रामचरितमानस के आदि गुरु हैं शिव-पार्वती

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रामचरितमानस के आदि गुरु हैं शिव-पार्वती

वर्णानां अर्थसंघानां इस प्रथम श्लोक से मंगलाचरण करके, प्रतिपाद्य विषय का वस्तु निर्देश भी करके श्री गोस्वामी तुलसीदासजी -

भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम्।।

इस द्वितीय श्लोक से श्री रामचरितमानस के आदि गुरु स्वरूप श्री शिव पार्वती को नमन करते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि उनकी परम कृपा से ही उन्हें मानस की प्राप्ति हुई है।

यहां दो शब्द हैं श्रद्धा और विश्वास। इन दोनों शब्दों को हम ज़्यादातर समान अर्थ में प्रयोग करते हैं, लेकिन इन दोनों में फ़र्क है। वेद शास्त्र, आध्यात्म आदि की गूढ़ता के बारे में सद्गुरु से जानने की तीव्र और उत्कट इच्छा को श्रद्धा कहते हैं। और जानने के बाद उसके ऊपर अटूट भरोसे को विश्वास कहते हैं।

यहां पर - भवानी शंकरौ श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। भवानी श्रद्धा का प्रतीक हैं। शंकर विश्वास का प्रतीक हैं। पार्वतीजी श्रद्धास्वरूपी हैं क्योंकि उनमें श्रीरामचन्द्रजी के प्रति उनके सन्देहों के निवारण की तीव्र इच्छा है। यह इच्छा माता के सती अवतार में और पार्वती अवतार दोनों में रही है।

शंभु से माता बार-बार पूछती हैं -

सोइ पूछन चह सैलकुमारी।
हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।।

प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी।।
सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना।।

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती।।
रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई।।

जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।

जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।।
अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें।।

प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा।।
तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं।।

कहहु पुनीत राम गुन गाथा।
बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि।।
अति आरति पूछउँ सुरराया।
रघुपति कथा कहहु करि दाया।।

इसे कहते हैं श्रद्धा। जगत की जननी हैं, स्वयं सर्वज्ञा हैं, ज्ञानशक्तिस्वरूपिणी हैं, लेकिन कैसे तड़प रही हैं देखिये - अपनी शंकाओं के निवारण के लिये, रामकथा सुनने के लिये। यही है श्रद्धा - उत्कट तीव्र इच्छा।

और भोलेनाथ हैं विश्वास का प्रतीक।

नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।।

क्षीरसागर मंथन के समय घोर विष कालकूट निकला। सारे देव उस विष की ज्वाला से जलने लगे। उस समय एक आकाशवाणी सुनाई दी - राम नाम में वह ताकत है जो श्रीहरी के अष्टाक्षरी मन्त्र और शंभु के पंचाक्षरी मन्त्र में है।

राम नाम का 'रा' आया 'ॐ नमो नारायणाय' से - 'नारायणाय' का 'रा'।
राम नाम का 'म' आया पंचाक्षरी से - 'ॐ नमः' - 'म'कार।
ये दोनों मन्त्रों की ताकत एक जगह आई - राम नाम बनकर।

सब राम नाम जपने लगे। लेकिन सिर्फ शिवजी में वह विश्वास था कि उन्होंने उस विष को उठाकर पी लिया। वह घोर विष उनके लिये अमृत बन गया। उनके गले का भूषण बन गया और शिवजी अजर-अमर बन गये।

खायो कालकूट भयो अजर अमर तन।।

और किसी में इतना भरोसा नहीं था राम नाम की महिमा पर। सिर्फ शिवजी में था।

नन्दी पुराण में भी है -

श्रृणुध्वं भो गणास्सर्वे रामनामपरं बलम्।
यत्प्रसादान्महादेवो हालाहलमयीं पिबेत।।
जानाति रामनाम्नस्तु परत्वं गिरिजापतिः।
ततोऽन्यो न विजानाति सत्यं सत्यं वचो मम।।

