विदुर

Vidur

धर्म का सरल-से-सरल और गहन-से-गहन अर्थ है सबका कल्याण । ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, ऐसी कोई वस्तु नहीं, जिसके अन्तस्तल में धर्म न रहता हो और अवसर आने पर जिससे सबका कल्याण हो, ऐसे काम के लिये प्रेरणा न करता हो । पाण्डवों में तो युधिष्ठिरके रूपमें धर्मराज थे ही, कौरवोंमें भी विदुर के रूपमें धर्मराज थे । अन्तर इतना ही था कि पाण्डवों में धर्म राजा थे । उनके आज्ञानुसार सब कार्य होते थे और कौरवों में वे केवल एक सलाहकार के रूप में थे । जैसे पाप की प्रवृत्ति होने के समय अन्तरात्मा कह देती है कि यह पाप है, मत करो, परन्तु पापी लोग उस आवाज को नहीं सुनते या सुनकर भी अनसुनी कर देते हैं, वैसे ही कौरवों को अन्यायकी ओर प्रवृत्त देखकर विदुर स्पष्ट कह देते थे कि यह अन्याय है इसे मत करो । परंतु वे विदुर की बात पर ध्यान नहीं देते थे, उनकी उपेक्षा कर देते थे । विदुर जीवन में हम स्थान-स्थान पर यही बात देखेंगे, वे किसी का अनिष्ट नहीं चाहते, सबका कल्याण चाहते हैं ।

विदुर कौरवोंको तो सलाह देते ही थे, समय आनेपर पाण्डवोंको भी उचित सलाह देते थे और उनपर किसी आपत्ति की, विपत्ति की सम्भावना होती तो पहले से ही सूचित कर देते, यदि वे हो जाते तो उन्हें समझाते, उन्हें धैर्य बँधाते । इन बातोंसे महाभारत के अनेकों अंश भरे पड़े हैं । यहाँ तो केवल कुछ अंशों की संक्षेपमें चर्चामात्र की जायगी ।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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