चित्त की निस्तरङ्ग अवस्था: दृढ़ शान्ति की ओर एक यात्रा
साधना का मुख्य उद्देश्य चित्त को निस्तरङ्ग बनाना है। जिस प्रकार वायु के बिना समुद्र की लहरें शांत हो जाती हैं, चित्त की वैसी ही निर्विकार अवस्था को योग की भाषा में स्थिति कहा जाता है।
क्या इस अवस्था में वृत्तियों का पूर्ण अभाव हो जाता है? इसका उत्तर है नहीं। इस स्थिति में सात्त्विक वृत्तियाँ बनी रहती हैं, किंतु राजसिक और तामसिक वृत्तियों का पूरी तरह शमन हो जाता है।
योगशास्त्र में इस अवस्था का सुंदर वर्णन मिलता है। जो व्यक्ति प्रिय या अप्रिय विषयों को सुनने, स्पर्श करने, देखने, चखने या सूंघने पर न तो हर्षित होता है और न ही विषाद करता है, वही वास्तव में शान्त कहलाता है।
इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि आप अच्छा सुनेंगे, पर मन में अति-उत्साह की लहर नहीं उठेगी। बुरा सुनने पर दुख नहीं होगा। अच्छे दृश्यों को देखकर राग पैदा नहीं होगा और बुरे को देखकर द्वेष नहीं होगा। स्वादिष्ट भोजन और नीरस भोजन, दोनों ही स्थिति में चित्त सम रहेगा। सुगंध हो या दुर्गंध, कोमल बिस्तर हो या कठोर पत्थर, चित्त पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सुख और दुख वास्तव में चित्त में उठने वाली राजसिक और तामसिक तरंगें हैं। इन तरंगों का अभाव ही परम शान्ति है, जो सात्त्विक स्वरूप होती है।
यह अवस्था सहज रूप से नहीं आ सकती। इसके लिए सचेत प्रयास और पुरुषार्थ की आवश्यकता है। योग शास्त्र में इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए विशिष्ट साधन दिए गए हैं। केवल निरंतर अभ्यास द्वारा ही इस अवस्था को स्थायी बनाया जा सकता है। कुछ समय के लिए मन की शान्ति किसी को भी मिल सकती है, पर यदि दृढ़ता वाली शान्ति चाहिए तो उसके लिए लंबा संघर्ष और अभ्यास करना होगा।
इस अभ्यास के लिए कुछ अनिवार्य शर्तें हैं। इसे नियमित रूप से प्रतिदिन करना होगा और दीर्घ काल तक जारी रखना होगा। इसके लिए साधनों का सही ज्ञान होना आवश्यक है। साथ ही यह दृढ़ विश्वास या श्रद्धा होनी चाहिए कि इस मार्ग पर चलने से फल अवश्य मिलेगा। तपस्या और ब्रह्मचर्य का पालन भी इस यात्रा में अनिवार्य है।
जब आप सही ज्ञान के साथ, पूरी श्रद्धा और उत्साह से, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए एक तपस्या के रूप में लंबे समय तक योग के साधनों का अभ्यास करते हैं, तभी वह दृढ़ शान्ति प्राप्त होती है। यह शान्ति बाहरी विषयों पर आधारित नहीं होती, क्योंकि बाहरी परिस्थितियाँ हमारे वश में नहीं हैं। केवल हमारा मन ही हमारे अधीन हो सकता है।
कष्टों के अभाव में जो शान्ति महसूस होती है, वह शाश्वत नहीं है। कष्ट आते ही वह भंग हो जाएगी। वास्तविक लक्ष्य ऐसी अवस्था पाना है जहाँ पीड़ा रहे या न रहे, शान्ति सदा बनी रहे। इसके लिए मन को हर्ष और शोक, दोनों ही प्रकार की लहरों से मुक्त करना होगा। जिस चित्त में सुख की तीव्र लहरें उठती हैं, उसमें दुख की लहरें भी अवश्य उठेंगी।
इस साधना को केवल एक नीरस दिनचर्या के रूप में नहीं, बल्कि पूरे उत्साह के साथ करना चाहिए। ज्ञान, श्रद्धा, ब्रह्मचर्य, तप और निरंतरता के मेल से ही शान्ति में बल आता है।
यह समझना आवश्यक है कि यह शान्ति समाधि की अवस्था नहीं है। समाधि में तो सत्त्व गुण का भी अभाव हो जाता है। यह शान्ति उस समय के लिए है जब आप सांसारिक व्यवहारों में लगे होते हैं। इस अभ्यास के द्वारा समाधि की अवधि और गुणवत्ता बढ़ती है। इससे साधक के लिए अपनी इच्छानुसार समाधि में जाना और उससे बाहर आना सुलभ हो जाता है
प्रश्न 1: चित्त की निस्तरङ्ग अवस्था का वास्तविक अर्थ क्या है और यह सामान्य मानसिक शान्ति से कैसे भिन्न है?
