शिव जी के अभिषेक का रहस्य

एक प्रजापति थे जिनका नाम था और्व।

बडे तपस्वी थे और्व।

हिमालय में उनका आश्रम था।

तपस्या या तप का ताप से संबंध है।

ताप मतलब गर्मी।

जब भी कोई तपस्या करता है तो उसके कारण उसके अंदर बहुत गर्मी पैदा होती है।

इसलिए महात्मा लोगों के चेहरे पर चमक दिखाई देता है।

वह गर्मी चारों ओर फैलने लगती है।

और्व की घोर तपस्या से इतनी गर्मी उत्पन्न हुई कि वह तीनों लोकों में फैल गई और देवता सहित समस्त जीवजाल गर्मी से जलने लगे।
तपस्या और आगे चली तो सारे लोक जलकर खत्म हो जाएंगे; यह थी हालत।

सब मिलकर शंभु के पास पहुंचे।

दूसरा कोई उपाय नहीं दिखा तो भोलेनाथ ने ऐसे एक मौके पर जब और्व आश्रम में मौजूद नहीं थे, तब अपनी तीसरी आंख से पूरे आश्रम को जला डाला।

तपस्या रुक गई।

तीनों लोकों के निवासी बच गए।

और्व वैसे तो शांत स्वभाव के थे लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनका आश्रम जला दिया गया है तो उन्होंने श्राप दे दिया कि जिस ने भी यह हरकत की है वह खुद दुःख की गर्मी से पीडित होकर भटकता चलेगा।

महादेव का मन अशांत हो गया न जाने किस चीज से, पर वे बहुत व्याकुल और शोकार्त हो गए।

कहीं एक जगह पर बैठ नहीं पा रहे थे भोलेनाथ।

भगवान भोलेनाथ दुख से जलने लगे तो उनके साथ सारी दुनिया भी जलने लगी।

पहले और्व की तपस्या से तो अब उन के श्राप से।

सब ने मिल कर और्व से प्रार्थना की कि कृपया आप अपना अभिश्राप वापस ले लें और हमें इस प्रचंड क्लेश से मुक्त कराएं।

और्व ने कहा, श्राप को बेअसर करना तो नामुमकिन है।

हां, एक उपाय बताता हूं; जिससे आप सब को मेरे श्राप से चैन मिल सकता है।

गायों के दूध से भगवान श्री रुद्र का स्नान करते रहेंगे तो उन की गर्मी कम रहेगी और आप सब भी सामान्य रहेंगे।

भगवान श्रीहरि ने स्वर्ग से ७७ दिव्य गायें दी ।

उनके दूध से अभिषेक करने से समस्त जीव जाल समेत महादेव की गर्मी उतरी और सब लोगों ने भी शांति पाई।

यह है भोलेनाथ का दूध के द्वारा अभिषेक का रहस्य।

भगवान भोलेनाथ का अभिषेक, हमेशा हमेशा करता रहना चाहिए ताकि उन के शरीर की गर्मी कम रहे और साथ में हमारा क्लेश भी।

उन्होंने हम सब को और्व की तपस्या जनित अग्नि से जलकर खत्म होने से बचाया है।

और्व का श्राप अपने ऊपर ले लिया है हमारे लिए।

क्या उनके लिए इतना भी करना हमारा कर्तव्य नही बनता?

त्याग का मूर्तरूप हैं महादेव।

समुद्र मंथन से घोर विष निकला तो उसे पी लिया हमे बचाने और और्व का श्राप भी ले लिया अपने ऊपर हमें बचाने।

इतना भी नही करेंगे क्या उनके लिए?

बडे यथार्थवादी बनने का कोशिश करते हैं हम।

अपने आप को बडे लोकोपकारी मानते हैं।

भगवान को क्यों चढाते हो दूध?

गरीबों में बांटो।

नमकहरामी है शब्द इस के लिए।

कृतघ्नता, मदद लेकर उसे भूल जाना।

क्या हम सचमुच इतने मतलबी और स्वार्थी है या सिर्फ अज्ञानी हैं?

या बहकाव में आकर हां हां कर रहे हैं?

न सिर्फ दूध से, शिव जी को जितने सारे ठंडी वस्तुएं हैं उन के द्वारा अभिषेक करते हैं।

गन्ने का रस, चंदन. नारियल का पानी।

जब तक भोलेनाथ की गर्मी कम, तब तक सब कुछ ठीक।

अगर उन की गर्मी बढी, दुख और क्लेश भी बढेंगे।

धर्म को आधुनिक वैज्ञानिकता की गुलामी में लाने का कोशिश मत करो।

आधुनिक वैज्ञानिकता का दृष्टिकोण सीमित है, सिकुडा हुआ है, हर चीज को सूक्ष्मदर्शी से देखना है वैज्ञानिकता की पद्धति।

सूक्ष्मदर्शी से ही देखते रहोगे हमेशा तो तुम्हें कीटाणु ही कीटाणु दिखाई पडेगा हर जगह।

उसमें समग्रता नहीं है, समष्टि नहीं है।

मधुमेह को ठीक करते करते आदमी को नस की बीमारी हो गई तो मधुमेह के विशेषज्ञ को उस से कोई मतलब नहीं।

मेरा काम है आप के मधुमेह को काबू में रखना है; दूसरे और किसी के पास जाओ।

यह है आधुनिकता का तरीका।

जीवन ऐसा नहीं चल सकता।

इतना पूछते हो कि शिव जी को दूध क्यों चढाना चाहिए, यह बताओ गरीब को क्यों खिलाना चाहिए?

