
मन में भक्ति कैसे उत्पन्न होती है?
कर्म से नहीं।
अपने आप भी नहीं।
भगवान के अनुग्रह से ही।
भक्ति है तो है, नहीं है तो नहीं है।
भगवान ही इसे उत्पन्न कराते हैं।
भक्ति है तो उस प्रयास से दृढ़ कर सकते हैं।
जैसे बीज है तो उसे पानी देकर, खाद देकर फसल में बदल सकते हैं, पेड़ में बदल सकते हैं।
भगवान जिसको स्वीकार लेते हैं, वही भक्त बन सकता है।
वे जिसका भी अनुग्रह करते हैं, वही भक्त बन सकता है।
त्याग, श्रवण और कीर्तन से भक्ति की वृद्धि होती है।
त्याग अर्थात – अपने शरीर को, उसके सुख-दुखों को जो हम प्राथमिकता देते हैं, उसे त्यागना।
मैं मेरे शरीर के सुख को बढ़ाने, उसकी पीड़ाओं को कम करने जी रहा हूं।
सुख – भोजनादि सुख।
दुख – रोगादि पीड़ा।
जब अवधान इनके ऊपर है तो हम शरीर के लिए ही जी रहे हैं।
इस बात को कभी नहीं भूलना है कि शरीर केवल एक वाहन है, जिसके द्वारा आत्मा अपने लक्ष्य को ओर संचार करती है।
करोड़ों मीलों का प्रयाण है।
एक वाहन कुछ मीलों के लिए ही काम आएगा।
उसके बाद दूसरा वाहन पकड़ना है।
यह कभी मत भूलो।
इसे भूलकर, अपने लक्ष्य को भूलकर, इस वाहन के सुख-दुखों के पीछे मत पड़ो।
यह वाहन अपना खुद का भी नहीं है।
किसी दूसरे ने दिया है।
किराये पर।
हां, ठीक है, तेल भरो, उसे साफ-सुथरा रखो।
कोई बात नहीं।
लेकिन इस वाहन की देखभाल को जीवन का लक्ष्य मत समझो।
जितना उसकी देखभाल से ध्यान हटाओगे, उतनी प्रगति करोगे अध्यात्म में।
फौज में जवानों को यूनिफॉर्म दिया जाता है, जूते दिए जाते हैं।
अपनी ड्यूटी को भूलकर अगर जवान यूनिफॉर्म को साफ रखने में और जूतों को चमकाने में लगे रहेंगे तो,
कितना बड़ा खतरा है, सोचो।
जितना जरूरी है, उतना ही ध्यान दो शरीर के ऊपर – मन सहित शरीर के ऊपर।
मन शरीर का साथ देनेवाला है।
मन का भी मत सुनो, बुद्धि का सुनो।
बुद्धि कैसे आएगी?
संत महात्मा लोग जो कहते हैं, उस प्रकार चलने से।
उसे सुनने से बुद्धि का विकास होता है।
त्याग से शरीर की अपेक्षाओं को कम करने से भक्ति दृढ़ होती है।
ईश्वर की महिमा के बारे में सुनने से भक्ति दृढ़ होती है।
जब आपको उनकी महिमा के बारे में पता ही नहीं है, तो उनकी ओर आदर कैसे आएगा?
गुलाब जामुन स्वादिष्ट है – किसी ने आपको सबसे पहले बताया, तभी तो आपने खाकर देखा न?
तभी तो अनुभव हुआ कि वह कितना अच्छा है, मीठा है।
गुलाब जामुन में एक ही गुण है – मिठास।
भगवान में हजारों गुण।
एक-एक को सुनने से, हर एक को सुनने से, सुनते रहने से भक्ति बढ़ेगी।
न केवल सुनना,
दूसरों को बताओ।
दूसरों को सिखाने से जैसे विद्या दृढ़ हो जाती है,
उसी प्रकार दूसरों को भगवान की महिमाओं के बारे में बताने से भक्ति बढ़ती है।
ऐसा नहीं कि भागवत का प्रवचन करना शुरू करो।
छोटी-मोटी बातें –
मंदिर के श्रृंगार के बारे में,
अपने ही अनुभवों के बारे में,
दूसरों के अनुभवों के बारे में,
भगवान ने कैसे किसी को बचाया,
किसी पर अनुग्रह किया –
ये सब बातें, जहां अवसर मिला, बताओ।
सुनने वालों को भी अच्छा लगेगा,
उनका भी भला होगा,
आपकी भी भक्ति की वृद्धि होगी।
भक्ति कैसे आती है?
भक्ति भगवान की कृपा से आती है, न कि किसी अभ्यास या प्रयास से।
क्या इसका मतलब ये है कि हम कुछ भी न करें और बस कृपा का इंतजार करें?
नहीं, कृपा के बीज को पनपाने के लिए त्याग, श्रवण और कीर्तन जैसे साधन जरूरी हैं।
अगर भगवान की कृपा ही कारण है तो फिर हमारा प्रयास व्यर्थ है?
नहीं, प्रयास से हम खुद को कृपा के योग्य बनाते हैं — जैसे बीज को पानी और खाद देने से पेड़ बनता है।
त्याग क्यों जरूरी है?
त्याग शरीर को सर्वोपरि मानने की सोच से मुक्ति दिलाता है, जिससे भक्ति टिकती है।
शरीर तो ज़रूरी है, फिर उसका ध्यान न रखना कैसे सही है?
ध्यान रखो, पर उसे जीवन का केंद्र मत बनाओ — बस इतना ही अंतर है।
शरीर की पीड़ा तो महसूस होती है, उसे अनदेखा कैसे करें?
उसे सहो, संभालो, पर उसमें अटक मत जाओ — ये केवल यात्रा का वाहन है, लक्ष्य नहीं।
मन का क्या करें?
मन शरीर का साथी है, उसे चलाना है बुद्धि के अनुसार।
अगर मन की बात नहीं मानें तो किसकी सुनें?
संतों की वाणी के अनुसार चलने से बुद्धि मजबूत होती है — वही रास्ता दिखाती है।
बुद्धि और मन में फर्क कैसे करें?
मन तुरंत सुख चाहता है, बुद्धि दीर्घकालिक हित देखती है — जो संयम सिखाए, वह बुद्धि है।
भगवान की महिमा सुनने से क्या होता है?
उनके गुणों को जानने से आदर और भक्ति पैदा होती है।
क्या इससे भक्ति पक्की हो जाती है?
हां, जैसे स्वाद का पता चलने पर ही भोजन पसंद आता है, वैसे ही गुणों को जानकर ही भक्ति टिकती है।
भगवान को जाने बिना भी भक्ति संभव है?
नहीं, आदर बिना भक्ति नहीं टिकती — और आदर तब आता है जब उनकी महिमा समझ में आती है।
दूसरों को बताना क्यों जरूरी है?
जैसे पढ़ाई पढ़ाने से पक्की होती है, वैसे ही भगवान की बातें दूसरों से कहने से भक्ति भी मजबूत होती है।
क्या हर किसी को भागवत का प्रवचन देना चाहिए?
नहीं, बस छोटे अनुभव, मंदिर की बातें, भगवान के अनुग्रह की कहानियां बताना भी पर्याप्त है।
दूसरों को बताने से अपनी भक्ति कैसे बढ़ती है?
क्योंकि जब आप कहते हो, तो फिर से स्मरण होता है, मन में दोहराव आता है — यही अभ्यास है।
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