चित्त की निस्तरङ्ग अवस्था का अर्थ है मन का पूर्णतः लहरों से रहित हो जाना। सामान्य शान्ति प्रायः बाहरी अनुकूल परिस्थितियों पर आधारित होती है और अस्थाई होती है। इसके विपरीत, निस्तरङ्ग अवस्था एक ऐसी निर्विकार स्थिति है जहाँ राजसिक और तामसिक वृत्तियों का पूरी तरह शमन हो जाता है और केवल सात्त्विक वृत्तियाँ शेष रहती हैं। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में पूरी तरह अडिग रहता है।
प्रश्न 2: क्या इस अवस्था को प्राप्त करने पर मनुष्य की संवेदनाएं समाप्त हो जाती हैं?
नहीं, संवेदनाएं समाप्त नहीं होतीं बल्कि उनके प्रति चित्त की प्रतिक्रिया बदल जाती है। इस अवस्था में साधक प्रिय और अप्रिय विषयों को सुनता, देखता और अनुभव करता है, किंतु उसके भीतर हर्ष या विषाद की कोई तरंग नहीं उठती। वह स्वादिष्ट भोजन और नीरस भोजन, अथवा कोमल शैया और कठोर पाषाण के प्रति समभाव रखता है। यह संवेदनाओं का अभाव नहीं, बल्कि उन पर चित्त का पूर्ण विजय है।
प्रश्न 3: सुख और दुःख के मध्य वह कौन सा गूढ़ मनोवैज्ञानिक संबंध है जिसे यह साधना प्रकट करती है?
इसमें एक गहरा रहस्य यह है कि सुख और दुःख वास्तव में चित्त में उठने वाली दो भिन्न प्रकार की तरंगें मात्र हैं। जिस चित्त में सुख की तीव्र लहरें उठती हैं, वहाँ दुःख की लहरों का उठना भी निश्चित है। वास्तविक शान्ति इन दोनों ही प्रकार की लहरों के अभाव में है। जो व्यक्ति अत्यधिक हर्ष का अनुभव करता है, वह अनिवार्य रूप से गहरे शोक का भी भागी बनता है। इन दोनों द्वंद्वों से मुक्ति ही परम सात्त्विक शान्ति है।
प्रश्न 4: इस दृढ़ शान्ति की प्राप्ति के लिए तपस्या और ब्रह्मचर्य को अनिवार्य क्यों माना गया है?
निस्तरङ्ग अवस्था कोई साधारण उपलब्धि नहीं है, इसके लिए विपुल मानसिक और शारीरिक शक्ति के संचय की आवश्यकता होती है। ब्रह्मचर्य साधक को ओज और संकल्प शक्ति प्रदान करता है, जबकि तपस्या मन को विपरीत परिस्थितियों में स्थिर रहने का प्रशिक्षण देती है। इनके बिना अभ्यास में वह बल नहीं आता जो शान्ति को दृढ़ और अटूट बना सके। ये दोनों साधन साधक को आंतरिक संघर्ष के लिए सामर्थ्य प्रदान करते हैं।
प्रश्न 5: बाहरी परिस्थितियों के नियंत्रण में न होने पर भी चित्त का समत्व कैसे संभव है?
