
जब पांडव पासे के खेल में हार गए, तब भगवान कृष्ण द्वारका में थे। समाचार सुनकर वे तुरंत हस्तिनापुर गए और फिर उस वन में गए जहाँ पांडव रह रहे थे। द्रौपदी ने कृष्ण से कहा, 'मधुसूदन, मैंने ऋषियों से सुना है कि आप सृष्टिकर्ता हैं। परशुराम ने मुझसे कहा कि आप विष्णु हैं। मैं जानती हूँ कि आप ही यज्ञों, देवताओं और पंचभूतों का सार हैं। भगवान, आप ही ब्रह्मांड के मूल हैं।' यह कहते ही द्रौपदी की आँखों से आँसू बहने लगे। गहरी साँस लेते हुए उसने कहा, 'मैं पांडवों की पत्नी, धृष्टद्युम्न की बहन और आपकी रिश्तेदार हूँ। भरी सभा में कौरवों ने मेरे बाल पकड़कर मुझे घसीटा। यह मेरे मासिक धर्म के समय की बात है। उन्होंने मुझे निर्वस्त्र करने की कोशिश की। मेरे पति मेरी रक्षा नहीं कर सके।' 'उस नीच दुर्योधन ने पहले भीम को पानी में डुबोकर मारने की कोशिश की थी। उसने पांडवों को जीवित जलाने का भी षडयंत्र रचा था। दुशासन ने मेरे बाल पकड़कर मुझे घसीटा।'
द्रौपदी ने फिर कहा 'मैं अग्नि से उत्पन्न हुई कुलीन स्त्री हूँ। आपके प्रति मेरा शुद्ध प्रेम और भक्ति है। मेरी रक्षा करने की शक्ति आपमें है। यह सर्वविदित है कि आप अपने भक्तों के वश में हैं। फिर भी आपने मेरी विनती नहीं सुनी।'
भगवान ने उत्तर दिया, 'द्रौपदी, यह अच्छी तरह समझ लो - जब तुम किसी पर क्रोधित होती हो, तो वह मृत समान ही होता है। जैसे आज तुम रो रही हो, वैसे ही उनकी पत्नियाँ भी रोएँगी। उनके आँसू नहीं रुकेंगे। शीघ्र ही वे सभी गीदड़ों और सियारों का भोजन बन जाएँगे। तुम महारानी बनोगी। चाहे आकाश फट जाए, समुद्र सूख जाए, या हिमालय टूट जाए, फिर भी मेरा वचन विफल नहीं होगा।'
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