योगी क्यों बनें?

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 योगी क्यों बनें?

गीता में भगवान अर्जुन से कहते हैं, योगी बन जाओ। तस्माद् योगी भवार्जुन। क्योंकि तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योपि मतोधिकः। कर्मेभ्यश्च अधिको योगी तस्मात योगी भवार्जुना। क्योंकि तपस्वियों से भी योगी श्रेष्ठ है। ज्ञानियों से भी योगी श्रेष्ठ है। कर्म करने वालों से भी शास्त्रोक्त अच्छे कर्म ही करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इसलिए योगी बनो। क्या है योग? कौन है योगी? योग का अर्थ है दो पदार्थों का मिलना। एक योद्धा ने कवच पहन लिया तो कहते हैं उसका उस कवच के साथ योग हो गया। कवच पहनने और हथियार उठाने के लिए पहले योगो योगः ऐसे ही आह्वान देते थे। वैद्य शास्त्र में रोग को दूर करने विभिन्न जटी बूटियों के संयोग से जब औषध बनता है तो उसे भी योग कहते हैं। उपाय भी योग है। जब किसी वस्तु का चित्त ध्यान करता है, जब उसे मिल जाता है, वो भी योग है। भगवान के साथ युक्त हो जाना योग है, भगवत रूप हो जाना योग है। जीवात्मा और परमात्मा इनके अभेदता को अनुभव करना योग है। पर आमतौर पर हम योग उसे कहते हैं, उस शारीरिक या मानसिक क्रिया को कहते हैं जिससे कुछ विशेष सिद्धि मिल जाए। ज्यादा करके हम उसे योगी या योगिनी मानते हैं जो अमानुषी कर्म कर पाएं। जो साधारण मनुष्य की क्षमता के बाहर हो। लेकिन इस बहाने सबसे ज्यादा धोखा भी होता है कलयुग में। गुरुवो बहवस्तात शिष्य वित्तापहारकाः विरला गुरुवस्ते ये शिष्य संतापहारकाः। गुरु बनकर शिष्य के धन का हरण करने वाले गुरु बहुत मिलेंगे कलयुग में। लेकिन शिष्य के दुख का हरण करने वाले गुरुजन विरल ही मिलेंगे। यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी दोष कहां है पता है? आप जिसके लिए मार्ग ढूंढ रहे हो उसी में। सांसारिक कामनाओं के लिए आप अध्यात्म में आएंगे और गुरु ढूंढेंगे तो आपको ऐसे ही लोग मिलेंगे। शिष्य वित्तापहारगाह जो आपके धन का हरण करेंगे। जिसको आध्यात्मिक प्रगति के सिवा और कुछ नहीं चाहिए, मोक्ष के सिवा और कुछ नहीं चाहिए, उसके पास गुरु क्या देवता भी अपने आप आ जाएंगे उसकी सहायता करने। मैं परमात्मा से भिन्न नहीं हूं सर्वदा, इस अनुभूति में रहना है योग। सही अर्थ में योग। केवल ध्यान करते समय १० मिनट के लिए, आधे घंटे के लिए। ऐसे नहीं, जब हर लौकिक व्यवहार इस दृष्टि से होगा तब वो योग बनता है। आत्मवत सर्वभूतेषु जो आप अपने लिए चाहते हैं वही दूसरों के लिए भी चाहेंगे। इसको मन में रखते हुए हर लौकिक व्यवहार को करेंगे तब वो योग बनता है। दुख कब होता है? जब हम अपने आप को दूसरों से विभिन्न देखेंगे तब, ये जो मेरा शरीर है, मैं सिर्फ इतना ही हूं। बाकी जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, मुझसे भिन्न है। उसके पास जो है, वो मेरे पास नहीं है। घर में पिताजी ने आपके बचपन