मित्रता का बल

असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृन्मताः।
साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत्॥

इस श्लोक का सरल अर्थ है – जिनके पास साधन नहीं, धन नहीं, फिर भी यदि उनके पास बुद्धि और अच्छे मित्र हों, तो वे बड़े से बड़े काम जल्दी कर लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कौआ, कछुआ, हिरन और चूहा।

यह बात केवल उपदेश नहीं, एक जीवंत उदाहरण पर आधारित है। पंचतंत्र में एक सुंदर कथा आती है।

जंगल में एक हिरन, एक कौआ, एक चूहा और एक कछुआ रहते थे। स्वभाव अलग, शक्ति अलग, पर मन एक था। हिरन तेज दौड़ सकता था, पर संकट में पड़ जाए तो असहाय हो जाता। कौआ ऊपर से सब देख लेता, पर अकेले कुछ कर नहीं पाता। चूहा छोटा था, पर दांतों में बड़ी ताकत थी। कछुआ धीमा था, पर भरोसे का घर जैसा था।
एक दिन हिरन शिकारी के जाल में फंस गया। वह छटपटाने लगा। कौए ने ऊपर से देखा और तुरंत उड़कर मित्रों को खबर दी। सब घबरा गए, पर भागे नहीं। चूहे ने कहा – घबराओ मत, मैं रस्सियां काट दूंगा। वह दौड़कर आया और अपने तेज दांतों से जाल काटने लगा।
इधर शिकारी के आने की आहट मिली। कछुए ने कहा – हिरन तुम भाग जाओ, मैं यहीं रुककर सबका ध्यान भटकाता हूं। हिरन मुक्त होते ही जंगल में दौड़ गया। शिकारी आया तो उसे केवल कछुआ दिखा। वह उसे पकड़ने लगा, तब तक कौए ने शोर मचाकर शिकारी को उलझा दिया। अंत में सब सुरक्षित बच गए।

श्लोक का गहरा संदेश
इस कथा से श्लोक का अर्थ साफ हो जाता है।
पहली बात – धन ही शक्ति नहीं है। इन चारों के पास कोई संपत्ति नहीं थी।
दूसरी बात – बुद्धि सबसे बड़ा साधन है। सही समय पर सही उपाय काम आता है।
तीसरी बात – सच्चे मित्र जीवन की असली पूंजी हैं। अकेला तेज भी हार जाता है, पर साथ हो तो कमजोर भी जीत जाता है।
आज के जीवन में भी यही सच है। कोई विद्यार्थी पैसे से नहीं, लगन और अच्छे साथियों से आगे बढ़ता है। छोटा व्यापार बड़ा इसलिए बनता है क्योंकि लोग मिलकर काम करते हैं। परिवार तभी मजबूत रहता है जब सब एक-दूसरे का सहारा बनते हैं।

सफलता का सूत्र
श्लोक हमें तीन बातें सिखाता है –
संसाधन कम हों तो हिम्मत मत हारो।
बुद्धि को अपना सबसे बड़ा धन मानो।
अच्छे मित्र जोड़ो, संबंध निभाओ।
कौआ, कछुआ, हिरन और चूहा हमें याद दिलाते हैं कि जीवन में विजय का रास्ता शोर से नहीं, सहयोग से बनता है। जहां विश्वास है, वहां अभाव भी अवसर बन जाता है।

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