भागवत का पांचवा श्लोक। त एकदा तु मुनयः प्रातरहुत हुताग्नयः सत्कृतं सूतमासीनं प्रप्रचुरीदमादरात्।
मुनियों ने सूत से पूछा, कौन है मुनि? मनु ते जानाति इति मुनिही। जिनके पास ज्ञान है और उस ज्ञान के आधार पर मनन भी कर सकते हैं। दूसरों की कही हुई बातों को यह केवल अनुसरण नहीं करेंगे, उसे किसी और को सुनाते नहीं जाएंगे।
इनके पास मनन करने के लिए मेधा शक्ति है। मेधा शक्ति बहुत ही महत्वपूर्ण है। अगर आपके पास मेधा शक्ति है तभी आपको अध्यात्म के विषय समझ में आएंगे। उदाहरण के लिए देखिए। यहां श्लोक में कहा है प्रातर हुता हुताग्नयः। हुत शब्द दो बार क्यों? हुत का अर्थ है आहुति देना।
क्या कई आहुतियां दी गई? यह अर्थ है नहीं। बड़े यज्ञों के अंदर बहुत कई यज्ञ होते हैं। जो प्रतिदिन किए जाते हैं, वे हैं नित्य जैसे अग्निहोत्र। जो विशेष दिनों में किए जाते हैं, वे हैं नैमित्तिक। जैसे राजा दशरथ के अश्वमेध्या को लीजिए। यह शुरू हुआ चैत्र पूर्णिमा को संग्रहणी नामक।
यज्ञ के साथ उसके आगे वैशाख पूर्णिमा को पशु यज्ञ हुआ, उसके आगे वैशाख अमावस्या को ब्रह्मोदन हुआ। ये सारे नैमित्तिक यज्ञ हैं जो प्रधान यज्ञ के ही अंतर्गत हैं, अंतर्भूत हैं। यहां सहस्त्र सम चल रहा है, हजार सालों का यज्ञ। उसमें नित्य यज्ञ भी रहेंगे, नैमित्तिक भी।
इन दोनों को समाप्त करके मुनिजन कथा सुनने आए। अब देखिए इस गहराई में जाने के लिए मुनियों को ज्ञान अवश्य चाहिए वैदिक यज्ञ पद्धति के बारे में और मनन शक्ति मेधा शक्ति भी चाहिए। नहीं तो हुत हुत को सुनकर लगेगा यूं ही दो बार बोले होंगे या छंदानुसार श्लोक की पंक्ति भरने के लिए।
ऐसी मेधा शक्ति और ज्ञान ये कैसे प्राप्त होते हैं? गीता बताती है मुनि का स्वभाव। दुखेषु अनुद्विग्न मनाः सुखेषु विगतस्पृहः वितराग भय क्रोधः स्थित धीर मुनिरुच्यते। जिसे दुख में उद्वेग ना आए सुख के लिए कामना नहीं है।
जिसके मन में राग, भय या क्रोध नहीं है, जिसकी बुद्धि स्थिर है। यह है मुनि का स्वभाव। अगर ऐसा स्वभाव है तो ज्ञान अपने आप आ जाएगा। मेधा शक्ति और मनन शक्ति भी अपने आप आ जाएंगी। यहां सूत सौती ही है, उग्रश्रवा जिन्होंने पहले महाभारत का आख्यान किया था। सूत बैठे हुए थे।
उनको आसन दिया गया था। ब्रह्मासन।
तभी उनसे सवाल पूछे गए क्योंकि मुनियों को पता है कि खड़े व्यक्ति में बेचैनी रहती है। हमारे संस्कार में खड़े व्यक्ति के सामने नमस्कार करना भी मना है क्योंकि वह सही ढंग से आशीर्वाद के रूप में प्रतिक्रिया नहीं कर पाएगा।
जब आप खड़े हैं तो आप में एक त्वरा रहती है। इसलिए सूद जब बैठे थे तो उनका सत्कार करके उनसे सवाल पूछे गए। क्या है सत्कार? पूजा। चंदन, कुंगुम इत्यादि लगाकर, वस्त्र इत्यादि देकर पूजा में मान और दान दोनों ही रहते हैं। किसी से ज्ञान पाना हो तो।
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यहां बहुवचन का प्रयोग किया गया है। मुनियों ने पूछा। महाभारत के आख्यान के समय सौती ने मुनियों से पूछा, आप लोग क्या सुनना चाहेंगे? उन्होंने कहा, हमारे कुलपति शौनक जी को आने दीजिए, वे बताएंगे। यहां कई मुनि एक साथ पूछ रहे हैं। इतनी उत्सुकता थी उनमें भागवत के लिए।
आगे के तीन श्लोक सूत की योग्यता के बारे में हैं कि ज्ञानी मुनिजन कैसे सूत से और ज्ञान पाने तैयार होंगे।
- मुनि शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है और मेधा शक्ति का अध्यात्म में क्या महत्व है?