में गाड़ी खरीदी। उनका धन उनके नाम पर। आपने कभी सोचा कि ये मेरी नहीं है, पिताजी की है? स्कूल में जाकर क्या बताया, हमने गाड़ी खरीदी। देखो हमारी गाड़ी, पूरे परिवार की गाड़ी, भाई की भी गाड़ी। बड़े हो गए, भाई ने शादी की, अपना परिवार बसाया, आपने भी शादी की, खुद का परिवार बसाया। भाई के पास इनोवा है, आपके पास मारुति, दुख का कारण बन गया। दुख कहो, ईर्ष्या कहो, असूया कहो, मेरे पास भी उसके जैसी गाड़ी आ जाए। इसके लिए प्रयास, जब तक नहीं आती अशांति। जब आ जाती है तब भी, अरे उसकी गाड़ी फुल्ली लोडेड है, उसमें ६ एयर बैग है, हमारे में   ही है। यह कभी खत्म नहीं होता। कहाँ से शुरू हुई? जब आपने अपने भाई को अपने से अलग देखना शुरू किया। समस्त विश्व के प्रति आपकी यह जो भेद बुद्धि है, कि मैं इन सब से अलग हूं। इस भेद बुद्धि को त्याग देना योग है। वसुधैव कुटुंबकम इस तत्व को सचमुच अनुभव करना योग है। यह एक दिन में नहीं होता, यह निरंतर अभ्यास से होता है। हर एक में भगवान को देखना आसान नहीं है। अंबरीश को मारने जब दुर्वासा महर्षि द्वारा निर्मित राक्षसी उनकी ओर आई, उस राक्षसी में भी अंबरीश ने भगवान को ही देखा। आसान नहीं है ये। एक महात्मा कहते हैं, उन्होंने काम, क्रोध, लोभ इन सबको काबू में कर दिया। पर सब में हर व्यक्ति में भगवान को देख पाना, यह बहुत ही मुश्किल निकला। कुछ महीनों तक गोमती तट पर जाकर हर दिन घंटों तक जो भी वहां आता था, हिंदू, अहिंदु, विद्वान, पामर, स्वच्छ, मलिन हर व्यक्ति का पैर छूते थे। उनको भगवान मानकर। महीनों लगे उनको अपने आप में इस भाव को दृढ़ करने। यह है योग जो निरंदर अभ्यास से होता है। योगश्चित्तवृत्ति निरोधः, यह जो चित्तवृत्ति जिसका निरोध करना है, क्या है यह चित्तवृत्ति? भेदभाव को महसूस कराना ही यह चित्तवृत्ति है। यही मन का काम है, चित्त का काम है। इसे काबू में रखकर सर्वत्र समत्व की अनुभूति करना है योग। समत्वं योग उच्यते।

 

  • भगवान श्रीकृष्ण ने योगी को तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी से श्रेष्ठ क्यों माना है?
    योगी इन सबमें श्रेष्ठ है क्योंकि तपस्वी केवल शरीर को तपाता है, ज्ञानी केवल बौद्धिक जानकारी रखता है और कर्मी केवल फलों की इच्छा से कर्म करता है। योगी वह है जो अपनी चेतना को परमात्मा से जोड़ चुका है। योग इन सभी साधनाओं का चरम लक्ष्य है, जहाँ साधक का कर्म, ज्ञान और तप ईश्वर में विलीन हो जाता है।
  • साधारण मनुष्य योग का क्या अर्थ निकालते हैं और वास्तविक योग उससे भिन्न कैसे है?
    साधारण जन योग को केवल शारीरिक व्यायाम, मानसिक एकाग्रता या अमानवीय चमत्कार दिखाने की कला मानते हैं। इसके विपरीत, वास्तविक योग जीवात्मा और परमात्मा की अभेदता का अनुभव करना है। यह केवल कुछ समय के लिए ध्यान लगाना नहीं, बल्कि हर समय भगवद-भाव में स्थित रहना है।
  • कलयुग में कपटी गुरुओं की बहुलता का मूल कारण क्या है?
