मंथरा के दुष्ट मन का रहस्य

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मंथरा के दुष्ट मन का रहस्य

अयोध्या धरती पर स्वर्ग की तरह जगमगा रही थी।

हर छत से झंडे लहरा रहे थे। सड़कों पर ढोल की थाप गूंज रही थी।

राम का राज्याभिषेक शुरू होने वाला था। लोगों के हृदय खुशी से नाच रहे थे।

लेकिन दूर - आकाश के पार, देवलोक के गुप्त कोनों में -

देवता एकत्रित थे। चेहरे पीले, स्वर तनावपूर्ण। वे ब्रह्मा के सामने खड़े थे।

'आपने हमें वचन दिया था,' उन्होंने कहा।

'महाविष्णु सूर्यवंश में जन्म लेंगे। वे रावण का नाश करेंगे।

हे ब्रह्मा, हमने आपकी बात पर विश्वास किया था! लेकिन अब हमें देखिए...'

इंद्र, जो कभी स्वर्ग के राजा थे, अब रावण का थूकदान थामे रह गए थे।

चंद्रमा, शीतल और शांत, रावण को छत्र से छाया दे रहे थे।

यम, स्वयं मृत्यु के देवता, रावण के महल के लिए जल भर लाए थे।

वायु, मुक्त पवन, रावण के फर्श पर झाड़ू लगा रहे थे।

और अश्विनी - देवताओं के वैद्य - अब रावण के महल की स्त्रियों के लिए विलेपन बना रहे थे।

'हम ऐसे ही हो गए हैं,' उन्होंने अपमान से भरी आँखों से कहा।

'अगर राम अभी राजा बन गए और अयोध्या में बस गए, तो

वह लंका कैसे पहुँचेंगे?

रावण का वध कौन करेगा?

संसार का उद्धार कौन करेगा?'

ब्रह्मा के चेहरे पर एक छाया छा गई।

उनकी आवाज़ विचार में डूब गई।

'राम को मुकुट नहीं पहनना चाहिए... अभी नहीं।

उन्हें वन जाना होगा। भाग्य का उदय होना ही चाहिए।'

उन्होंने एक छोटे से देव को बुलाया - कद में छोटा लेकिन चतुर - विकल्प।

'राज्याभिषेक बंद करो,' ब्रह्मा ने आदेश दिया।

लेकिन विकल्प काँपते हुए पीछे हट गया।

'मैं नहीं कर सकता,' उसने कहा।

'जहाँ राम का नाम लिया जाता है, मैं शक्तिहीन हूँ।

जहाँ रामराज्य शुरू होता है, वहाँ बुराई साँस नहीं ले सकती।

मैं धर्म की लहर को कैसे रोक सकता हूँ?'

ब्रह्मा ने आँखें सिकोड़ लीं।

'तो राम के पास मत जाओ। महल की दीवार की दरार में जाओ।

वहाँ एक स्त्री है - वृद्धावस्था से झुकी हुई, हृदय से विकृत।

उसका नाम मंथरा है। वह कैकेयी के साथ उसके मायके से आई है।

वह केवल कैकेयी के लिए जीती है।

वह क्रोधित है।

वह प्रतीक्षा कर रही है।'

'उसमें प्रवेश करो। उसके विचारों को मोड़ो। उसकी जीभ को अपनी तलवार बना लो।

उसके माध्यम से तुम वनवास का बीज बोओगे।

उसके माध्यम से राम अयोध्या से विदा होंगे - और भाग्य के पथ पर चलेंगे।'

और इस प्रकार, विकल्प चला गया।

वह एक कलिंग फल के अंदर छिप गया—बाहर से मीठा, भीतर से कड़वा।

एक ऐसा फल जिसके लिए मंथरा हमेशा तरसती थी।

उस दिन, वह शाही बगीचे में टहल रही थी,

उसे देखकर उसकी बूढ़ी आँखें चमक रही थीं।

उसने फल तोड़ा,

उसमें अपने दाँत गड़ा दिए।

और उसी क्षण—

विकल्प उसके भीतर प्रवेश कर गया।

उसके मन में एक आग सी लग गई।

कुण्डली मारे साँपों की तरह उलझे हुए विचार उसकी आत्मा में रेंगने लगे।

प्रेम ईर्ष्या में बदल गया।

निष्ठा विष में बदल गई।

उसकी टेढ़ी पीठ उद्देश्यपूर्ण होकर सीधी हो गई।

वह कैकेयी के पास जाएगी।

वह फुसफुसाएगी। वह चालाकी करेगी।

और इस तरह वह तूफ़ान शुरू होगा जो अयोध्या को हिला देगा,

दिलों को तोड़ देगा, और धर्म को जगा देगा।

राम का मार्ग अब तय हो गया था।

सिंहासन की ओर नहीं...

बल्कि वन की ओर।

भाग्य की ओर।

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जय श्रीराम

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