यतः पीठ गोलाकार होता है, किंतु यह चौकोर, त्रिकोण या खटवांग (चारपाई के समान उठा हुआ) आकार का भी हो सकता है। शिवलिंग के साथ पीठ का होना अनिवार्य है क्योंकि पीठ के बिना लिंग पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती।
  • बाणलिंग को अन्य लिंगों की तुलना में क्या विशेष छूट प्राप्त है?
    नर्मदा नदी से प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाले बाणलिंग के लिए निर्माण के नियम थोड़े भिन्न हैं। यह एकमात्र ऐसा लिंग है जिसमें पीठ को बाद में अलग पदार्थ से बनाकर भी जोड़ा जा सकता है, जो अन्य निर्मित लिंगों में वर्जित है।
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