    इसका मूल कारण शिष्यों की अपनी सांसारिक कामनाएँ हैं। जब व्यक्ति अध्यात्म के मार्ग पर मोक्ष के स्थान पर धन, संपत्ति या सांसारिक सुख ढूँढता है, तो उसे 'शिष्य-वित्त-अपहारक' (शिष्य का धन हरने वाले) गुरु ही मिलते हैं। यदि खोज केवल आत्म-कल्याण की हो, तो सच्चा गुरु स्वयं मार्ग प्रशस्त करता है।
  • दुःख का उदय कहाँ से होता है और योग इसमें कैसे सहायक है?
    दुःख का मूल कारण 'भेद-बुद्धि' है। जब हम स्वयं को दूसरों से अलग देखते हैं, तब ईर्ष्या, स्पर्धा और असुरक्षा का जन्म होता है। योग इस भेद-बुद्धि को नष्ट कर 'समत्व' लाता है। जब व्यक्ति समस्त विश्व को अपना ही विस्तार मानता है, तब द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल आनंद शेष रहता है।
  • 'समत्वं योग उच्यते' का व्यवहारिक अर्थ क्या है?
    इसका अर्थ है जीवन की हर परिस्थिति, व्यक्ति और वस्तु में एक ही चेतना को देखना। जैसे बचपन में हम परिवार की संपत्ति को अपनी मानते थे, वैसे ही पूरे संसार के ऐश्वर्य और कष्ट को अपना समझना समत्व है। अनुकूल और प्रतिकूल स्थितियों में विचलित न होना ही वास्तविक योग है।
  • चित्तवृत्ति का निरोध करने से योग का क्या संबंध है?
    चित्त का स्वभाव ही भेदभाव उत्पन्न करना है। यह निरंतर 'मेरा-तेरा' और 'प्रिय-अप्रिय' के विचार बुनता रहता है। योगश्चित्तवृत्ति निरोधः का अर्थ है मन की उन लहरों को शांत करना जो हमें अलगाव का बोध कराती हैं। जब ये वृत्तियाँ रुक जाती हैं, तब स्वरूप का साक्षात्कार होता है।
  • क्या योग केवल एकांत में संभव है?
    नहीं, लौकिक व्यवहार करते हुए भी योग संभव है। जब मनुष्य 'आत्मवत सर्वभूतेषु' के सिद्धांत पर चलता है, अर्थात जो वह अपने लिए चाहता है वही दूसरों के लिए भी चाहता है, तब उसका हर व्यवहार योगाभ्यास बन जाता है। सच्चा योग समाज के बीच रहकर समता के भाव को बनाए रखने में है।
  • अंबरीश और दुर्वासा की कथा से योग का कौन सा रहस्य प्रकट होता है?
    यह कथा बताती है कि एक पूर्ण योगी विनाशकारी परिस्थितियों में भी ईश्वर के दर्शन करता है। जब साक्षात मृत्यु (राक्षसी) सामने खड़ी थी, तब भी अंबरीश विचलित नहीं हुए क्योंकि उन्होंने उस राक्षसी में भी भगवान का ही रूप देखा। यह निर्भयता योग की पराकाष्ठा है।
  • 'यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी' सूत्र योग मार्ग में कैसे कार्य करता है?
    इसका अर्थ है कि जैसी आपकी भावना होगी, वैसी ही आपको सिद्धि प्राप्त होगी। यदि आपकी भावना शुद्ध आध्यात्मिक प्रगति की है, तो प्रकृति और देवता भी आपकी सहायता करेंगे। यदि भावना सांसारिक लाभ की है, तो आप माया के जाल में ही उलझे रहेंगे।
  • योग को प्राप्त करने के लिए निरंतर अभ्यास की आवश्यकता क्यों है?
    जन्मों से हमारी बुद्धि भेदभाव और द्वैत की अभ्यस्त हो चुकी है। प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर को देखना सुनने में सरल है परंतु अनुभव में बहुत कठिन। जैसे उस महात्मा को महीनों तक गोमती तट पर प्रत्येक व्यक्ति के चरण स्पर्श करने पड़े ताकि मन का अहंकार और भेद मिट सके, वैसे ही निरंतर अभ्यास से ही चित्त शुद्ध होता है।
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