भगवान सिर्फ सदाचारियों का ही सुनते हैं

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भगवान सिर्फ सदाचारियों का ही सुनते हैं

एक बात ध्यान में रखिए, भगवान सिर्फ सदाचारियों का सुनते हैं, दुराचारियों का नहीं सुनते।

इसका अर्थ यह नहीं है जिसने पाप किया है वह भगवान के पास कभी नहीं जा सकता। पश्चात्ताप आने पर जा सकता है। मुझसे भूल चूक हुई है, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, आगे ऐसा नहीं करूंगा, ऐसे विचार आने पर – इसे ही पश्चात्ताप कहते हैं। ऐसे विचार आने पर भगवान सुनने लगेंगे।

दुराचारियों, जो दुराचार करते ही रहते हैं, उनको भगवान अपने ही कर्म के फल को भुगतने छोड़ देते हैं। ऐसा नहीं है कि दुराचार करते रहो और भगवान से मांगते भी रहो।

क्या है दुराचार? किसी का खून करना, लूटमार करना – केवल ये ही नहीं हैं दुराचार। आपके व्यवहार से किसी को भी हानि या दुख पहुंचा हो तो वह दुराचार है।

पर पश्चात्ताप करके परमेश्वर के आश्रय में जाने से, जितने पाप पहले के हैं, उन सब के फलस्वरूप जितने कष्ट जीवन में आते हैं, उन सब का समाधान हो जाता है। किसी भी पापी में इतनी शक्ति नहीं है कि वह इतना पाप करे कि भगवन्नाम में जितनी पाप निवारण की शक्ति है, उससे भी ज्यादा कर बैठे – कोई पापी ऐसा नहीं।

हम भगवान से प्रार्थना करना ही नहीं जानते। रामायण में देखो – रावण, इन्द्रजित जैसे राक्षस भी पूजा आराधना करते समय, उनका मन एकाग्र रहता है। सुग्रीव के सैनिक चारों ओर से उनकी पूजा में विघ्न डालते थे, क्योंकि उनको पता था कि पूजा करके वे और बलवान होते जा रहे थे। उनको पराजित करना और मुश्किल हो जाएगा।

भगवान साथ में हैं, पर युद्ध तो युद्ध है – भगवान भी तो धनुष-बाण लेकर लड़ ही रहे थे। ऐसा नहीं कि उन्होंने कुछ हाथ से इशारा किया और राक्षस सब जलकर भस्म हो गए। भगवान तो मानव का रूप लेकर आए हैं, तो उनको मानवों जैसे लड़ना तो पड़ेगा ही।

इसलिए वानर सैनिक भी हर प्रकार से कोशिश कर रहे थे, शत्रु को क्षीण करने के लिए। रावण आदि जब उस समय पूजा करते थे, तो उन्हें अपमान का सहन करना पड़ता था – तब भी अपने स्थान को छोड़कर वे नहीं उठते थे। राक्षसों में भी यह गुण है, मानवों में नहीं है।

कहते हैं राक्षस केवल बाहुबल में विश्वास रखते हैं – ऐसा नहीं लगता है। जितना विश्वास उनको है पूजा आराधना में, उतना नहीं है मनुष्य में।

कभी न कभी हर किसी को भगवान का सहारा लेना ही पड़ेगा। गजराज को देखो गजेन्द्र मोक्ष में – अपने शरीर के बल के अहंकार में कितना प्रयास किया उसने। जब पता चला कि इससे कुछ होने वाला नहीं है, तब भगवान याद आए।

द्रौपदी को देखो – पहले सोचा कि धर्म मेरी रक्षा करेगा – नहीं, भीष्माचार्य सहित सब चुप बैठे। एक नहीं, पांच-पांच पति – सबके हाथ बांधे हुए थे – तब याद आए भगवान।

लेकिन समझदार भक्त कोई आपत्ति आने तक रुकता नहीं है। उसको पहले से ही पता है कि भक्ति से, प्रार्थना से क्या-क्या मिल सकता है। भगवान सर्वशक्तिमान हैं – ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वे नहीं कर सकते। ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे वे नहीं बदल सकते। भक्त को यह बात भी पता है।

प्रार्थना में इतनी शक्ति है कि एक भक्त अगर चाहे तो समस्त विश्व को बदल सकता है – बस भावना सही होनी चाहिए।

अरे, मैंने सब भगवान के ऊपर छोड़ दिया है कहकर शरणागति का नाटक ही तो करते हैं। बकरी पालने वाला, बकरी को बेच देने के बाद कभी उसके खाने-पीने के बारे में सोचता है? इतना भी विश्वास नहीं है हमें भगवान पर। कहते हैं उनके ऊपर छोड़ दिया है, बोलना बंद नहीं किया, अपनी चिंताओं में लग जाते हैं।