उनके जैसा राम नाम पर विश्वास और किसी को नहीं था। तुलसीदासजी चाहते हैं कि उनको भी पार्वतीजी जैसी श्रद्धा और शिवजी जैसा विश्वास मिल जाये - श्रीरामजी के ऊपर, राम नाम के ऊपर।

क्योंकि श्रद्धा है तो ज्ञान मिलता है - श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।

तुलसीदासजी जानते हैं कि जिस मानस की रचना के लिये वे उद्युक्त हैं, वह एक कल्पवृक्ष है और राम नाम उस कल्पवृक्ष का बीज है। शिवजी जैसे विश्वास होने से ही उनकी मनोकामना की सिद्धि होगी। तुलसीदासजी जानते हैं कि नाम के द्वारा ही चरित का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। भोलेनाथ को रामचरित का साक्षात्कार राम नाम के द्वारा ही मिला था।

मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी।।
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।।

ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।।

नामु राम को कल्पतरु कलि कल्यान निवास।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदास।।

न केवल तुलसीदासजी, महर्षि वाल्मीकि ने भी उल्टे राम नाम जप के बल से ही रामायण की रचना कर पाई।

शिवजी और पार्वतीजी जैसे अभिन्न रहते हैं, वैसे ही श्रद्धा और विश्वास का सम्बन्ध है। जहां श्रद्धा है वहां विश्वास आयेगा। जहां श्रद्धा नहीं वहां विश्वास भी नहीं।

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।।

और विश्वास के बिना भक्ति नहीं, और भक्ति के बिना श्रीरामजी की प्राप्ति भी नहीं।

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।।

मानस को पाने तीन साधन चाहिये - पहला श्रद्धा, दूसरा विश्वास और तीसरा सत्संग। श्रद्धा और विश्वास पाने शिव-पार्वती के प्रति प्रार्थना है। सत्संग - संतन्ह कर साथ।

अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।।

श्रद्धा और विश्वास के बिना केवल तर्क-वितर्क होते हैं। ज्ञान के नाम पर तर्क-वितर्क। इससे कोई लाभ नहीं।

मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।

मनुष्य का मन परिमित है, बुद्धि परिमित है। ईश्वर अपरिमित हैं।

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।

गीता में कहते हैं भगवान। श्रद्धा देनेवाले भी ईश्वर हैं, विश्वास देनेवाले भी ईश्वर हैं, सत्संग देनेवाले भी ईश्वर हैं। उनको पाने की शक्ति भी हमारी नहीं है। उस शक्ति को भी ईश्वर ही देते हैं।

इसलिये कहते हैं - याभ्यां विना। श्रद्धा और विश्वास के बिना - शिवजी और उमा के बिना, राम को जानना, रामचरित को जानना सम्भव नहीं है।

न पश्यन्ति सिद्धाः - उनके बिना सिद्धजन अपने अन्दर स्थित ईश्वर को नहीं देख पायेंगे। श्रद्धा है, विश्वास है तो दिखाई देंगे। ज़रूर दिखाई देंगे। सामने दिखाई देंगे।

ज़्यादातर लोग मानते हैं कि सगुण उपासना से साधक निर्गुण उपासना में पहुंचता है। यहां विपरीत दिखाई देता है - निर्गुण अन्तर्यामी ईश्वर सामने प्रकट हो आते हैं, जहां श्रद्धा है विश्वास है।

 

श्रद्धा और विश्वास का महत्व क्या है?
श्रद्धा वह आग है जो सत्य की खोज करवाती है, और विश्वास वह स्थिरता है जो सत्य को जीवन में उतारता है। ये दोनों साथ हों तभी साधना पूर्ण होती है। इनके बिना भक्ति और आत्मबोध असंभव है।

शिव और पार्वती को क्यों श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक माना गया है?
पार्वतीजी बार-बार प्रश्न करती हैं, यह दर्शाता है कि उनमें जानने की तीव्र तड़प है — यही श्रद्धा है। शिवजी बिना किसी संशय के राम नाम की महिमा में विश्वास करते हैं — यही अडिग विश्वास है।