मुनि उसे कहते हैं जो मनन करने की क्षमता रखता है अर्थात मनु ते जानाति इति मुनिः। जिसके पास ज्ञान हो और वह उस ज्ञान के आधार पर गहन चिंतन कर सके, वही मुनि है। मुनि दूसरों की कही बातों का केवल अंधानुकरण नहीं करते। अध्यात्म के गूढ़ विषयों को समझने के लिए मेधा शक्ति अत्यंत आवश्यक है। इसके बिना शास्त्रों के गहरे और रहस्यमय अर्थों को समझ पाना असंभव है।
- श्लोक में हुत शब्द का दो बार प्रयोग क्यों किया गया है और इसका यज्ञ पद्धति से क्या संबंध है?
हुत शब्द का दो बार प्रयोग केवल छंद पूरा करने के लिए नहीं है, बल्कि यह यज्ञ की दो श्रेणियों को दर्शाता है। पहला है नित्य यज्ञ, जो प्रतिदिन किया जाता है जैसे अग्निहोत्र। दूसरा है नैमित्तिक यज्ञ, जो विशेष अवसरों या प्रधान यज्ञ के अंतर्गत किए जाते हैं। सहस्त्र वर्षों के इस बड़े यज्ञ में इन दोनों प्रकार के यज्ञों की पूर्णाहुति करके ही मुनिजन कथा सुनने आए थे।
- नैमित्तिक यज्ञ के स्वरूप को राजा दशरथ के अश्वमेध यज्ञ के उदाहरण से कैसे समझा जा सकता है?
राजा दशरथ का अश्वमेध यज्ञ एक प्रधान यज्ञ था, जिसके भीतर कई नैमित्तिक यज्ञ अंतर्भूत थे। यह चैत्र पूर्णिमा को संग्रहणी नामक यज्ञ से आरंभ हुआ। इसके पश्चात वैशाख पूर्णिमा को पशु यज्ञ और वैशाख अमावस्या को ब्रह्मोदन यज्ञ हुआ। यह उदाहरण दर्शाता है कि एक मुख्य अनुष्ठान के भीतर समय-समय पर विशेष विधान किए जाते हैं, जिन्हें नैमित्तिक कहा जाता है।
- गीता के अनुसार एक सच्चे मुनि का स्वभाव कैसा होता है और इससे ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है?
गीता के अनुसार जिस व्यक्ति का मन दुखों में उद्वेग अर्थात व्याकुलता को प्राप्त नहीं होता, सुखों के लिए जिसके मन में कोई स्पृहा या लालसा नहीं होती, और जो राग, भय तथा क्रोध से सर्वथा मुक्त हो चुका है, वही स्थिर बुद्धि वाला मुनि है। जब मनुष्य का स्वभाव ऐसा संतुलित हो जाता है, तो ज्ञान, मेधा शक्ति और मनन शक्ति स्वतः ही जागृत हो जाती हैं।
- कथा श्रवण से पूर्व सूत जी को आसन क्यों दिया गया और खड़े व्यक्ति से ज्ञान न लेने का क्या रहस्य है?
