
आपको यह तो पता ही होगा कि ऋषि बनने से पहले वाल्मीकि एक शिकारी थे।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि वाल्मीकि को शिकारी बनने का श्राप मिला था?
वाल्मीकि का आश्रम तमसा नदी के तट पर था।
एक बार उनका अग्नि के उपासक कुछ मुनियों से वाद-विवाद हो गया।
वे वाल्मीकि से नाराज हो गए और उन्हें श्राप दे दिया।
इस तरह वे शिकारी बन गए।
फिर उन्होंने भगवान शिव की शरण ली।
कई वर्षों तक शिव की आराधना करने के बाद वाल्मीकि को श्राप से मुक्ति मिली।
उस समय भगवान ने उनसे कहा - जाओ और मेरे महान भक्त के जीवन के बारे में लिखो। तुम विश्व प्रसिद्ध हो जाओगे।
इसका वर्णन महाभारत के अनुशासन पर्व में किया गया है।
सीख:
वाल्मीकि द्वारा भगवान शिव की आराधना कठिनाइयों को दूर करने के लिए भगवान की शरण लेने के महत्व को दर्शाती है।
चाहे कोई भी व्यक्ति वर्तमान स्थिति में हो, ईश्वरीय हस्तक्षेप से उससे शांति संभव है।
ईश्वरीय मार्गदर्शन हमें महानता की ओर ले जा सकता है।
ईश्वर की मदद से हम सभी में प्रतिकूल परिस्थितियों पर विजय पाने की क्षमता आती है। ईश्वरीय मार्गदर्शन हमें जीवन में उद्देश्य प्रदान करता है।
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