यह बोध होने पर कि बाहरी परिस्थितियाँ हमारे अधीन नहीं हैं, साधक अपना पूरा ध्यान केवल मन को अनुशासित करने पर केंद्रित करता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि वास्तविक सुख वस्तुओं में नहीं बल्कि चित्त की सात्त्विक स्थिति में है, तब राग और द्वेष क्षीण होने लगते हैं। निरंतर अभ्यास के माध्यम से इन्द्रियों के विषयों के प्रति आकर्षण और विकर्षण को समाप्त करके ही यह समत्व प्राप्त किया जा सकता है।
प्रश्न 6: निस्तरङ्ग अवस्था और समाधि के मध्य क्या सूक्ष्म अंतर है?
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूक्ष्म भेद है। निस्तरङ्ग अवस्था समाधि नहीं है, बल्कि सांसारिक व्यवहार के समय की चित्त की स्थिति है। समाधि में सत्त्व गुण का भी लय हो जाता है और चित्त पूर्णतः निरुद्ध हो जाता है। निस्तरङ्ग अवस्था वह आधार है जो साधक को व्यवहार काल में शान्त रखती है और उसकी समाधि की गुणवत्ता को बढ़ाती है। यह साधक के लिए समाधि में प्रवेश और वहाँ से बाहर आने की प्रक्रिया को सुलभ और इच्छानुसार बना देती है।
प्रश्न 7: अभ्यास की वे कौन सी अनिवार्य शर्तें हैं जो इस मार्ग पर सफलता सुनिश्चित करती हैं?
अभ्यास की सफलता के लिए तीन मुख्य नियम हैं। प्रथम, इसे निरंतर अर्थात् प्रतिदिन बिना किसी अंतराल के करना होगा। द्वितीय, इसे दीर्घ काल तक अर्थात् वर्षों के अथक पुरुषार्थ के साथ जारी रखना होगा। तृतीय, इसे पूर्ण श्रद्धा, सही ज्ञान और उत्साह के साथ करना होगा। यदि अभ्यास में निरंतरता की कमी है या वह केवल एक निर्जीव दिनचर्या है, तो दृढ़ शान्ति की प्राप्ति असंभव है।
प्रश्न 8: क्या कष्टों का पूर्ण अभाव ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है?
लेख के अनुसार, वास्तविक लक्ष्य कष्टों का अभाव नहीं है, क्योंकि संसार में कष्ट कभी भी आ सकते हैं। वास्तविक लक्ष्य ऐसी अवस्था की प्राप्ति है जहाँ कष्ट उपस्थित होने पर भी चित्त की शान्ति भंग न हो। कष्टों के न होने पर जो शान्ति अनुभव होती है, वह कृत्रिम और नश्वर है। सच्ची शान्ति वह है जो शारीरिक या मानसिक पीड़ा के मध्य भी अडिग बनी रहे।
प्रश्न 9: क्या केवल शास्त्रों के ज्ञान मात्र से यह परम स्थिति प्राप्त की जा सकती है?
केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। इस यात्रा में ज्ञान के साथ-साथ पुरुषार्थ और सचेत प्रयास की परम आवश्यकता है। यह अवस्था स्वतः या सहज रूप से नहीं आती, बल्कि इसके लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। ज्ञान केवल मार्ग का निर्देश करता है, किंतु उस पथ पर चलने के लिए निरंतर अभ्यास और कठोर अनुशासन की ऊर्जा अनिवार्य है।
प्रश्न 10: इस साधना में उत्साह का क्या महत्त्व है और यह शान्ति को बल कैसे प्रदान करता है?
साधना को यदि केवल एक भार या नीरस कार्य समझा जाए, तो चित्त में शिथिलता बनी रहती है। उत्साह वह तत्व है जो अभ्यास को जीवंत और तेजस्वी बनाता है। जब ज्ञान, श्रद्धा और तप के साथ उत्साह का मेल होता है, तब प्राप्त होने वाली शान्ति में एक विशेष प्रकार का आंतरिक बल उत्पन्न होता है। यही बल साधक को घोर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विचलित होने से सुरक्षित रखता है।
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