भारतीय संस्कृति में माताएं

स्तनदात्री गर्भदात्री भक्षदात्री गुरुप्रिया।
अभीष्टदेवपत्नी च पितुः पत्नी च कन्यका।
सगर्भजा या भगिनी पुत्रवती प्रियाप्रसूः।
मातुर्माता पितुर्माता सोदरस्य प्रिया तथा।।
मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च।
जनानां वेदविहिताः मातरः षोडश स्मृताः॥
यह श्लोक स्त्रियों के विविध रूपों और उनके मातृत्व स्वरूप की महिमा को प्रकट करता है। भारतीय संस्कृति में ‘माता’ केवल वह नहीं है जो संतान को जन्म देती है, बल्कि हर वह नारी माता है जो पोषण, संरक्षण और मार्गदर्शन देती है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य के जीवन में सोलह प्रकार की माताएँ मानी गई हैं। यह श्लोक इन्हीं माताओं की गणना करता है।
श्लोक का भावार्थ
स्तनदात्री – वह जो दूध पिलाए।
गर्भदात्री – वह जो गर्भ से उत्पन्न करे।
भक्षदात्री – जो भोजन कराए।
गुरुप्रिया – गुरु की पत्नी।
अभीष्टदेवपत्नी – उपास्य देवता की पत्नी (जैसे विष्णुपत्नी लक्ष्मी, शिवपत्नी पार्वती)।
पितुः पत्नी – पिता की पत्नी, अर्थात सौतेली माँ।
कन्यका – बेटी।
सगर्भजा – सगी बहन।
भगिनी - दीदी।
पुत्रवती प्रियाप्रसूः – पुत्रवती स्त्री।
मातुः माता – अपनी माता की माता, अर्थात नानी।
पितुः माता – पिता की माता, अर्थात दादी।
सोदरस्य प्रिया – भाई की पत्नी, अर्थात भाभी।
मातुः भगिनी – माता की बहन, अर्थात मौसी।
पितुः भगिनी - पिता की बहन, अर्थात बुआ।
मातुलानी – मामा की पत्नी।
इन सबको शास्त्रों में षोडश माताएँ कहा गया है।
भारतीय संस्कृति में मातृभाव
भारतीय परंपरा ने ‘मातृवत् परदारेषु’ का आदर्श रखा है – अर्थात अन्य स्त्रियों को माता के समान मानना। यह दृष्टिकोण समाज में स्त्रियों के प्रति सम्मान, सुरक्षा और गरिमा की भावना उत्पन्न करता है। शास्त्रकारों ने केवल जन्म देने वाली जननी को ही माँ नहीं माना, बल्कि जो भी नारी पालन-पोषण, स्नेह, शिक्षा या मार्गदर्शन देती है, उसे माता का दर्जा दिया है।
सामाजिक महत्त्व
स्त्री-सम्मान – हर स्त्री में मातृभाव देखना, स्त्री की गरिमा की रक्षा करता है।
पारिवारिक एकता – परिवार की हर स्त्री को ‘माता’ मानने से आपसी संबंध सुदृढ़ होते हैं।
नैतिक शिक्षा – इस दृष्टिकोण से समाज में शुचिता, मर्यादा और नैतिकता का संरक्षण होता है।
धार्मिक आधार – शास्त्रों में यह स्पष्ट कहा गया है कि माताओं का पूजन और सेवा पुण्यदायी है।
निष्कर्ष
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि ‘माता’ केवल जन्मदात्री नहीं है, बल्कि वह हर नारी है जो हमें जीवन का पोषण, संरक्षण और दिशा देती है। इन सोलह माताओं का सम्मान करना ही भारतीय संस्कृति की विशेषता है। यही कारण है कि यहाँ स्त्री को ‘मातृरूपा देवी’ माना गया है और कहा गया है –
'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।' - जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता संतुष्ट हो जाते हैं।

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