क्या ऐसा कोई भक्त है जिसके घर में आग लगी हो और वह उसके अंदर निश्चिंत बैठा है? ऐसे भक्त में इतना विश्वास है तो पहले भगवान उसके घर में आग लगने ही नहीं देंगे। अगर लग गई तो भी भगवान ही उसे बुझा देंगे।

अगर आपको नहीं पता है कि भक्ति कैसी करनी है, तो हमारे ग्रंथ हैं, शास्त्र हैं, भागवत जैसे – जिसमें बताया है कि भक्ति अगर आप में नहीं है, तो इसे लाना कैसे है। जो भक्ति है, उसे भी दृढ़ कैसे करना है – पढ़ो इनको, सुनो इनको।

सद्गति कैसे प्राप्त होती है? सन्मार्ग पर चलने से। क्या है सन्मार्ग पर चलना? सत्कर्म करना।

सत्कर्म क्या है, कुकर्म क्या है – यह कैसे पता चलेगा? सत्बुद्धि होने से। सत्बुद्धि कैसे होगी? सत्प्रेरणा से।

गायत्री मंत्र द्वारा क्या मांगते हैं? हमारी बुद्धि का प्रचोदन करो। यह सत्प्रेरणा करेगा कौन? – भगवान। सब कुछ उनको ही करना है। उसके लिए जाना उनके पास ही है। यही प्रार्थना का महत्त्व है।

उनसे प्रार्थना करो कि पहले वे आपको सद्बुद्धि दें – बाकी सब अपने आप आ जाएगा।

  • भगवान उन लोगों की नहीं सुनते जो लगातार पाप करते हैं और कभी पछतावा नहीं करते। वे केवल सच्चे पश्चात्ताप की पुकार पर ध्यान देते हैं।

  • पश्चात्ताप का अर्थ है — ‘मुझसे गलती हुई’, ‘अब ऐसा नहीं करूंगा’, और ‘मुझे यह नहीं करना चाहिए था’ — यह मन की सच्ची स्थिति है, केवल अफसोस नहीं।

  • जब कोई मन से भगवान की ओर लौटता है, तब वह चाहे कितना भी पापी क्यों न हो, उसकी जीवन की दिशा बदल सकती है।

  • जो जान-बूझकर बुरा करते हैं और फिर भी भगवान से वरदान की अपेक्षा रखते हैं, वे केवल अपने को धोखा देते हैं। भगवान उन्हें उनके कर्मों का फल भुगतने देते हैं।

  • बुरे कर्म केवल हिंसा या चोरी नहीं होते — दूसरों को दुख, हानि, या अपमान पहुँचाना भी दुराचार है।

  • सच्चे मन से पश्चात्ताप करने पर पिछले सारे पापों के फलस्वरूप जो भी कष्ट जीवन में आते हैं, वे समाप्त होने लगते हैं।

  • कोई पाप इतना बड़ा नहीं कि भगवान के नाम की शक्ति से मिट न सके। भगवान का स्मरण स्वयं पापों को नष्ट करने वाला है।

  • रामायण में रावण और इन्द्रजित जैसे राक्षस भी पूजा में इतनी एकाग्रता से लगते थे कि उनके शत्रु उन्हें विघ्न डालकर रोकने की कोशिश करते थे।

  • भगवान स्वयं जब मानव रूप में अवतरित हुए, तो उन्होंने युद्ध के नियमों का पालन किया, जैसे अन्य योद्धा करते हैं। उन्होंने केवल संकेत देकर राक्षसों को नष्ट नहीं किया।

  • राक्षसों में पूजा के प्रति जो निष्ठा और धैर्य था, वह आज के बहुत से मनुष्यों में नहीं दिखाई देता।

  • वे शारीरिक बल में ही नहीं, तप और साधना में भी विश्वास रखते थे — यह दिखाता है कि उनमें भी कुछ विशेष गुण थे।

  • अंत में हर किसी को भगवान की शरण में आना ही पड़ता है — चाहे गजेन्द्र हो या द्रौपदी — जब और कोई उपाय नहीं बचा।

  • लेकिन ज्ञानी भक्त आपत्ति का इंतजार नहीं करता। वह पहले से जानता है कि भक्ति और प्रार्थना में अपार बल है।

  • भगवान सर्वशक्तिमान हैं। वे सब कुछ कर सकते हैं, सब कुछ बदल सकते हैं — सच्चा भक्त इस पर पूरा विश्वास रखता है।

  • सच्ची भावना से की गई प्रार्थना से एक व्यक्ति भी पूरे संसार की दशा बदल सकता है।

  • पर अधिकांश लोग केवल कहने के लिए बोलते हैं — 'भगवान पर छोड़ दिया' — और फिर भी मन से चिंता करते रहते हैं। यह सच्चा समर्पण नहीं है।

  • अगर किसी के घर में आग लग जाए और वह फिर भी शांत बैठा हो — ऐसा विश्वास अगर है, तो भगवान आग लगने ही नहीं देंगे, और अगर लग भी गई, तो बुझा देंगे।