तुम्हारी क्या जिम्मेदारी है कि गरीब को खिलाएं?

इस सवाल का जवाब है तुम्हारे पास?

गरीब को खिलाना अच्छी बात है, यह तुम्हें धर्म ने ही सिखाया।

यह बात तुम्हें उसी धर्म ने सिखाया जो कहता है कि दूध से शिव जी का अभिषेक करो।

दान-परोपकार का आधार क्या है?

नहीं पता।

धर्म का आधार क्या है?

नहीं पता।

और हर चीज मे युक्ति ढूंढने निकले हैं हम।

 

  • और्व की तपस्या से उत्पन्न ताप का वास्तविक अर्थ क्या है?
    और्व की तपस्या से उत्पन्न ताप केवल भौतिक गर्मी नहीं थी, वह संकल्प, एकाग्रता और आत्मशक्ति का प्रतीक था। जब साधक अपनी चेतना को अत्यधिक केंद्रित करता है तो उसकी ऊर्जा प्रबल हो जाती है। यह ऊर्जा यदि संतुलित न हो तो सृष्टि के संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है। इस कथा में ताप का अर्थ है आध्यात्मिक शक्ति का तीव्र संचार।
  • भगवान शंभु ने और्व के आश्रम को जलाने का निर्णय क्यों लिया?
    यह निर्णय किसी विरोध या दंड के लिए नहीं था, बल्कि लोककल्याण के लिए था। जब तप की शक्ति तीनों लोकों को संतप्त करने लगी, तब संतुलन आवश्यक था। शिव सदा समष्टि के रक्षक हैं। उन्होंने व्यक्तिगत तपस्या से ऊपर उठकर समग्र सृष्टि की रक्षा को प्राथमिकता दी।
  • और्व के श्राप का रहस्य क्या संकेत देता है?
    श्राप यह दर्शाता है कि तपस्वी की वाणी में भी अग्नि होती है। जब साधक का मन आहत होता है, तो उसकी शक्ति भी आहत रूप ले सकती है। यह हमें सिखाता है कि महान साधना के साथ महान धैर्य और करुणा भी आवश्यक है।
  • शिव द्वारा श्राप को स्वीकार करने में कौन सा गूढ़ तत्व छिपा है?
    शिव का श्राप को अपने ऊपर लेना त्याग और करुणा की पराकाष्ठा है। वे स्वयं कष्ट सहकर जगत को बचाते हैं। जैसे समुद्र मंथन में उन्होंने विषपान किया, वैसे ही यहां भी उन्होंने संताप अपने ऊपर लिया। यह बताता है कि ईश्वर का स्वरूप केवल शक्ति नहीं, बल्कि अनंत सहनशीलता भी है।
  • दूध से अभिषेक करने का आध्यात्मिक तात्पर्य क्या है?
    दूध शीतलता, पोषण और शुद्धता का प्रतीक है। शिव के अभिषेक में दूध चढ़ाना केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि यह भाव है कि हम अपनी शीतलता, श्रद्धा और कृतज्ञता अर्पित कर रहे हैं। यह कर्म हमें भी भीतर से शांत और संतुलित करता है।
  • अभिषेक में अन्य शीतल वस्तुओं का उपयोग क्यों किया जाता है?
    गन्ने का रस, चंदन, नारियल जल आदि प्रकृति के शीतल तत्व हैं। इनके माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि उग्रता को संतुलित करने के लिए शांति और मधुरता आवश्यक है। यह केवल देवपूजन नहीं, बल्कि जीवन का सिद्धांत है कि अग्नि को संतुलित करने हेतु शीतलता चाहिए।
  • इस कथा में धर्म और विज्ञान के संबंध को कैसे समझा जाए?
    कथा यह नहीं कहती कि विज्ञान अनुचित है, बल्कि यह संकेत देती है कि केवल सूक्ष्म दृष्टि पर्याप्त नहीं। धर्म समग्रता सिखाता है, जिसमें करुणा, दान, कृतज्ञता और संतुलन सब सम्मिलित हैं। विज्ञान का क्षेत्र सीमित हो सकता है, पर धर्म जीवन की व्यापकता को छूता है।
  • गरीब को भोजन कराना और शिव को दूध चढ़ाना परस्पर विरोधी क्यों नहीं हैं?
    दोनों ही कर्म धर्म के अंग हैं। दान और अभिषेक एक ही मूल भावना से उत्पन्न होते हैं, वह है समर्पण। यदि हम केवल तर्क से देखें तो विरोध दिख सकता है, पर यदि मूल भावना को समझें तो दोनों में एकता है। धर्म हमें ईश्वर भक्ति के साथ लोकसेवा भी सिखाता है।
  • कथा में बार बार संतुलन की बात क्यों आती है?
    क्योंकि सृष्टि का आधार संतुलन है। अत्यधिक तप भी संतुलन बिगाड़ सकता है और अत्यधिक शिथिलता भी। शिव इस संतुलन के प्रतीक हैं। जब कहीं उग्रता बढ़ती है, वे उसे संतुलित करते हैं। यही जीवन का गूढ़ सिद्धांत है।
  • इस कथा का छिपा हुआ संदेश हमारे दैनिक जीवन के लिए क्या है?
    छिपा संदेश यह है कि शक्ति के साथ विनम्रता, साधना के साथ करुणा और तर्क के साथ श्रद्धा आवश्यक है। केवल बाहरी कर्म नहीं, भीतर का भाव महत्वपूर्ण है। यदि हम कृतज्ञता और संतुलन को जीवन में उतार लें तो व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर शांति संभव है।
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