सूत जी को आदर सहित ब्रह्मासन पर बैठाया गया था। इसके पीछे यह रहस्य है कि खड़े व्यक्ति के भीतर एक स्वाभाविक त्वरा अर्थात बेचैनी और शीघ्रता रहती है। जब मन में स्थिरता नहीं होगी, तो ज्ञान का प्रवाह सही ढंग से नहीं हो सकता। इसी कारण सनातन संस्कृति में खड़े व्यक्ति के सम्मुख नमस्कार करना भी वर्जित है, क्योंकि वह शांत चित्त से आशीर्वाद नहीं दे पाता।
- शास्त्रों में वर्णित सत्कार की क्या परिभाषा है और इसमें किन दो तत्वों का होना अनिवार्य है?
सत्कार का अर्थ केवल औपचारिकता नहीं बल्कि वास्तविक पूजा है, जिसमें चंदन, कुंकुम, वस्त्र आदि अर्पित किए जाते हैं। सच्चे सत्कार में दो मुख्य तत्वों का होना अनिवार्य है: मान अर्थात भीतर से आदर का भाव, और दान अर्थात समर्पण। इन दोनों के बिना किया गया कोई भी आदर अधूरा माना जाता है।
- प्राचीन काल में ज्ञान प्राप्ति की पद्धति आधुनिक व्यावसायिक शिक्षा पद्धति से किस प्रकार भिन्न थी?
आज के समय में ज्ञान और विज्ञान एक वस्तु की भांति बेचे जाते हैं, जहाँ शुल्क देकर अधिकार के रूप में शिक्षा ली जाती है और विभिन्न प्रकार की छूट या उपहार दिए जाते हैं। इसके विपरीत, प्राचीन पद्धति में ज्ञान अर्जन करने का एकमात्र मार्ग मान, दान, सेवा और विनम्रता पूर्वक प्रार्थना करना था। ज्ञान को खरीदा नहीं, बल्कि पात्रता सिद्ध करके प्राप्त किया जाता था।
- महाभारत और भागवत के आख्यान के समय मुनियों के व्यवहार में क्या अंतर दिखाई देता है?
महाभारत के आख्यान के समय जब सूत जी ने मुनियों से उनकी रुचि पूछी, तो मुनियों ने स्वयं निर्णय न लेकर अपने कुलपति शौनक जी की प्रतीक्षा करने को कहा। परंतु भागवत के समय मुनियों में इतनी तीव्र उत्सुकता और पिपासा थी कि उन्होंने कुलपति की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं ही सामूहिक रूप से प्रश्न पूछना आरंभ कर दिया।
- श्लोक में प्रयुक्त बहुवचन शब्द मुनयः किस विशेष रहस्य की ओर संकेत करता है?
यहाँ बहुवचन का प्रयोग यह दर्शाता है कि भागवत महापुराण का ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि संपूर्ण मुनि समाज में एक समान जिज्ञासा और व्याकुलता थी। यह सामूहिक उत्सुकता सिद्ध करती है कि भागवत का तत्वज्ञान संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए कितना महत्वपूर्ण और गोपनीय था।
- सूत जी की योग्यता के विषय में आने वाले श्लोक हमें ज्ञानी पुरुषों के किस व्यवहार से परिचित कराते हैं?
आगे के श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि जो स्वयं परम ज्ञानी और तपस्वी मुनि हैं, वे भी सूत जी से ज्ञान प्राप्त करने के लिए तत्पर बैठे हैं। यह रहस्य उजागर करता है कि सच्चा ज्ञानी कभी अहंकारी नहीं होता। जहाँ भी और जिससे भी भगवद तत्व का ज्ञान मिले, उसे ग्रहण करने के लिए एक श्रेष्ठ विद्वान भी सदैव विनीत भाव से तत्पर रहता है।