अगर श्रद्धा और विश्वास ईश्वर की कृपा से ही मिलते हैं तो क्या प्रयास व्यर्थ है?
प्रयास व्यर्थ नहीं, क्योंकि उसी प्रयास में कृपा को आमंत्रित करने की शक्ति होती है। जैसे दीप जलाना बारिश रोक नहीं सकता, पर ईश्वर की कृपा उस दीप को जलाए रखती है।


पार्वतीजी को श्रद्धा का प्रतीक क्यों कहा गया है?
क्योंकि वे बार-बार शिवजी से राम के स्वरूप के बारे में पूछती हैं, वे संतुष्ट नहीं होती जब तक उनका भ्रम दूर न हो। ये जिज्ञासा, जो सम्मान के साथ है, श्रद्धा का स्वरूप है।

बार-बार प्रश्न करना क्या अश्रद्धा नहीं है?
नहीं, जब प्रश्न सम्मान और विवेक से किए जाएं, तो वे श्रद्धा को और प्रबल करते हैं। पार्वतीजी का तड़पना दिखाता है कि वे सच्चे ज्ञान के लिए कितनी आतुर हैं।

क्या इससे यह नहीं सिद्ध होता कि श्रद्धा में संदेह होता है?
श्रद्धा संदेह नहीं है, वह स्पष्टता की खोज है। जहां अज्ञान है, वहां तर्क करना स्वाभाविक है — श्रद्धा उसे हटाना चाहती है, छिपाना नहीं।


शिवजी को विश्वास का प्रतीक क्यों माना गया?
क्योंकि उन्होंने विष को पीने से पहले कोई प्रमाण नहीं मांगा — सिर्फ राम नाम पर भरोसा किया। और वह विष उनके लिए अमृत बन गया। यह दिखाता है कि विश्वास केवल विचार नहीं, संपूर्ण समर्पण है।

राम नाम पर इतना भरोसा कैसे किया जा सकता है?
जब भीतर का अनुभव हो जाए कि नाम में शक्ति है, तब भरोसा स्वतः आता है। शिवजी ने उसी नाम से अमंगल को मंगल में बदला।

पर क्या यह अंधविश्वास नहीं कि कोई नाम विष को अमृत बना दे?
नहीं, यह प्रतीक है कि विश्वास आत्मा में इतनी शक्ति भर देता है कि वह सबसे कठिन परिस्थिति को भी सहन कर सकती है। यह मानसिक, आत्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर सिद्ध होता है।


राम नाम को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है?
क्योंकि यह दो महान मंत्रों का सार है — नारायण का 'रा' और शिव का 'म'। इस नाम में दोनों तत्वों की शक्ति समाहित है, और यह कलियुग का कल्पवृक्ष है।

क्या राम नाम केवल प्रतीकात्मक है या वास्तविक शक्ति है?
यह केवल प्रतीक नहीं, यह शक्ति का साकार रूप है — जिसने तुलसीदास को भांग से तुलसी बना दिया, और शिवजी को अमरत्व दिया।

क्या अन्य नाम उतने ही शक्तिशाली नहीं होते?
हर नाम में शक्ति है, लेकिन राम नाम की विशेषता यह है कि यह सर्वसुलभ, सर्वग्रहणीय और दोनों धाराओं का संगम है। यही इसे सर्वश्रेष्ठ बनाता है।


क्या बिना श्रद्धा और विश्वास के भी कुछ लोग आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं?
नहीं। बिना श्रद्धा साधना शुरू नहीं होती और बिना विश्वास वह टिकती नहीं। सिर्फ बहस और अनुमान ज्ञान नहीं कहलाते।

क्या सत्संग इन दोनों के बिना संभव है?
सत्संग की सही ऊर्जा केवल श्रद्धावान और विश्वासी साधकों को ही प्राप्त होती है। वरना वह केवल बौद्धिक चर्चा बनकर रह जाती है।

तो क्या श्रद्धा और विश्वास सीखने से आते हैं या स्वयं उत्पन्न होते हैं?
वे स्वयं उत्पन्न नहीं होते — वे कृपा से ही आते हैं। लेकिन उनकी दिशा में किया गया प्रयास ही कृपा का द्वार खोलता है।

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