  • यदि आपको नहीं पता कि भक्ति कैसे करनी है, तो शास्त्रों में इसका उपाय है — भागवत जैसे ग्रंथों को पढ़िए, सुनिए — ये मार्गदर्शन देते हैं।

  • सन्मार्ग पर चलने से ही उत्तम गति मिलती है। सन्मार्ग का अर्थ है — सच्चे और अच्छे कर्मों को अपनाना।

  • सत्कर्म और कुकर्म में अंतर समझने के लिए बुद्धि शुद्ध होनी चाहिए — जिसे सत्बुद्धि कहते हैं।

  • गायत्री मंत्र में हम यही मांगते हैं कि हमारी बुद्धि को उज्ज्वल करें — यह प्रेरणा केवल भगवान ही दे सकते हैं।


क्या भगवान पाप करने वालों की प्रार्थना नहीं सुनते?
जब तक उनके भीतर सच्चा पछतावा नहीं आता, तब तक नहीं। लेकिन जैसे ही मन शुद्ध होता है और गलती मानकर भगवान के पास जाता है, वह सुनना शुरू करते हैं।

अगर मैं बहुत पाप कर चुका हूं, तब भी भगवान मेरी सुनेंगे?
हाँ, सच्चा पश्चात्ताप हो तो भगवान तुरंत स्वीकार करते हैं। उनका नाम इतना पावन है कि सब पापों को धो देता है।

क्या यह भेदभाव नहीं है कि भगवान कुछ की सुनते हैं और कुछ की नहीं?
यह भेदभाव नहीं, नियम है — जो बदलना चाहता है, वही मार्ग पाता है। जो नहीं बदलता, वह अपने ही कर्मों के बीच फँसा रहता है।


क्या राक्षसों को भी पूजा से शक्ति मिलती थी?
हाँ, अगर पूजा सच्चे मन से हो, तो उसका फल अवश्य मिलता है। रावण और इन्द्रजित ने भी तप और मंत्रों से शक्ति अर्जित की थी।

राक्षस होकर भी वे पूजा में लगे रहते थे — ये कैसे संभव है?
इसका कारण यह है कि वे जानते थे — केवल बल से नहीं, आध्यात्मिक शक्ति से ही विजय संभव है। इसलिए वे भी साधना करते थे।

क्या पापी को पूजा करने से लाभ होता है?
अगर पाप करते हुए भी पूजा करता रहे, तो लाभ स्थायी नहीं होता। पूजा का फल तभी टिकता है जब जीवन में बदलाव भी हो।


क्या भगवान सच में सब कुछ कर सकते हैं?
हाँ, वे सर्वशक्तिमान हैं। वे समय, नियम, कारण, परिणाम — सबको बदल सकते हैं। भक्त को इसी पर भरोसा रखना चाहिए।

एक अकेला भक्त भी दुनिया बदल सकता है?
अगर उसकी भावना सच्ची हो, तो हाँ। प्रार्थना में ऐसा बल है कि एक की भावना से लाखों को मार्ग मिल सकता है।

अगर भगवान इतने सक्षम हैं, तो दुःख क्यों देते हैं?
दुःख सिखाने के लिए होता है, कभी कर्मों का फल होता है, और कभी आत्मा को निखारने के लिए — हर स्थिति का कारण होता है।


क्या हम सही ढंग से प्रार्थना करना नहीं जानते?
बहुत बार ऐसा होता है। बोलते हैं 'भगवान पर छोड़ दिया', और फिर भी चिंता करते हैं — यह दिखाता है कि भीतर से भरोसा नहीं है।

अगर मुझे नहीं पता कि भक्ति कैसे करनी है तो क्या करूं?
भागवत, रामायण, गीता जैसे ग्रंथों का अध्ययन करें — ये सिखाते हैं कि भक्ति को कैसे लाना और उसे कैसे दृढ़ करना है।

क्या केवल बोल देने से समर्पण हो जाता है?
नहीं। समर्पण मन की अवस्था है, केवल शब्द नहीं। अगर मन भगवान पर स्थिर नहीं हुआ है, तो वह सच्चा समर्पण नहीं है।


सन्मार्ग पर चलना क्यों ज़रूरी है?
क्योंकि यही आत्मा को ऊँचाई देता है, मन को शुद्ध करता है और जीवन को सही दिशा देता है।

सत्कर्म और कुकर्म में फर्क कैसे समझें?
जब बुद्धि निर्मल होती है, तब फर्क साफ दिखाई देता है। विवेक से निर्णय लेना ही सत्बुद्धि है।

सत्बुद्धि कैसे प्राप्त करें?
भगवान से मांगिए। गायत्री मंत्र में यही कहा गया है — वे ही बुद्धि को प्रेरित करें, ताकि हम सन्मार्ग पर चलें।

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